सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १११ ) अन्तर्यामी सकलजीवनियामकः 'य आत्मनि तिष्ठन्नात्मानम- न्तरोयमयति' इति श्रुतेः । तत्र पूर्वपूर्वमूर्त्युपासनया पुरुषार्थपरि- पन्थिदुरितनिचयक्षये सत्युत्तरोत्तरमूर्त्युपास्त्यधिकारः ॥ ३६ ॥ वही वासुदेव परम दयालु और भक्तवत्सल परमात्मा अपने उपासक भक्तोंकी उपासनाके अनुकूल फल देनेके लिये स्वकीय लीलासे पर, व्यूह, विभव, अर्चा और अन्तर्यामी इन पांच भेदोंसे अवस्थित है । अर्चा-दिव्यदेशादि मन्दिरोंकी प्रतिमा है, रामकृष्णादि अवतार विभव हैं, वासुदेव संकर्षण प्रद्युम्न और अनिरुद्ध इन भेदोंसे चतुर्विध व्यूह है । सूक्ष्म सम्पूर्ण षड ऐश्वर्य और षडगुणादि सम्पन्न वासुदेव परब्रह्म है । अपहत पाप्मा ( निष्पाप ) विरज विमृत्युत्वादि तथा सत्यकाम्त्वादि कल्याणगुण एवम् ज्ञान शक्ति बल ऐश्वर्य वीर्य्यतेजप्रभृति गुण हैं । सम्पूर्ण जीवोंके नियामक परमात्मा अन्तर्यामी है “जो परमात्मा आत्मामें रहकर आत्माको अन्त- र्यामी होकर नियमन करता है" इत्यादि श्रुति भी है पूर्वपूर्व मूर्त्तिकी उपासनासे परमपुरुषार्थ लक्षण मोक्ष विरोधी पापका क्षय होकर उत्तर उत्तर मूर्त्तिकी उपासनामें अधिकार होता है ॥ ३६ ॥ तदुक्तम्- “वासुदेवः स्वभक्तेषु वात्सल्यात् तत्तदीहितम् । अधिकार्यानुगुण्येन प्रयच्छति फलं बहु ॥ तदर्थं लीलया स्वीया पञ्च मूर्तीः करोति वै । प्रतिमादिकमर्चा स्यादवता- रास्तु वैभवाः ॥ सङ्कर्षणो वासुदेव प्रद्युम्नश्चानिरुद्धकः । व्यूहश्चतुर्विधो ज्ञेयः सूक्ष्मं सम्पूर्णषड्गुणम् ॥ तदेव वासुदेवा- ख्यं परं ब्रह्म निगद्यते ॥ अन्तर्यामी जीवसंस्थो जीवप्रेरकईरि- त ॥ य आत्मानीतिवेदा-तवाक्यजालैर्निरूपित ॥ अर्चापासनया क्षिप्ते कल्मषेऽधिकृतो भवेत् ॥ विभवोपासने पश्चाद्व्यूहोपास्तौ तत परम् । सूक्ष्मे तदनु शक्त स्यादन्त- र्यामिणमाश्रितुम् ॥" इति ॥ ३७ ॥ कहाभी है-वासुदेव भगवान् भक्तविषयक वात्सल्यसे अधिकारीके अनुगुण भक्तोंको अभिमत बहुविध फलको देते हैं ( इसीके लिये लीलापूर्वक अर्चादि पञ्चरूपसे स्वयं अवस्थित रहते हैं ) प्रतिमादि अर्चा अवतार विभव, संकर्षणादि व्यूह सम्पूर्ण छहों गुणोंसे युक्त परवासुदेव सूक्ष्म, जीवात्मामें स्थित और जीवोंको प्रेरक अन्तर्यामी है