भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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पृष्ठ 205

( १९८ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ औलूक्य- अन्धकारका प्रत्यक्ष चक्षुरिन्द्रियादिजन्यभी नहीं मान सकता चक्षु संयोगान्तर भावी होनेसे अनन्यथासिद्ध हे । अस्ति इत्यादि विधिसत्ताप्रतीतिके अयोग्य भाव अंधकार है ऐसा कहनाभी असगत है प्रलयविनाशादिमेभी अतिप्रसक्ति हो जायगी आलोक ज्ञानाभावपक्षभी अयुक्त हे जिस इन्द्रियसे जिस वस्तुका ग्रहण होता है उसी इन्द्रियसे उसके अभावकाभी ग्रहण होता है ऐसा नियम है अतः ज्ञानको मानसप्रत्यक्ष होनेसे तद्भावरूप अन्धकारकोभी मानसत्व प्रसङ्ग होगा-अतः तमः आलोकाभावही है। यदि अभावरूप होगा तो अभावमे नीलत्वादि भावधर्मका आरोप असम्भव होगा यहभी नहीं कह सकते जिस प्रकार भारादिके उतार देनेसे दुःखाभावमें मै सुखी हूं इत्यादि सुखत्वका और सयोगके अभावमें विभागका अभि मान होता है उसी प्रकार अभावरूप अन्धकारमेंभी भावधर्मके आरोपमें बाधक नहीं है ॥ १९ ॥ न चालोकाभावस्य घटाद्यभाववद्रूपवद्भावत्वेनालोकसापेक्ष- चक्षुर्जन्यज्ञानविषयत्वं स्यादित्येपितव्यं यद्ग्रहे यदपेक्षं चक्षु- स्तदभावग्रहेऽपि तदपेक्षत इति न्यायेनालोकग्रहे आलोका- पेक्षाया अभावेन तदभावग्रहेऽपि तदपेक्षाया अभावात् । न चाधिकरणग्रहणावश्यम्भावः अभावप्रतीतावधिकरणग्रहणा- वश्यम्भावानङ्गीकारादपरथा निवृत्त कोलाहल इति शब्दप्रध्वं सप्रत्यक्षो न स्यादिति अप्रामाणिकं तव वचनम् । पर तत्सर्वम- भिसन्धाय भगवान् कणाद् प्रणिनाय सूत्रं 'द्रव्यगुणकर्मनिष्प- त्तिवैधर्म्यादभावस्तम' इति प्रत्ययवेद्यत्वेनापि निरूपितम् ॥२०॥ आलोकका अभाव तम है तो जिस प्रकार घटादि रूपवान्के प्रत्यक्षमे आलोककी अपेक्षा है उसी प्रकार आलोकाभावप्रत्यक्षमेंभी आलोककी अपेक्षा होनी चाहिये यहभी नहीं कह सकते क्योंकि जिस वस्तुके ग्रहणमें जो अपेक्षित हो उसके अभावमेंभी उसकी अपेक्षा होती है ऐसा नियम है आलोकके प्रत्यक्षमें आलोकान्तरकी अपेक्षा न होनेसे आलोकाभावके प्रत्यक्षमेंभी आलोककी अपेक्षा नही होगी अभावप्रत्यक्षमें अधिकरणप्रत्यक्षकीभी आवश्यकता नहीं है अतएव कोलाहल नष्ट होगया इत्यादि स्थलमें शब्दध्वसका प्रत्यक्ष होता है अन्यथा यह अप्रामाणिक होजायगा । इसी अभिप्रायसे भगवान् कणादमुनिनेभी द्रव्यादिके धर्मसे विलक्षण होनेके कारण तमको अभाव माना है ॥ २० ॥