भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १०५ )

होनेके कारण ऐक्यज्ञानसे पूर्वभी स्वरूप विद्यमान है ऐक्यज्ञानसे अविद्याकी निवृत्ति ओर तदभावमें संसार होता है इत्यादि सिद्धान्तकाभी भंग होगा । किञ्च निवर्त्तकज्ञान भी ब्रह्मसे व्यतिरिक्त है अतस्त उसकी निवृत्ति किससे होगी ? ज्ञानान्तर कहो तो उसमें भी यही क्रम होगा अन्तत' एक ज्ञान ब्रह्मव्यतिरिक्त रहजायगा । तथा ब्रह्मव्य- तिरिक्त समस्त वस्तुओंका निषेध विषयज्ञानका ज्ञाता अध्यासस्वरूपको नहीं कह सकते क्योंकि वह निषेध्य है अतः निवर्त्तक ज्ञान कर्म होनेसे उसके कर्तृत्व नहीं हो सकेगा ब्रह्मस्वरूपहीको ज्ञाता मानोगे तो अद्वैतपक्ष छोड़कर विशिष्टाद्वैतमतमें प्रवेश होगा ॥ २६ ॥ न च प्रपञ्चस्य सत्यत्वप्रतिष्ठापनपक्षे एकविज्ञानेन सर्वविज्ञा- नप्रतिज्ञाव्याकोपः प्रकृतिपुरुषमहदहङ्कारतन्मात्रभूतेन्द्रियचतु- र्दशभुवनात्मकब्रह्माण्डतदन्तर्वर्त्तिदेवतिर्यङ्मनुष्यस्थावरादि- सर्वप्रकारसंस्थानसंस्थितं कार्यमपि सर्व ब्रह्मैवेति कारणभूत- ब्रह्मात्मज्ञानादेव सर्वविज्ञानं भवतीत्येकविज्ञानेन सर्वविज्ञान- स्योपपन्नतरत्वात् ॥ अपिच ब्रह्मव्यतिरिक्तस्य सर्वस्य मिथ्या- त्वे सर्वस्यासत्त्वादेवैकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं बाध्येत ॥ २७ ॥ ( नचेति ) चेतन अचेतनात्मक प्रपञ्चका सत्यत्व स्वीकार करोगे तो उद्दालक ऋषिके स्वपुत्र श्वेतकेतुके प्रति एक विज्ञानसे सर्वविज्ञानप्रतिज्ञाकी हानि होगी घटज्ञानसे पट जिस प्रकार ज्ञात नहीं होता है उसी प्रकार ब्रह्मविज्ञानसे प्रपञ्चकाभी ज्ञात नहीं होगा अद्वैत मतमें एक ब्रह्मही सत्य अन्य मिथ्या होनेसे ब्रह्मविज्ञानसे सर्वविज्ञान उपपन्न होता है यहभी अयुक्त है क्योंकि प्रकृति पुरुष महत् अहङ्कारादि मनुष्य स्थावरपर्यन्त अनेक संस्थान संस्थित समस्त कार्य ब्रह्मरूप है कारणभी ब्रह्म है अतः कारण विज्ञानसे कार्य विज्ञान होता है यही एक विज्ञानसे सर्व विज्ञानप्रतिज्ञाका तात्पर्य है । प्रत्युत अद्वैत पक्षमें ही एकविज्ञानप्रतिज्ञाको अनुपपन्नत्व कहते हैं ब्रह्म- व्यतिरिक्त समस्त मिथ्या है तो ज्ञातव्य सर्व पदार्थ कुछभी न होनेसे सर्व विज्ञ- प्रतिज्ञा सर्वथा अनुपपन्न होगी । यदि सर्व पदको सर्वाभावमें लक्षणा करोगे तो लक्ष- णाही दोष होगा । यदि एक पदार्थ और सर्व पदार्थको तादात्म्य कहोगे तो सर्वपदवाच्य प्रपञ्च मिथ्या होनेसे उसके साथ तादात्म्यापन्न ब्रह्मभी मिथ्या होगा अथवा ब्रह्मातादात्म्य होनेसे जगत्कोभी सत्यत्व होगा इत्यादि अनेक दूषण है ॥ २७ ॥