भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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( १०८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रामानुज- सोपभोगद्वयवत् कृता भगवत्प्रतिपत्तिः भगवत्पदप्राप्तिरित्या- दयः स्वभावा । अचिद्वस्तूनान्तु भोग्यभूतानामचेतनत्वमपुरु- षार्थत्वं विकारास्पदत्वमित्यादयः परस्येश्वरस्य भोक्तृभोग्ययो- रुभयोरन्तर्यामिरूपेणावस्थानमपरिच्छेद्यज्ञानैश्वर्यवीर्यशक्ति तेज प्रभृत्यनवस्थितातिशयासंख्येयकल्याणगुणगणता स्व- सङ्कल्पप्रवृत्तस्वेतरसमस्तचिदचिद्वस्तुजातता स्वाभिमतस्वा- नुरूपैकरूपदिव्यरूपनिरतिशयविविधानन्तभूषणतेत्यादय ॥३१ स्वत्र असंकुचित अपरिच्छिन्न निर्मल ज्ञानस्वरूप होनेपरभी अनादि कर्मरूप अवि द्यामे वेष्टितस्वरूप चेतन जी वात्माकातत्तत्कर्मानुसार ज्ञानका संकोचविकास एव भोग्य भूत अचित्संसर्गजनित सुखदुःखोपभोग-भगवत्प्रपत्ति भगवत्प्राप्तिकत्वादि स्वभाव है । भोग्यभूत अचिद्वस्तुके अचेतनत्व अपुरुषार्थत्व और विकारित्वादि स्वभाव हैं । भोक्ता भोग्य दोनोंके अन्तर्यामीरूपसे अवस्थान, अपरिच्छिन्न, ज्ञान, शक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य और तेज प्रभृति अनवधिक और अनतिशय असंख्येय कल्याण गुणवत्त्व स्वसङ्कल्पमें प्राप्त हे सत्ता जिसको ऐसे स्वेतर समस्त चेतनाचेतनात्मक वस्तु समु दायरूप स्वानुरूप स्वाभिमत दिव्यभूषत्त्वादिमत्त्व परमात्माका स्वभाव हे ॥ ३१ ॥ वेङ्कटनाथेन त्वित्थं निराटङ्कि पदार्थविभाग - "द्रव्याद्रव्यप्रभे- दायितमुभयविधं तद्विद तत्समाहु द्रव्यं द्वेधा विभक्त जडमज- डमिति प्राच्यमव्यक्तकालौ । अन्त्यं प्रत्यक् पराक् च प्रथममु- भयथा तत्र जीनेशभेदात् नित्या भूतिर्मतिश्चेत्यपरमिह जडा- मादिमा केचिदाहु "॥ तत्र- "द्रव्यं नाना दशावत् प्रकृतिरिह गुणै सत्त्वपूर्वेरुपेता कालोऽब्दाद्याकृति स्यादणुरवगतिमान् जीव ईशोऽन्य आत्मा । संप्रोक्ता नित्यभूतिस्त्रिगुणमपि परा सत्त्वयुक्ता तथैव ज्ञातुर्नेया प्रभासा मतिरिनि कथित मग्रहाद्व- व्यलक्ष्म्" ॥ इत्यादिना ॥ ३२ ॥