सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(२) सर्वदर्शनसंग्रहः। [चार्वाक- श्रीमत्सायणदुग्धाब्धिकौस्तुभेन महौजसा। क्रियते माधवार्येण सर्वदर्शनसंग्रहः ॥ ३ ॥ श्रीसायणवंशरूपी क्षीरसमुद्रमें कौस्तुभमणिके समान महाप्रतापी माधवाचार्य सर्वदर्शन संग्रह ग्रन्थको करते हैं ॥ ३ ॥ पूर्वेषामतिदुस्तराणि सुतरामालोड्य शास्त्राण्यसौ श्रीमत्सायणमाधवः प्रभुरुपन्यासत्सतं प्रीतये। दूरोत्सारितमत्सरेण मनसा शृण्वन्तु ते तत्सज्जना माल्यं कस्य विचित्रपुष्परचितं प्रीत्यै न सञ्जायते ॥ ४ ॥ सायण वंशोद्भव महामान्य श्रीमाधवाचार्यने पूर्वजोंके अतीव दुर्बोध शास्त्रको सम्यक् प्रकार मथन करके सज्जनोंके प्रमोदार्थ सर्वदर्शन संग्रहका उपन्यास किया सज्जन गण निर्मत्सरचित्तसे उसका श्रवण करें, क्योंकि विचित्र फूलोंसे बनी हुई माला किस के मनको आह्लादकारक न होगी ॥ ४ ॥ अथ कथं परमेश्वरस्य निःश्रेयसप्रदत्वमभिधीयते बृहस्पति- मतानुसारिणा नास्तिकशिरोमणिना चार्वाकेण दूरोत्सारितत्वात्। दुरुच्छेदं हि चार्वाकस्य चेष्टितम्। प्रायेण सर्वप्राणिनस्तावत् "यावज्जीवं सुखं जीवेन्नास्ति मृत्योरगोचरः। भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः" इति लोकगाथामनुरुन्धाना नीतिकाsingleमशास्त्रानुसारेणार्थकामावेव पुरुषार्थौ मन्यमानाः पारलौकिकमर्थमपह्नुवानाश्चार्वाकमत- मनुवर्त्तमाना एवानुभूयन्ते अत एव तस्य चार्वाकमतस्य लोका- यतमित्यन्वर्थमपरं नामधेयम् ॥५॥ विषयोन्मुख चित्तोंको देहात्माभिमानादिक स्वाभाविक होनेसे तत्प्रतिपादक सब मतका निषेध्य होनेके कारण प्रथम चार्वाकमतोपन्यास करते हैं--"अथेत्यादि परमेश्वरको मोक्षप्रद कैसे कहते हो? क्योंकि सुरगुरुमतानुयायी नास्तिक शिरोमणि चार्वाकने इसको अत्यन्त दूषित किया है। चार्वाकमतका निराकरण भी अशक्य है। क्योंकि प्रायः सभी लोग "मृत्युसे कोई भी बच नहीं सकते अतः जब तक जीवे तब तक सुखपूर्वक जीवे। जलाकर भस्म किये हुये देहकी पुनः उत्पत्ति कहांसे होगी" इस लोकोक्त्यनुसार नीति शास्त्र तथा कामशास्त्रमे प्रतिपादित काम और अर्थको