भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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पृष्ठ 167

( १६० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [शैव- “अनवच्छिन्नसद्भावं वस्तु यद्देशकालतः । तन्नित्यं विभु चेच्छ- न्तीत्यात्मनो विभुनित्यता ॥” इति ॥ ११ ॥ आगे पशुपदार्थ निरूपण करते हैं-अणुपरिमाणसे भिन्न अर्थात् व्यापक क्षेत्रज्ञादि पदवाच्य जीवात्मा पशु है चार्वाकके समान देह आत्मा नहीं है यदि ऐसा होता तो अन्य दृष्ट वस्तुका अन्य स्मर्ता न हो सकनेसे कालान्तर दृष्टका कालान्तरमें स्मरण न होगा. नैयायिकादिके समान ज्ञानसे प्रकाश्यभी नहीं क्योंकि उनके मतसे आत्मा जड और ज्ञानादिक आगन्तुक गुण हैं 'अहं सुखी' इत्यादि ज्ञानसे आत्मप्रकाश होता है एक- विंशति दुःखध्वंसरूप मुक्तिके अनन्तर शुष्ककाष्ठवत् रहता है परन्तु प्रकाशकके लिये प्रकाशकान्तर, उसके लिये पुनः प्रकाशकान्तर इस प्रकार अनवस्था होगी । अतएव 'आत्मा यदि परिमेय हो तो परिमाणकर्ता कोई अन्य अवश्य होगा तब तो जो पर है वही आत्मा होगा' इत्यादि ग्रन्थकारोंने कहा है जैनके समान देहपरिमाण और बौद्धवत् क्षणिकभी नहीं कह सकते क्योंकि शास्त्रमें 'देशकालसे अपरिच्छिन्न सत्तावान् आत्मा कहा है, अतः देशपरिच्छिन्न न होनेसे व्यापक और कालपरिच्छिन्न न होनेसे नित्य सिद्ध होता है ॥ ११ ॥ नाप्यद्वैतवादिनामिवैक भोगप्रतिनियमस्य पुरुषबहुत्वज्ञाप- कस्य सम्भवात् नापि सांख्यानामिवाकर्त्ता पाशजालापोहने नित्यनिरतिशयदृक्क्रियारूपचैतन्यात्मकशिवत्वश्रवणात् । तदुक्तं श्रीमन्मृगेन्द्रे. "पाशान्ते शिवताश्रुतेरिति । 'चैतन्यं दृक्- क्रियारूपं तदस्यात्मनि सर्वदा । सर्वतश्च यतो मुक्तौ श्रूयते सर्वतोमुखम् ॥” इति ॥ तत्त्वप्रकाशेपि “मुक्तात्मानोऽपि शिवाः किञ्चैते तत्प्रसादतो मुक्ता । सोऽनादिमुक्त एको विज्ञेयः पञ्चमन्त्रतनु ॥” इति ॥ १२ ॥ अद्वैतियोंके समान एक आत्मवादभी नहीं ऐसे हो तो सुखदुःखादि भोगव्यवस्था अनुपपन्न होगी । सांख्यादिवत् कर्तृत्व भोक्तृत्वादिशून्यभी नहीं कर्म्मपाश नष्ट होनेसे नित्य निरतिशय ज्ञानक्रियादिरूप चैतन्यात्मक शिवत्व शास्त्रमें प्रतिपादन किया है अतएव मृगेन्द्रने कहा है कि पाशके नष्ट होनेपर शिवत्व श्रुतिने प्रतिपादन किया है आत्मामें सर्वदा सर्वत्र ज्ञानक्रियारूप चैतन्य रहता है । यतः मुक्तावस्थामभी अवि- वाद श्रुति उक्तरूपको प्रतिपादन करती है इसी प्रकार तत्त्वप्रकाशमें कहा है कि