भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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-दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १७१ )'

उसकी सम्यक् प्राप्ति जिस प्रत्यभिज्ञासे हो ऐसें महेश्वरकी प्रतिमाके अभिमुखज्ञानका नाम प्रत्यभिज्ञा हे यह बहुव्रीहिसमासमें उत्तरार्थका अर्थ है । लोकमें सोयं चैत्र इत्यादि प्रतिसंधानमे अभिमुख वस्तु विषयके जो ज्ञान है उसको प्रत्यभिज्ञा कहते है । इस शास्त्रमेंभी प्रसिद्ध पुराण आगम अनुमानादिसे ज्ञातपरिपूर्ण शक्तिमान् परमेश्वर अभिमुख होनेपर स्वकीय आत्माके विषयमें परमेश्वर शक्तिका अनुसन्धानद्वारा अवश्य वही परमेश्वर में हू ऐसा जो ज्ञान उत्पन्न होता है उसी प्रत्यभिज्ञाको उप- पादन करता हू ॥ ८ ॥ यदीश्वरस्वभाव एवात्मा प्रकाशते तर्हि किमनेन प्रत्यभिज्ञाप्र- दर्शनप्रयासेनेतिचेत्-तत्रायं समाधि । स्वप्रकाशतया सततम्- वभासमानेऽप्यात्मनि मायावशाद्भागेन प्रकाशने पूर्णतावभा- संसिद्धये दृक्क्रियात्मकशक्त्याविष्करणेन प्रत्यभिज्ञा प्रदर्श्यते। तथा च प्रयोगः अयमात्मा परमेश्वरो भवितुमर्हति ज्ञानक्रिया- शक्तिमत्त्वात् यो यावति ज्ञाता कर्त्ता च स तावतीश्वरः प्रसि- द्धेश्वरवत् राजवद्वा आत्मा च विश्वज्ञाता कर्त्ता च तस्मादी- श्वरोऽयमिति अवयवपञ्चकस्याश्रयणं मायावादेन नैयायिक- मतस्य कक्षीकारात् ॥ ९ ॥ शंका-यदि ईश्वर स्वभावही प्रकाशमान आत्मा है तो प्रत्यभिज्ञाशास्त्र प्रदर्शन क्लेशभी विफल है । समाधान-सदा प्रकाशस्वरूप होनेपरभी आत्मामें मायाबलसे यत्किञ्चित् आकारसे प्रकाश होता है पूर्णरूपसे नहीं अतः पूर्णरूपसे अवभाससि- द्धिके लिये और ज्ञान क्रिया शक्तिके आविष्करणार्थ प्रत्यभिज्ञाप्रदर्शन आवश्यक है ज्ञान क्रिया और शक्तिमान् होनेसे आत्मा परमेश्वर है जो जबतक ज्ञाता और कर्ता रहता है वह तबतक ईश्वर रहता है प्रसिद्ध ईश्वरके समान अथवा राजाके समान आत्माभी जगत्का ज्ञाता और कर्ता है अतः ईश्वर है यद्यपि सिद्धान्तमें प्रतिज्ञा हेतु और उदाहरण है अथवा उदाहरण, उपनय, निगमन रूप अवयवत्रयही माना है तथापि अवयवपञ्चकका जो आश्रयण किया सो मायावादमें नैयायिक पक्ष स्वीकार करके किया है ॥ ९ ॥ तदुक्तमुदयकरसूनुना-'कर्त्तरि ज्ञातरि स्वात्मन्यादिसिद्धे महेश्व रे । अजडात्मा निषेधं वा सिद्धिं वा विदधीत कः ॥ किन्तु मोह-