सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १०४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रामानुज- किञ्च तत्त्वमस्यादिवाक्यं न प्रपञ्चस्य बाधकं भ्रान्तिमूल- त्वात् । भ्रान्तिप्रयुक्तरज्जुसर्पवाक्यवत् नापि ब्रह्मात्मैक्यज्ञानं निवर्त्तकं तत्र प्रमाणाभावस्य प्रागेवोपपादनात् ॥ २६ ॥ ( किञ्चेति ) तत्त्वमसि अयमात्मा ब्रह्म, इत्यादि वाक्यभी प्रपञ्चके बाधक नहीं हो सकते क्योंकि वह भी ब्रह्मव्यतिरिक्त होनेसे रज्जुसर्पादिवत् भ्रान्ति परिकल्पित है जिस प्रकार रज्जुमें सर्पभ्रान्तिके समय कोई भ्रान्त पुरुष आकर यदि कहे यह सर्प नहीं रज्जु हे ऐसे कहनेपरभी उसका भय नहीं छूटता क्योंकि वह जानता है कि यह स्वयं पागल हे तिसी प्रकार तत्त्वमसि भी ब्रह्मभिन्न होनेसे भ्रान्तवाक्य है ब्रह्म और आत्माका अभेद ज्ञानभी प्रपञ्चनिवर्तक नहीं हो सकता है तादृश ज्ञानका अप्रामाणिकत्व पूर्वही कह चुका हूं. तात्पर्य यह है कि, मायावादियोंकी अविद्याविषयमें सात प्रकारकी अनुपपत्ति है अविद्याके आश्रयकी अनुपपत्ति १ तिरोधानानुप- पत्ति २ अनिर्वचनीयत्वानुपपत्ति ३ स्वरूपानुपपत्ति ४ प्रमाणानुपपत्ति ५ निवर्तक त्वानुपपत्ति ६ निवृत्तिकी अनुपपत्ति ७ प्रमाणकी अनुपपत्ति विशदरूपसे पूर्वही कह चुका हूं अविद्याके आश्रय जीव नहीं हो सकता कारण कि अविद्या कल्पित जीव है जीवके बिना अविद्या नहीं हो सकेगी अविद्याके बिना जीव नहीं होसकेगा इस प्रकार अन्योन्याश्रय होगा ब्रह्मभी स्वयंप्रकाश ज्ञानरूप होनेके कारण स्वविरोधी अज्ञानका आश्रय नहीं होसकेगा । अद्वैतियोंके मतमें निर्विशेष चिन्मात्र अनुभूतिमें अविद्याका मूलभूत पारमार्थिक दोष न होनेसे अविद्यास्वरूप उत्पन्न नहीं हो सकेगा । अपर मार्थ दोष माने तो दोषके लिये पुन. दोषान्तर उसमें पुन' भी दोषान्तर इस प्रकार अनवस्था होगी । यदि ब्रह्महीका दोषरूप माने तो ब्रह्म नित्य होनेके कारण अविद्याकी निवृत्ति न होनेसे मोक्ष भी नहीं होगा अनिर्वचनीयत्वभी अनुपपन्न है क्योंकि अनि- र्वचनीयत्वको सत् और असत् इन दोनोसे विलक्षणत्व कहोगे तो ऐसी वस्तुमें कोई प्रमाणही नहीं है प्रतीतिसे वस्तुकी व्यवस्था होती है कोई प्रतीति सत्त्विषयक है ओर कोई प्रतीति असद्विषयक है अत एव संवित्सिद्धिमें कहा है "नासत्प्रतीतेर्वा- धाच्च न सदित्यपि यन्न तत् । प्रतीतेरेव सत्किं न बाधात्रासत् कुतो जगत् ॥" निर्विशेषवस्तुप्रतिपादक वाक्य तथा तादृशज्ञान दोनोंके न होनेसे निवर्तकत्वभी अनुपपन्न है निवृत्तिकी भी अनुपपत्ति है अनिर्वचनीय विरोधीको निवृत्ति कहेंगे तो अनिर्वचनीयका विरोधी निर्वचनीय है वह सत् है या असत् है या सदसद्रूप हे । किञ्च निवृत्तिको ब्रह्मस्वरूपसे अतिरिक्त मानोगे तो भेददर्शनरूप अविद्याकी निवृत्ति तो नहीं होगी । ब्रह्मस्वरूपहीको निवृत्ति मानो तो स्वरूप नित्य