भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १०९ ) प्रथम ( जडमी ) अव्यक्त कालभेदसे द्विविध हैं । अन्त्य ( अजड ) प्रत्यक् और पराक् भेदसे दो प्रकार है । प्रत्यक्भी जीव और ईश्वरभेदसे दो प्रकार हैं । नित्य विभूति और मतिभेदसे पराक्भी द्विविध है नित्य विभूतिको कोई २ जड कहते हैं। द्रव्य अनेक अवस्थाश्रय है सत्वरज तमोगुणयुक्त प्रकृति है । वर्षमासा- दिरूप काल है । अणुपरिमाण ज्ञानाश्रय जीव है । जन्य अर्थात् विभु ज्ञानाश्रय ईश्वर है । त्रिगुणातीत शुद्ध सत्त्वगुणयुक्त नित्य विभूति और ज्ञाताको ज्ञेय (विषय) का अवभास ( प्रकाश ) जिससे हो वह मति है । इस प्रकार सग्रहसे लक्षण कहाहै ॥ ३२ ॥ ' तत्र चिच्छब्दवाच्या जीवात्मानः परमात्मनः सकाशाद् भिन्नाः नित्याश्च । तथाच श्रुतिः “द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया” इत्या- दिका ॥ ३३ ॥ ( तत्रेति ) चित्पदप्रतिपाद्य जीव परमात्मासे भिन्न और नित्य है ( द्वासुपर्णेति ) सुपर्णके समान सर्वदा सहवर्तमान जीवात्मा और परमात्मा दोनों एकही वृक्षरूपी शरीरमें रहते हैं उनमेंसे एक(जीव ) कर्मके फलको भोगता है परमात्मा स्वकर्मफलको न भोगते हुए जीवको भोगाकर अत्यन्त प्रकाशित होते हैं ॥ ३३ ॥ अतएवोक्तं नानात्मानो व्यवस्थात इति । तन्नित्यत्वमपि श्रुति- प्रसिद्धम् । “ न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूय । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥” इति ॥ अन्यथा कृतप्रणाशाकृताभ्या- गमप्रसङ्गः । अतएवोक्तं वीतरागजन्मादर्शनादिति । तद- णुत्वमपि श्रुतिप्रसिद्धम् । “वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पि- तस्य च । भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥ ” इति ॥ “आराग्रमात्रः पुरुष एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यः” इति च ॥ ३४ ॥ अतएव सुख दुःख तथा बन्ध मोक्षादि व्यवस्थाके बलसे आत्माका नानात्व सांख्योंने भी माने हैं । “ नित्यो नित्यानाम् ” इत्यादि श्रुतिभी आत्मबहुत्वमे प्रमाण है । नित्यत्वभी श्रुति प्रसिद्ध है । विपश्चित् जीव ( विविधप्रकार-अर्थात् विशेष रूपसे देखनेवाले ) न उत्पन्न होता है और न मरता है न उत्पन्न हुआ और न