भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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-दर्शनम्] भाषाटीकासमेतः। ( १९७) द्रव्यबहिर्भाव इति साम्प्रतं निर्गुणस्य तस्य द्रव्यत्वासम्भवेन द्रव्यान्तरत्वस्य सुतरामसम्भवात् ॥ १८ ॥ पहिले जो कहा कि अन्धकारमें भावत्वका निषेध करते हैं सो असङ्गत है क्योंकि उसमें चार प्रकारके विवाद हो सकते हैं ( तथाहि ) मीमांसकमतावलम्बी भट्ट और वेदान्ती लोग तमको द्रव्य कहते हैं । श्रीधराचार्य नीलरूपको आरोपित कहते हैं । आलोकज्ञानाभाव तम है ऐसे प्रभाकरके अनुयायी कहते हैं । नैयायिक लोग आलोकाभावको तम कहते हैं । द्रव्यपक्ष असङ्गत है क्योंकि द्रव्य मानो तो प्रसिद्ध नवद्रव्यके अन्तर्गत मानोगे, किंवा उससे अतिरिक्त मानोगे ? अन्तर्गत मानो तो जिसमें अन्तर्भाव हो उसके सब गुण होने चाहिये परन्तु वे गुण उसमें नहीं हैं । अतिरिक्तभी नहीं मान सकते जब निर्गुण उक्त द्रव्य नहीं तो अतिरिक्तत्व कैसे होगा ॥ १८ ॥ ननु तमालश्यामलत्वेनोपलभ्यमानं तमः कथं निर्गुणं स्यादिति नीलं नभः इतिवत् भ्रान्तिरेवेत्यलं वृद्धवीवधया । अतएव नारोपितरूपं तम अधिष्ठानप्रत्ययमन्तरेणारोपायोगात् बाह्या- लोकसहकारिरहितस्य चक्षुषो रूपारोपे सामर्थ्यानुपलम्भाच्च । न चायमचाक्षुष प्रत्ययः तदनुविधानस्यानन्यथासिद्धत्वात् । न च विधिप्रत्ययवेद्यत्वायो गो भावे इति साम्प्रतं प्रलुम्विना- शावधानादिषु व्यभिचारात् । अतएव नालोकज्ञानाभावः अभावस्य प्रतियोगिग्राहकेन्द्रियग्राह्यतानियमेन मानसत्व- प्रसङ्गात् । तस्मादालोकाभाव एव तम न चाभावे भावधर्मा- ध्यारोपो दुरुपपादः । दुःखाभावे सुखत्वारोपस्य संयोगाभावे विभागत्वाभिमानस्य च दृष्टत्वात् ॥ १९ ॥ यदि कहो तमालके समान श्यामवर्ण उपलब्ध होनेसे निर्गुण कैसे है यहभी नहीं कह सकते अन्धकारमें नीलत्वकी प्रतीति केवल भ्रम है आरोपित नीलरूपभी नहीं कहसकते क्योंकि अधिष्ठानका प्रत्यक्षके बिना आरोप असम्भव है । चाक्षुष प्रत्यक्षके लिये आलोक संयोगकी अपेक्षा रहती है अन्धकार प्रत्यक्ष आलोक शून्य चक्षुसे होता है अत आरोपसहकारी निरपेक्ष चक्षुरूपके आरोपमें असमर्थ है ।