भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १७३ ) लाकारसङ्कोचवैकल्यादभेद एव । स एव चैतन्यरूप प्रकाश- प्रमातेत्युच्यते ॥ ११ ॥ निरन्तर शिवरूप और सदा द्रष्ट्रूप जाने इति वस्तुके साथ एकताके बिना लोकमें ज्ञानका व्यवहार नहीं होता है प्रकाशका ऐक्य होनेसे एकत्व प्रमाताके साथ भी एकत्व है यही सिद्धान्त है प्रकाश व जिनके प्रकाशसे समस्त प्रकाशित होते इत्यादि श्रुतियोंसे प्रकाश चिदानन्द ईश्वरकी महिमासे सम्पूर्ण पदार्थका प्रकाशकत्व है एवञ्च विषय प्रकाशका नीलपीतादि विषयोपरागभेदहीसे भेद है वस्तुत देश काल और वस्तुसकोच न होनेसे अभेद है वही चैतन्यरूप प्रकाश प्रमाता कहा जाता है ॥ ११ ॥

तथा च पठितं शिवसूत्रेषु "चैतन्यमात्मेति" । तस्य चिद्रू- पत्वमनवच्छिन्नविमर्शत्वमन्योन्मुखत्वमानन्दैकघनत्वं माहै- श्वर्य्यमिति पर्यायः । स एव ह्ययं भावात्मा विमर्शः शुद्धे पार- मार्थिक्यौ ज्ञानक्रिये । तत्र प्रकाशरूपता ज्ञानं स्वतो जग- न्निर्मातृत्वं क्रिया । तच्च निरूपितं क्रियाविकारे--"एष चानन्द शक्तित्वादेवमाभासयत्यमून । भावानिच्छावशादेषा क्रियानि- र्मातृताऽस्य सा॥" इति । उपसंहारेऽपि- "इत्थं तथा घटपटा- द्याकारजगदात्मना । तिष्ठासोरेवमिच्छैव हेतुकर्तृकता क्रिया" ॥ इति । "तस्मिन् सतीदमस्तीति कार्य्यकारणतापि या । सा व्यपेक्षाविहीनानां जडानां नोपपद्यते" ॥ १२ ॥

चैतन्य आत्माके चिद्रूपत्व अपरिमिति विमर्श ( ज्ञान ) त्वन्योन्मुखत्व आन- न्दैकस्वरूपत्व महेश्वरत्व इत्यादि सब पर्याय शब्द हैं शुद्ध स्वरूपमें ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति पारमार्थिक है प्रकाशरूपत्व ज्ञान है स्वतः जगन्निर्मातृत्व क्रिया है ' ईश्वर आनन्दशक्तिमान् होनेसे स्वेतर सब भावको प्रकाश करते हैं स्वेच्छाधीन निर्मातृता क्रिया है इस प्रकार घटपटादि जगतरूपसे स्थित चाहनेवालेकी इच्छा और कर्तृत्व क्रिया है उन महेश्वरकी सत्तासे ( जगतकी सत्ता ) है जगतकी जो कार्य और कारणता है वह निरपेक्ष जडको नहीं हो सकते ॥ १२ ॥