भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १०७ ) ब्रह्मैवावस्थितमिति सर्वात्मकब्रह्मपृथग्भूतवस्तु सद्भावनिषे- धपरत्वाभ्युपगमेन प्रतिपादिताः ॥ २९ ॥ "निष्कल निरञ्जनम्" इत्यादि गुणनिषेधक वचन हेयगुणका निषेध करते हैं. सत्यकामादि वाक्य समस्त कल्याण गुणोंको प्रतिपादन करते हैं। कहाभी है- "यद्ब्रह्मणोगुणशरीरविकारभेदकर्मादिगोचरविधिप्रतिषेधवाचः । अन्योन्यभिन्नविष- यानविरोधगन्धमर्हन्ति तन्नविधय प्रतिषेधबाध्य ॥ इति ॥ " "नेह नानास्ति" इत्यादि नानात्वनिषेधक वाक्यभी समस्त चेतनाचेतनात्मक वस्तु ब्रह्मके शरीर और ब्रह्म आत्मा होनेसे अब्रह्मात्मक नानात्वका निषेध करते हैं। ब्रह्मका शरीरभूत चेतनाचेतनात्मक प्रपञ्चका निषेधक नही है अत निर्विशेषाद्वैतवोधक नही है अत एव "न द्वैत प्रतिपादपन्त्युपनिषद्वाच प्रसिद्धं हितात्किन्त्वैद्वतमनन्यगोचरतया तद्धेयमास्थीयताम् । अप्राप्ते खलु शास्त्रमर्थवदितिव्यर्थप्रयासो यत प्रख्यातादपरस्तु शास्त्रविषयो भेदस्त्वदद्वैतवत् ॥" इत्यादि आचार्यों ने कहा है ॥ २९ ॥ किमत्र तत्त्वं भेदः अभेद उभयात्मक वा सर्वशरीरतया सर्वप्रकारं ब्रह्मैवावस्थितमित्यभेदोऽभ्युपेयते एकमेव ब्रह्म नानाभूतचिद्- चित्प्रकारं नानात्वेनावस्थितमिति भेदाभेदौ चिदचिदीश्वरा- णां स्वरूपस्वभाववैलक्षण्यादसंकराच्च भेदः ॥ ३० ॥ भेदाभेदादि तीन प्रकारके तत्त्व श्रुतिमें प्रतिपादित होनेसे मतान्तरमें एकको मुख्यत्व अन्यको बाधितत्व अर्थात् औपचारिकत्व कहते हैं। परन्तु विशिष्टाद्वैतमें श्रुतिप्रतिपादित होनेसे एककाभी बाध नही। इसी बातको प्रश्नपूर्वक कहते हैं (किमत्र तत्त्वमित्यादि) समस्त वस्तु ब्रह्मके शरीर है अत एव ब्रह्ममें प्रकार होनेसे तादृश प्रकारविशिष्ट प्रकारी ब्रह्म एक होनेसे एकमेवाद्वितीयमित्यादि अभेद श्रुति उपपन्न होती है। एकही ब्रह्मके प्रकारभूत चेतनाचेतनात्मक शरीर नानात्वेन अव- स्थित होनेसे विशेषणांश लेकर भेद और विशिष्ट रूपसे अभेद दोनों उपपन्न होते हैं चित् अचित् और ईश्वरके स्वरूप और स्वभाव विलक्षण होनेसे परस्पर असांकर्यके लिये भेदभी उपपन्न होगया ॥ ३० ॥ तत्र चिद्रूपाणा जीवात्मनामसङ्कुचितापरिच्छिन्ननिर्मलज्ञानरू- पाणामनादिकर्मरूपाविद्यावेष्टितानां तत्तत्कर्मानुरूपज्ञानस- ङ्कोचविकासा भोग्यभूता चित् भोक्ता संसर्गः तदनुगुणसुखदु -