भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

पृष्ठ 107, कुल 316 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 107

( ५८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ रामानुज- क्योपैदेशादिति ) तत्त्वमिति यहा तत्पद और त्वंपद दोनों सविशेष ब्रह्मबोधक हैं अतः प्रकाश और तिमिरके समान अत्यन्त विरुद्ध स्वभावक जीव ओर ब्रह्मका स्वरूपैक्य प्रतिपादन असम्भव होनेसे अर्थापत्तिन्यायका उत्थानही नहीं होसकता है अथवा पूर्वग्रन्थसे ज्ञानके निर्विशेषवस्तु परत्वका तद्विरुद्ध श्रुतिवचनोंसे निरा- करण किया । अब तत्त्वमस्यादिका सामानाधिकरण्य ( अभेद ) सविशेषपक्षमें असम्भव है अतः निर्विशेषज्ञान ही उपाय है ऐसी आशङ्काको जीवात्मा और परमा- त्माके परस्पर अभेदको असम्भव दोषसे दूषित करते हे ( नाप्येक्योपदेशन्थानुपत्त्या इत्यादि ) ( तत्त्वमिति ) अभिप्राय यह है अद्वैतियोंने सामानाधिकरण्य चार प्रकार माने हैं “ सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ” इत्यादि स्वरूपशोधक सत्यादिपदोंको मिथ्यात्वादि ब्यावृत्तिपरत्वरूप वस्तुका ऐक्य एक है तत्त्वमसीत्यादि जीव ब्रह्मका सामानाधिकरण्य अन्वयद्वारा उपलक्षित वस्तुका ऐक्यपरत्व दूसरा हे अचित् और ब्रह्मको “ सर्वं ख ल्विदंब्रह्म ” इत्यादिमें जगत्‌का अगस्त विकल्पानोपैंरूप सामानाधिकरण्य तीसरा है “ ज्योतींषिविष्णुः ” बाधार्थ सामानाधिकरण्य चतुर्थ है तत्र तत्त्वमसीत्यादिमें अन्वयद्वारा प्रतिपादिति सामानाधिकरण्यका निराकरण करते है-( तथाहीत्यादि ) यहा तत् और त्वम् दो पद है तत्पद अपहतपाप्मत्वादि समस्त दोषरहित और सत्यकासत्वादि अनवधिक असंख्ये यकल्याण गुणास्पद, सर्वज्ञ सृष्टिस्थितिसंहारका रण ब्रह्मको प्रतिपादन करता है क्योकि उपक्रम ( आरम्भ ) में तत् ब्रह्म ईक्षण संकल्प किये, इत्यादिमें जगत्कारणतोपयोगि गुणविशिष्ट ब्रह्म प्रकृति है तादृश तत् पदका समानाधिकरण त्वंपद अचित् शरीरक जो जीव है वह जिसका शरीर हो ऐसे शरीरी ब्रह्मका प्रातिपादन करता है। तात्पर्य यह है कि, अचित्पदार्थ जीवका शरीर है और जीव ब्रह्मका शरीर है। तथाच त्वंपद जीवशरीरक ब्रह्मका बोधक है तत्पद सर्वज्ञत्वादि गुणविशिष्ट ब्रह्मका बोधक है । विशेषणद्वयविशिष्ट एक विशेष्य- योधन सामानाधिकरण्य है “ भिन्नप्रवृत्ति निमित्ताना शब्दानामेकस्मिन्नर्थे वृत्तिः सा- मानाधिकरण्यम् ” यह सामानाधिकरण्यका लक्षण है विशेषणद्वयको छोडकर विशेषमान परत्व मानो तो प्रवृत्ति निमित्त ( असाधारणधर्म ) भेद न होनेसे उक्त- सामानाधिकरण्यलक्षणका परित्याग होगा ॥ १९ ॥ ननु सोऽयं देवदत्त इतिवत् तत्त्वमिति पदयोर्विरुद्धभागत्याग- लक्षणयोर्निर्विशेषस्वरूपमात्रैक्यं समानाधिकरणार्थं किं न स्यात् यथा सोऽयमित्यत्र तच्छब्देन देशान्तरकालान्तरस- म्वन्धीपुरुष प्रतीयते इदंशब्देन च सन्निहितदेशवर्त्तमानकालस-