भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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-दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( २५३ ) है। शब्दार्थ सम्बन्ध नित्य है इस वार्त्तिकव्याख्यानावसरमे द्रव्य नित्य हे इन ग्रन्यसे जगत्योपाधियुक्त ब्रह्मतत्त्वको द्रव्यशब्दार्थ भाष्यकारने कहा है ॥ ३० ॥ जातिशब्दार्थवाचिनो वाजप्यायनस्य मते गवादय शब्दा भिन्नद्रव्यसमवेतजातिमभिदधति। तस्यामवगाह्यमानायां तत्स- म्बन्धात् द्रव्यमवगम्यते शुक्लादयः शब्दा गुणसमवेतां जात- माचक्षते गुणे तत्सम्बन्धात् । प्रत्यय द्रव्यसम्बन्धिसम्बन्धात् सज्ञाशब्दानामुत्पत्तिप्रभृत्याविनाशात् शैशव्यकौमारयौवना- द्यवस्थादिभेदेऽपि स एवायमित्यभिप्रत्ययबलात् सिद्धा देवदत्त- त्वादिजातिरभ्युपगन्तव्या क्रियास्वपि जातिरालक्ष्यते सैव पठ- तीत्यादावनुवृत्तप्रत्ययस्य प्रादुर्भावात् ॥ ३१ ॥ जातिशब्दार्थ वाची वाजप्यायनके मतमें गवादिगब्द अनेकव्यक्तियोंसे समवेत जातिको बोधन करते है उस जातिके ग्रहण होनेपर तत्सम्बद्धद्रव्यका ग्रहण होता है शुक्लादिशब्द गुणसमवेत जातिको बोधन करते हैं तत्सम्बन्धसे गुणग्रहण होता है द्रव्यसम्बन्धी सम्बन्धसे प्रत्ययशब्दी जातिबोधक है सज्ञाशब्दकोभी उत्पत्तिसे लेकर विनाशपर्यन्त बाल्य यौवन वार्धक्यावस्थाभेदमेभी स एव अयम् इस प्रत्य- भिज्ञासे सिद्ध देवदत्तत्वादि जातिबोधकत्व है क्रियामेंभी पठतीत्यादिमे अनुवृत्त प्रत्ययजनक जाति है ॥ ३१ ॥ द्रव्यपदार्थवादिव्याडिनये शब्दस्य व्यक्तिरेवाभिधेयतया प्रतिभासते । जातिस्तूपलक्षणतयेति नानन्त्यादिदोषावकाश- ३२ द्रव्यपदार्थवादी व्याडीके मतमे शब्दका वाच्य द्रव्यही है जाति उपलक्षणतया प्रतीत होता है एवञ्च जाति एक होनेसे तदुपलक्षित व्यक्तिमेंभी आनन्त्यादि दोष नही है ॥ ३२ ॥ पाणिन्याचार्यस्योभय सम्मतं यतो जातिपदार्थमभ्युपगम्य ‘जात्याख्यायामेकस्मिन् बहुवचनमन्यतरस्याम्’ इत्यादिव्यव- हारः द्रव्यपदार्थमङ्गीकृत्य ‘सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ ’ इत्यादि व्याकरणस्य सर्वपार्षदत्वान्मत्तद्वयाभ्युपगमे न कश्चि-

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