सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
पृष्ठ 242, कुल 316 में से
संदर्भ में पढ़ें[Header] दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( २३६ )
विज्ञानसामग्रीजन्य हों तदतिरिक्तकारणअजन्यत्वही प्रमामें स्वतस्त्वका निर्वचन है अनुमानभी है घटवत् अप्रमात्वका अधिकरण न होनेसे प्रमा विज्ञानसामग्रीसे जन्यहोकर तद्भिन्न सामग्रीजन्य नहीं है । उदयनके अनुमानसे परतस्वाशंकाभी नहीं कहसकते । प्रमा दोषसे अतिरिक्त ज्ञानहेत्वतिरिक्तजन्य नहीं, ज्ञान होनेसे अप्रमावत् इत्यादि सत्प्रतिपक्षित है ज्ञानसामग्रीमात्रसे प्रमाकी उत्पत्ति सम्भव होनेसे अतिरिक्त गुण अथवा दोषकी कल्पना करना गौरवभी है ॥ ३३ ॥ ननु दोषस्याप्रमाहेतुत्वेन तद्भावस्य प्रमां प्रति हेतुत्वं दुर्नि- वारमिति चेत् न दोषाभावस्याप्रमाप्रतिबन्धकत्वेनान्यथासिद्ध- त्वात् ॥ “तस्माद् गुणेभ्यो दोषाणामभावस्तदभावतः । अप्रामाण्यद्वयासत्त्वं तेनोत्सर्गो नयोदित ॥” इति । तथा प्रमाज्ञप्तिरपि ज्ञानज्ञापकसामग्रीत एव जायते । न च संशया- नुदयप्रसङ्गो बाधक इति युक्तं वक्तुं सत्यपि प्रतिभासपुष्कल- कारणे प्रतिबन्धकदोषादिसमवधानात् तदुपपत्तेः ॥ किञ्च तावकमनुमानं स्वतः प्रमाणं न वा । आद्ये अनैकान्तिकता, द्वितीये तस्यापि परतः प्रामाण्यमेवं तस्य तस्यापीत्यनवस्था दुरवस्था स्यात् ॥ ३४ ॥ यदि कहो दोष अप्रमाका कारण हुआ तो दोषाभाव प्रमाके प्रति अवश्य कारण होगा यहभी नहीं कह सकते क्योंकि दोषाभाव अप्रमाके प्रतिबन्धक होनेसे जन्यथा सिद्ध है । गुणसे दोषका अभाव तदभावसे अप्रामाण्यद्वयसत्ता प्रमाज्ञानभी ज्ञानज्ञाप- कसामग्रीसे उत्पन्न होता है । संशयानुदयप्रसंगभी बाधक नहीं कह सकते क्योंकि प्रतिभासका समस्त कारण रहनेपरभी प्रतिबन्धकदोषवश संशय उपपन्न होता है । आपका अनुमान स्वतः प्रमाण है या नहीं ? प्रथम पक्षमें प्रामाण्यका परतस्त्व यहां व्यभिचरित हो गया द्वितीयपक्षमें उक्तअनुमानको प्रमाणान्तरसे प्रामाण्य है उसकोभी अन्यसे इत्यादि अनवस्था होगी ॥ ३४ ॥ यदत्र कुसुमाञ्जलावुदयनेन झटिति प्रचुरप्रवृत्ते प्रामाण्यानि- श्चयाधीनत्वाभावमापाद्यता प्रण्यगादि । प्रवृत्तिर्हीच्छामपेक्षते तत्प्राचुर्य्यं चेच्छाप्राचुर्य्यम्, इच्छा चेष्टसाधनताज्ञानम्, तच्चेष्ट-