सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेत' । ( ११३ ) (मोक्ष) को प्राप्त पुरुष दुःखका आलयरूप नश्वर संसारको नहीं पाते । वासुदेव भगवान् स्वभक्तोंके परमानन्द युक्त अक्षय पुनरावृत्ति रहित स्वकीय लोकको देते हैं । इत्यादि ॥ ३८ ॥ तदेतत् सर्वं हृदि निधाय महोपनिषन्मतावलम्बनेन भगवद्बो- धायनाचार्यकृतां ब्रह्मसूत्रवृत्तिं विस्तीर्णामालक्ष्य रामानुजः शारीरकमीमांसाभाष्यमकार्षीत् । तत्र 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इति प्रथमसूत्रस्यायमर्थ । अत्र अथशब्द पूर्वप्रवृत्तकर्माधिगमना- नन्तर्यार्थ । तदुक्तं वृत्तिकारेण-वृत्तात् कर्माधिगमादनन्तरं ब्रह्म विविदिषता " इति । अत शब्दो हेत्वर्थ. अधीतसा- ङ्गवेदस्याधिगततदर्थस्य विनश्वरफलात् कर्मणो विरक्तत्वाद्धेतोः स्थिरमोक्षाभिलाषुकस्य तदुपायभूतब्रह्मजिज्ञासा भवति । ब्रह्मशब्देन स्वभावतो निरस्तसमस्तदोषानवधिकातिशया- संख्येयकल्याणगुणगण· पुरुषोत्तमोऽभिधीयते ॥ ३९ ॥ यह सब हृदयमें रखकर सम्पूर्ण उपनिषद्का अवलम्बन करके भगवद् बोधायनमहर्षिनिर्मित अतिविस्तृत ब्रह्मसूत्रवृत्तिको आधुनिक मनुष्योंको दुर्बोध जानकर भगवान् श्रीरामानुजाचार्यजीने शारीरकमीमांसाभाष्य निर्माण किया “अथातो ब्रह्मजिज्ञासा” यह प्रथम सूत्र है इसमें अथशब्द आनन्तर्य अर्थक है आनन्तर्य पूर्व अतीतकी अपेक्षा होता है अतीत कर्मज्ञान हे अत कर्मज्ञानके अन- न्तर यह अर्थ होता हे । वृत्तिकारनेभी कर्मज्ञानके अनन्तर ब्रह्मविचार कहा हे अतः शब्दका अर्थ हेतु हे अधीतसाङ्ग समस्त वेदवेदान्त पुरुषको कर्ममें अल्प ओर नश्वर- फलवत्त्व निश्चित होनेसे तद्विपरीत अनन्त और स्थिरफलक ब्रह्मजिज्ञासा उत्तर का- लमें होती हे ब्रह्मशब्दसे समस्तदोषरहित और अनवधिक असंख्यात कल्याणगुणों का सागर पुरुषोत्तम बोधित हे यद्यपि ब्रह्मशब्द सामान्यवाची हे तथापि पशुशब्द चतुष्पाद जन्तुवाचक होनेपरभी “पशुना यजेत” यहापर “छागो वा मन्त्रवर्णात्” इस न्यायसे जिस प्रकार छागरूप पशुका ग्रहण होता है तिसी प्रकार “सदेव” आत्मावेत्यादिमें प्रतिपादित सत्,ब्रह्म, आत्मादि शब्द भी ‘एको ह वै नारायण (अग्र) आसीत् न ब्रह्मा नेशान' इत्यादि नारायणानुवाकके बलसे नारायणरूप विशेषार्थका निर्णायक ब्रह्मशब्द है ॥ ३९ ॥