भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 316 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 195

( १८८ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ औलूक्य- प्रत्यक्ष प्रतिपादन, नवमाध्यायमें बुद्धिविशेष प्रतिपादन और दशम अध्यायमें अनुमानभेदका प्रतिपादन है ॥ ३ ॥ तत्र उद्देशो लक्षणं परीक्षा चेति त्रिविधास्य शास्त्रस्य प्रवृत्तिः । ननु विभागापेक्षया चातुर्विध्ये वक्तव्ये कथं त्रैविध्यमुक्तमिति चेन्मैव मस्या विभागरय विशेषोद्देश एवान्तर्भावात् । तत्र द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवाया भावा इति षडेव ते पदार्था इत्युद्देश ॥किमत्र क्रमनियमे कारणम्। उच्यते समस्तपदार्था- यतनत्वेन प्रधानस्य द्रव्यस्य प्रथममुद्देश । अनन्तरं गुणत्वो- पाधिना सकलद्रव्यवृत्तेर्गुणस्य तदनु सामान्यवत्त्वसाम्यात् कर्मण पश्चात्तत्रितयाश्रितस्य सामान्यस्य तदनन्तरं समवा- याधिकरणस्य विशेषस्य अन्ते अवशिष्टस्य समवायस्येति क्रम- नियम ॥ ४ ॥ उद्देश, लक्षण, परीक्षा रूप प्रकारत्रयसे शास्त्रकी प्रवृत्ति हे यद्यपि विभाग मिलाकर चार प्रकार कहना उचित था तथापि सामान्य धर्मका व्याप्य परस्पर विरुद्ध धर्मकथनरूप विभाग उद्देशहीमे अन्तर्भूत होनेसे पृथक् नहीं कहा केवल वस्तुका नाम मात्र कथा करना उद्देश है । यथा द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवायरूप छ भावरूप पदार्थ हैं । उक्त क्रमसे पाठमें नियमभी यह हे कि, गुणादि समस्त पदार्थोंका आश्रय होनेसे प्रथम द्रव्यका उपादान है । अनन्तर गुणत्वरूप उपाधि सम्पूर्ण द्रव्यवृत्ति होनेसे गुणका उपादान है । पश्चात् सामान्यवत्त्व साधर्म्य होनेसे कर्मका उपादान है अनन्तर तीनोंम रहनेवाले सामान्यका उपादान है अनन्तर ममवायका आश्रयविशेषका उपादान है और अन्तमें समवायका उपादान है ॥ ४ ॥ ननु षडेव पदार्था इति कथं कथ्यते अभावस्यापि सद्भावा- दिति चेन्मैवं वोच , नञर्थानुलिखितधीविषयतया भावरूपतया षडेवेति विवक्षितत्वात् । तथापि कथं षडेवेति नियम उपप- द्यते विकल्पानुपपत्ते । तथाहि नियमव्यवच्छेद्यं प्रमितं न वा प्रमितत्वे कथं निषेध. अप्रमितत्वे कथन्तरां, न हि कश्चित्