सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ११८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रामानुज- विशिनष्टि श्रुति -'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृ- णुते तनूं स्वाम्” इति । प्रियतम एव हि वरणीयो भवति यथायं प्रियतममात्मानं प्राप्नोति तथा स्वयमेव भगवान् प्रियतम इति भगवतैवाभिहितम् “तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥” इति । 'पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया' इति च ॥ ४६ ॥ (भिद्यते इति) परावर परमात्माके दर्शन (निरवच्छिन्न) स्मृतिसे हृदय मनके ग्रन्थि (रागादि) नष्ट होते हैं अथवा हृदयप्रदेशमें विद्यमान जीवकी प्रकृति सम्बन्ध रूप ग्रन्थिए नष्ट होती हैं और समस्त देहात्माभिमानादि अविद्यारूप संशय नष्ट होता है पुण्यपापरूप मोक्षविरोधी समस्त कर्म क्षीण होते हैं । इस श्रुतिके साथ एकवाक्यता होनेसे पूर्वोक्त ज्ञान वेदनादि सब प्रत्यक्षतापन्न स्मृतिपरक है । श्रीबोधायन महर्षिनेभी वेदनको उपासना कहा है “आत्मावाअरेद्रष्टव्य” यह वाक्यभी स्मृतिको दर्शनरूप प्रतिपादन करता है निरतिशय भावना वश स्मृतिभी प्रत्यक्ष समानाकार होती है । तादृश स्मृतिका विशेषण कहते हैं ( नायमा त्मेति ) प्रवचनशब्दकी मनन अर्थमें लक्षणा है क्योंकि प्रवचनका फलभी मनन है मेधाशब्दका अर्थ निदिध्यासन है तथाच केवल श्रवण मनन और निदिध्यासन मोक्षके लिये उपाय नहीं है इसका तात्पर्य यह नहीं कि श्रवणादिक उपायही नहीं किन्तु जैसे “न पृथिव्यामग्निश्चेतव्य” यहाँपर हिरण्यरहित पृथिवीका निषेध करता है तैसेही केवल श्रवणादिका निषेध करता है ( यमेवेति ) वह आत्मा जिसको स्वीकार करता है उन्हींको प्राप्त होता है जो अत्यन्त प्रिय हो वही स्वीकार योग्य होता है जिसको आत्मा ( ईश्वर ) निरतिशय प्रिय हो वही ईश्वरकाभी प्रिय होता है जिस प्रकार जीव प्रियतम ईश्वरको प्राप्त होता है उसको गीतामें भगवान्ने स्वयं कहा है । ( तेषामिति ) जो निरन्तर योगको कथन करनेवाले अनन्य भक्त हैं उनको मैं उस शुद्ध ज्ञानको प्रीतिपूर्वक देता हूं जिस ज्ञानसे वह मुझको प्राप्त होते हैं (पुरुष स परोति) परम पुरुष परमात्मा अनन्य भक्तिसे प्राप्त होते हैं ॥ ४६ ॥ भक्तिस्तु निरतिशयानन्दप्रियानन्यप्रयोजनसकलेतरवैतृष्ण्यव- ज्ज्ञानविशेष एव । तत्सिद्धिश्च विवेकादिभ्यो भवतीति वाक्य-