सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १०६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रामानुज-
नामरूपविभागेनेदृक्सूक्ष्मदशावत् प्रकृतिपुरुषशरीरं ब्रह्मकार- णावस्थं जगतस्तदापत्तिरेव प्रलय नामरूपविभागविभक्तस्थू- लचिदचिद्वस्तुशरीरं ब्रह्मकार्यावस्थं ब्रह्मणस्तथाविधस्थूल भावश्च सृष्टिरित्यभिधीयते ॥ एवञ्च कार्यकारणयोरनन्यत्व- मप्यारम्भणाधिकरणे प्रतिपादितमुपपन्नतरं भवति ॥ २८ ॥ कार्यकारणका उपपादन-( नामरूपेत्यादि ) स्थूलचिदचित् विशिष्ट ब्रह्म कार्य है सूक्ष्मचिदाचिद्विशिष्ट कारण है चेतनाचेतनमें सूक्ष्मत्व नामरूपविभागका अनर्हत्व है और स्थूलत्व नामरूपविभागका अर्हत्व है । चेतनाचेतन दोनों ब्रह्ममें विशेष और ब्रह्म विशेष्य है एवञ्च चिदचिद्विशिष्ट ब्रह्मही कारण और तादृश ब्रह्मही कार्य होनेसे कारणविज्ञानसे कार्य विज्ञान उपपन्न होता है । विशिष्ट कारण होनेपरभी विकारादि दोष विशेषणांशमें होते हैं विशेष्यांशमें नहीं होते । जिस प्रकार " शिखी- ध्वस्त " " स्वर्गी ध्वस्त " इत्यादि ध्वंसप्रतियोगित्व विशेषणभूत स्वर्गशिखादिमें रहता है । नामरूपविभागानर्ह प्रकृतिपुरुष शरीरापन्न कारणावस्थाका नाम प्रलय है नामरूपविभागार्ह स्थूलरूपापत्ति सृष्टि है । कार्यकारणका अभेद आरम्भणाधिकर णमें सुस्पष्ट प्रतिपादन किया है " उपक्रमोपसंहारावभ्यासोऽपूर्वता फलम् । अर्थवा- दोपपत्तिश्च लिङ्गं तात्पर्यनिर्णये ' ॥ इत्युक्त तात्पर्यनिर्णायक षड्विध लिङ्ग इसी पक्षमें उपपन्न होते हैं। तथाहि उपक्रममें ( सदेव सौम्येत्यादि ) वाक्य ब्रह्मको निमि- त्तोपादानत्व तथा तदुपयोगी सर्वज्ञत्व सत्यसङ्कल्पत्वादिक प्रतिपादन किया है वह सविशेष विषय है । तत्त्वमसि इति उपसंहारमें सामानाधिकरण्यभी प्रवृत्तिनिमित्त भेद होनेसे सविशेष विषय है विशिष्टका एकत्व वृक्ष नदी समुद्रादि दृष्टान्तद्वारा नौ वार आवृत्त होनेसे अभ्यास भी है समस्त प्रपञ्चको ब्रह्म विशेषणत्वप्रमाणान्तरसे अप्रतीत होनेसे अपूर्वताभी है एतादृश ज्ञानवान्को तस्य तावदेव चिरमित्यादिसे मोक्षप्रतिपादन होनेसे फलभी है पितापुत्रसंवाद होनेसे अर्थवादभी है मृत्कार्य दृष्टान्त प्रतिपादनसे उपपत्तिभी है । एतादृश लिङ्ग अद्वैत मतमें उपपन्न नहीं होस- कते क्योंकि यह सब सविशेष विषयक हैं ॥ २८ ॥ निर्गुणवादाश्च प्राकृतहेयगुणनिषेधविषयतया व्यवस्थिता नानात्वनिषेधवादाश्च एकस्यैव ब्रह्मण शरीरतया प्रकारभूतं सर्वं चेतनाचेतनात्मकं वस्त्विति सर्वस्यात्मतया सर्वप्रकार