सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री । अथ सर्वदर्शनसंग्रहः । भाषाटीकासमेतः । अथ चार्वाकदर्शनम् । नित्यज्ञानाश्रयं वन्दे निःश्रेयसनिधिं शिवम् । येनैव जातं मह्यादि तेनेवेदं सकर्तृकम् ॥ १ ॥ टीकाकारकृत मङ्गलाचरण । नत्वा श्री मद्ध्यग्रीवं विद्यारण्यविनिर्मितम् ॥ व्याचष्टे प्राकृतगिरा सर्वदर्शनसङ्ग्रहम् ॥ १ ॥ ग्रन्थसमाप्ति तथा ग्रन्थप्रचारके प्रतिबन्धक दुरितकी शान्तिके लिये करत हुए मंगलका शिष्यशिक्षाके लिये उल्लेख करते हैं—"नित्यज्ञानेत्यादि" नित्य जे ज्ञान उसका आश्रय और निश्रेयस जो मोक्ष उसका निधि अर्थात् मोक्षको देने- वाले शिव (महेश्वर) को मैं वन्दना करता हूँ जिनसे पृथिव्यादि जगत् उत्पन्न है। अतएव उन्हीं महेश्वरसे यह जगत् सकर्तृक भी है। यहां पर नित्य ज्ञान पदसे जीवकी व्यावृत्ति की गई आश्रय पदसे ईश्वरको ज्ञानस्वरूपत्वका निषेध किया गया योगरूढि शिवपदसे प्रतिपादनीय देवताविशेषका कल्याण गुणाकरत्व और 'येनैव' इत्यादिस 'यतो वा इमानि भूतानि" इत्यादि श्रुतिप्रतिपादित जगत्कारणत्व और परब्रह्मत्व सूचित किया गया ॥ १ ॥ पारं गतं सकलदर्शनसागराणा- मात्मोचितार्थचरितार्थितसर्वलोकम् । श्रीशार्ङ्गपाणितनयं निखिलागमज्ञं सर्वज्ञविष्णुगुरुमन्वहमाश्रयेऽहम् ॥ २ ॥ देवता नमस्कारके अनन्तर "यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ" इत्यादि श्रुतप्रतिपादित गुरुप्रपत्तिरूप मंगलको करते हैं "पारङ्गतेत्यादि"—समस्त दर्शन रूपी समुद्रके पारङ्गत और आत्मोचित तत्त्वोपदेशसे कृतकृत्य किया संसारको जिन्होंने तम्भूत शार्ङ्गपाणिके पुत्र सर्वज्ञ विष्णुका मैं आश्रयण करता हूँ ॥ २ ॥