भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( ११७ ) वह ज्ञान ध्यान और उपासनादि रूप है वाक्यमे जायमान आपात प्रतीत वाक्यार्थ ज्ञानरूप नहीं है क्योंकि व्याकरण काव्यकोशादि ज्ञानवान् व्युत्पन्न पुरुषको पदसमू- हरूप वाक्य श्रवणके अनन्तर विधिवाक्यके बिनाभी वाक्यार्थ ज्ञान होनेसे विधान व्यर्थ है । अतः वाक्यार्थज्ञानसे विलक्षण ध्यान ओर उपासनादिरूप ज्ञानही वेदान्तवाक्योंसे विधीयमान है क्योंकि 'आत्मा वाअरे द्रष्टव्य' इत्यादि वाक्य श्रवण मननादि पूर्वक निदिध्यासनका विधान करते हैं 'आत्मेत्येव उपासीत' यह वाक्यभी उपासनाका विधान करता है । विज्ञाय यहापरभी प्रज्ञापदसे उपासनाहीका ग्रहण है अत एव विज्ञाय ओर प्रज्ञा दोनो पद चरितार्थ होते हैं अन्यथा दोनों ज्ञान सामान्य वाची हो तो एकपद व्यर्थ होजायगा “अनुविद्यविजानाति” ध्यान ओर उपासनाही- का बोधक है तात्पर्य यह है वेदान्तवाक्योंमें वेदन ज्ञान उपासना ध्यानादि शब्द सब पर्याय है अत एव “ मनो ब्रह्मेत्युपासीत ” यहा उपासनासे उपक्रम करके “ य एव वेद ” यहा विदसे उपसहार किया है । न स वेद यहा वेदनसे उपक्रम करके “ आत्मेत्येवोपासीत ” इति उपासनासे उपसहार किया है । श्रीशंकरा- चार्यनेभी “ आवृत्तिरसकृदुपदेशात् ” इस सूत्रके भाष्यमें इन बातोंको स्पष्ट किया है “ आत्मावाअरे द्रष्टव्य ” इत्यादिमें श्रवणका विधान नहीं हो सकता क्योकि “स्वाध्यायोऽध्येतव्य ” इति अध्ययन विधि साङ्ग समस्त वेदोंके अध्ययनका विधान करता है वह केवल शब्द पाठमात्रको नहीं बोध करता किन्तु अर्थज्ञान- पर्यन्तका बोधक है अतः अधीतवेदपुरुष प्रयोजनरूप अर्थके निर्णयके लिये स्वय प्रवृत्त होगा एवञ्च श्रवण स्वतः प्राप्त होनेसे उसका विधान नहीं होसकता । मन- नकाभी विधान नहीं होसकता क्योंकि श्रवणकी प्रतिष्ठाके लिये मनन होता है मन्तव्य यहभी अनुवाद है अत ध्यानमात्रका विधान होता है अप्राप्त अर्थके विधानमे शास्त्र सार्थक होता है तादृश ज्ञान “आवृत्तिरसकृदुपदेशात् ” इत्यादि सूत्रसे प्रतिपादित विजातीयज्ञानरहित तैलधाराकी समान विच्छेद ( विराम ) शून्य स्मृतिपरम्परा है ध्रुव ( निश्चल ) स्मृति है स्मृति स्थिर होनेसे हृदयके रागादि समस्त ग्रन्थियाका विनाश होता है अत मोक्षका उपाय केवल स्मृति है वह स्मृति प्रत्यक्षकी समानाकार होती है ॥ ४५ ॥ “भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे” इत्यनेनैकत्वात् । तथाच आत्मा वा अरे द्रष्टव्य इत्यानेनास्यादर्शनरूपता विधीयते । भवति च भावनाप्रकर्षात् स्मृतेर्दर्शनरूपत्वम् । वाक्यकारेणै- तत् सर्वं प्रपञ्चितं वेदनमुपासनं स्यात् इत्यादिना । तदेव ध्यानं