सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ११२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रामानुज- यह सब "आत्मनि तिष्ठन् " इत्यादि वेदान्त वचनोंसे प्रतिपादित है। अर्चाकी उपासनासे पाप क्षीण होनेपर विभवकी उपासनाके अधिकारी होते हैं अनन्तर व्यूहोपासनाके, तदनन्तर सूक्ष्मोपासनाके, तदनन्तर अन्तर्यामीके साक्षात्कार करनेमें समर्थ होते हैं ॥ ३७ ॥ तदुपासनञ्च पञ्चविधम्, अभिगमनमुपादानमिज्या स्वाध्यायो योग इति श्रीपञ्चरात्रेऽभिहितम् । तत्राभिगमन नाम देवता- स्थानमार्गस्य संमार्जनोपलेपनादि । उपादानं गन्धपुष्पादि- पूजासाधनसम्पादनम् । इज्या नाम देवतापूजनम् । स्वाध्या योनाम अर्थानुसन्धानपूर्वकं मन्त्रजपो वैष्णवसूक्तस्तोत्रपाठो नामसङ्कीर्तनं तत्त्वप्रतिपादकशास्त्राभ्यासश्च । योगो नाम देवतानुसन्धानम् । एवमुपासनाकर्मसमुचितेन विज्ञानेन द्रष्टृ दर्शने नष्टे भगवद्भक्तस्य तन्निष्ठस्य भक्तवत्सलः परमकारुणिकः पुरुषोत्तमः स्वयाथात्म्यानुभवानुगुणनिरवधिकानन्दरूपं पुनरावृत्तिरहितं स्वपदं प्रयच्छति । तथाच स्मृति -मामुपेत्य पुर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् । नाप्नुवन्ति महात्मान संसिद्धि परमां गता " इति॥ स्वभक्तं वासुदेवोऽपि संप्राप्यानन्दमक्षयम् । पुनरावृत्तिरहितं स्वीयं धाम प्रयच्छति॥" इति च ॥ ३८ ॥ उपासनाभी अभिगमन, उपादान, इज्या, स्वाध्याय और योग इन भेदोंसे पाँच प्रकार पाञ्चरात्रमें वर्णित है । मन्दिरोंमें तथा मन्दिरोंके मागोंमे मार्जन और लेप- नादि अभिगमन है। गन्ध पुष्पादि पूजासामग्री प्राप्त करना उपादान है। भगवत्पूजन इज्या है अर्थानुसन्धानपूर्वक अष्टाक्षर और द्वय मन्त्रादिका जप पुरुषसूक्त श्रीसूक्तादि स्तोत्रपाठ, भगवन्नामकीर्तन और तत्त्वप्रतिपादक वेदान्तादि शास्त्रोंका अभ्यास स्वाध्याय है और भगवत् स्वरूपका अनुसन्धान योग है उपासना रूप कर्मसहित ज्ञानसे द्रष्टृ दर्शनादि नष्ट होनेपर भगवद्विषयमें तैलधाराकी समान अविरत भक्तियुक्तको परम कारुणिक पुरुषोत्तम भगवान् स्वकीय स्वरूप और स्वभावको यथावत् अनु- भवके योग्य और निरवधिक आनन्दरूप पुनरावृत्तिरहित परमपद ( वैकुण्ठ ) प्राप्ति- रूप मोक्षको देते हैं ( भगवद्गीतामेंभी कहा है ।) भगवत् प्राप्तिरूप परम सिद्धि