भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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( २५४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ पाणिनि-

द्विरोधः ॥ तस्मात् द्वयं सत्यं परं ब्रह्मतत्त्वं सर्वशब्दार्थ इति स्थितम् ॥ ३३ ॥ पाणिनिआचार्यको जाति ओर द्रव्य दोनों अभिमत हैं जाति पदार्थ मानकर जा- त्याख्यायामित सूत्र प्रणयन किये द्रव्य पदार्थ मानकर सरूप सूत्रका आरम्भ किये व्याकरणके सर्वोपयोगित्व होनेसे दोनों पक्षमें कोई विरोध नहीं हे अतः परब्रह्म- त्वही सम्पूर्ण शब्दका अर्थ है ॥ ३३ ॥ तदुक्तम्- "तस्माच्छक्तिविभागेन सत्यं सर्वं सदात्मकम् । एकोऽर्थ शब्दवाच्यत्वे बहुरूपः प्रकाशते ॥ ' इति । सत्यस्वरूपमपि हरिणोक्तं सम्बन्धसमुद्देशे- "यत्र द्रष्टा च दृश्यं च दर्शनं चाविकल्पितम् । तस्यैवार्थस्य सत्यत्वमाहु- स्त्रय्यन्तवेदिन ॥" इति । द्रव्यसमुद्देशेऽपि- "विकारोपगमे सत्यं सुवर्णं कुण्डलं यथा । विकारापगमो यत्र तामाहुः प्रकृतिं पराम् ॥ " इति ॥ अभ्युपगताद्वितीयत्वनिर्वाहाय वाच्यवाचकयोरविभाग प्रदर्शित । "वाच्या सा सर्वशब्दानां शब्दाच्च न पृथक् ततः । अपृथक्त्वेऽपि सम्बन्धस्तयोर्नाना- त्मनोरिव ॥" इति ॥ ३४ ॥ अतः जातिव्यक्तिरूप शक्तिभेदसे शब्दका वाच्य एक, सदात्मक, सत्य, अनेक रूपसे प्रतीत होता है जिसमें द्रष्टा, दृश्य, दर्शन, विकल्प न हों उस अर्थको वेदान्ती लोग सत्य कहते हैं । तथाच श्रुति' 'यत्रत्वस्यसर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत् कं बिजानीयादिति ' द्रव्यसमुद्देशमेंभी विकारयुक्त होनेसे सत्य सुवर्णका जिस प्रकार कुण्डल होता है विकारशून्य जिस अवस्थामें हो उसीको प्रकृति कहते हैं अद्वितीय- त्वरक्षाके लिये वाच्यवाचकका अविभागभी दिखाया है शब्दका वाच्य अर्थ शब्दसे यद्यपि पृथक नहीं तथापि अनेक आत्माके समान परस्परसम्बन्ध होता है ॥ ३४ ॥ तत्तदुपाधिपरिकल्पितभेदबहुलतया व्यवहारस्याविद्यामात्र- कल्पितत्वेन प्रतिनियताकारोपधीयमानरूपभेदं ब्रह्मतत्त्वं सर्वशब्दविषयः अभेदे च पारमार्थिके संवृत्तिरशाद्व्यवहारद-

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