भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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( १६२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ शैव- उनमें समाप्तकलुष असमाप्तकलुषभेदसे प्रथम दो प्रकार है प्रथमको नष्टकल्मष अधिकारयोग्य पुरुष श्रेष्ठको अनुग्रहकर अनन्तविद्येश्वरादि अष्ट पद प्रदान करते हैं विद्येश्वराष्टक इस प्रकार कहा है । अनन्त १ सूक्ष्म २ शिवोत्तम ३ एकनेत्र ४ एकरुद्र ५ श्रीकण्ठ ६ त्रिमूर्ति ७ और शिखण्डी ८ (द्वितीय) सप्तकोटिसंख्यात असमाप्त कलुषको मन्त्रके अनुग्रहयोग्य करते हैं । इसीको पशवस्त्रिविधा इत्यादि तत्राद्य इत्यन्त श्लोकोंसे प्रतिपादन किया है ॥ १४ ॥ सोमशम्भुनाप्यभिहितम्-विज्ञानाकलनामैको द्वितीयः प्रल- याकलः। तृतीयः सकलः शास्त्रेऽनुग्राह्यस्त्रिविधो मत ॥ तत्राद्यो मलमात्रेण युक्तोऽन्ये मलकर्मभिः । कलादिभूमिपर्यन्तत- त्त्वैस्तु सकलो युतः ॥” इति ॥ प्रलयाकलोऽपि द्विविध पक्वपा- शद्वय तद्विलक्षणश्च । तत्र प्रथमो मोक्षं प्राप्नोति, द्वितीयस्तु , पुर्य्यष्टकयुतः कर्मवशान्नानाविधजन्मभाग् भवति । तदप्युक्तं तत्त्वप्रकाशे-“प्रलयाकलेषु येषामपक्वमलकर्मणी व्रजन्त्येते । पुर्य्यष्टकदेहयुता योनिषु निखिलासु कर्मवशात् ॥ ” इति ॥ पुर्य्यष्टकमपि तत्रैव निर्दिष्टम्-स्यात् पुर्य्यष्टकमन्त करणधीः कर्म करणानीति ॥ विवृत चाघोरशिवाचार्य्येण-पुर्य्यष्टकं नाम प्रतिपुरुषनियतं सर्गादारभ्य कल्पान्तं मोक्षान्तं वा स्थितं पृथिव्यादिकलापर्यन्तत्रिंशत्तत्त्वात्मक सूक्ष्म देहः । तथा चोक्तं तत्त्वसंग्रहे-वसुधाद्यस्तत्त्वगण प्रतिपुन्नियत कलान्तोऽ यम् । पर्यटति कर्मवशाद्भुवनजदेहेष्वयंञ्च सर्वेषु ॥” इति ॥१५॥ पक्व पाश और तद्विपरीत भेदसे प्रलयाकल दो प्रकार रे प्रथम मुक्तिको पाते हैं और द्वितीय अष्टपुर्गीयुक्त होनेसे कर्मवश नाना प्रकारके जन्मोंको पाते हैं । अघोरशिवाचार्यने पुर्य्यष्टकका विवरण इस प्रकार किया है प्रत्येक जीवको सृष्टिसे लेकर प्रलयपर्यन्त अथवा मोक्षपर्यन्त नियमसे वर्तमान पृथिव्यादि कलापर्यन्त तीस तत्त्वरूप सूक्ष्म देह पुर्य्यष्टक है । कर्मवश पृथिव्यादि देहमे जीव भ्रमण किया करते हैं ॥ १५ ॥