सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २५२ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ पाणिनि- धातुरिति पक्षेऽपि 'जातिमन्ये क्रियामाहुरनेकव्यक्तिवर्तिनीम्' इति जातिपदार्थनयानुसारेणानेकव्यक्तिक्रियासमुद्देशे क्रि- याया जातिरूपत्वप्रतिपादनात् धात्वर्थः सत्ता भवत्येव तस्य भावस्त्वतलाविति भावार्थे त्वतलादीनां विधानात् सत्तावा- चित्वं युक्तं सा च सत्ता उदयव्ययवैधुर्यान्नित्या सर्वस्य प्रपञ्चस्य तद्विवर्त्ततया देशतः कालतो वस्तुतश्च परिच्छेदराहित्यात् सा सत्ता महानात्मेति व्यपदिश्यत इति कारिकाद्वयार्थः ॥ २९ ॥ हरिनेभी कहा है कि आश्रयभूतसम्बन्धी भेदसे कल्पित भेदवाली सत्ताही गवादिमे जाति है । सत्तासे भिन्न गोत्वादि वास्तवमें अन्य नहीं है गोत्वभी गोसत्ताही है अन्य नहीं एवम् अश्वसत्ताही अश्वत्वादि वाच्य है । गवादिभेदसे भिन्न सत्तारूप जातिमें समस्त गवादिशब्दवाचकत्वेन स्थित है । प्रातिपदिकार्थ सत्ता प्रसिद्ध है । धातुभाववाचक है इस पक्षमें धात्वर्थभी सत्ता है क्रियावाचकपक्षमें अनेकव्य- क्तियोंमें वृत्ति क्रियाको जाति कहते है इस न्यायमे वात्वर्थभी सत्ता होती है । अतएव भावार्थमें त्वतल विधानसगत होते है वही सत्ता उत्पत्तिविनाशशून्य होनेसे नित्य है । समस्त प्रपञ्च उसके विवर्त होनेसे देश, काल, वस्तुसे अप रिच्छेद्य होनेसे महान् आत्मा कहलाती है ॥ २९ ॥ द्रव्यपदार्थसंविल्लक्षणं तत्त्वमेव सर्वशब्दार्थ इति सम्बन्धसमु- देशे समर्थितम्-“सत्यं वस्तु तदाकारैरसत्यैरवधार्यते । अस- त्योपाधिभिः शब्दै सत्यमेवाभिधीयते ॥ अध्रुवेण निमित्तेन देवदत्तगृहं यथा । गृहीतं गृहशब्देन शुद्धमेवाभिधीयते ॥” इति । भाष्यकारेणापि 'सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे' इत्येतद्वार्त्ति- कव्याख्यानावसरे 'द्रव्यं हि नित्यमित्यनेन ग्रन्थेन असत्योपा- ध्यवच्छिन्नं ब्रह्मतत्त्वं द्रव्यशब्दवाच्यं द्रव्यशब्दार्थ' इति निरू- पितम् ॥ ३० ॥ सम्बन्ध समुद्देशमें भी द्रव्यपदार्थ संवित् लक्षणहीको तत्त्वसमर्थन किया तत्तदा- कार असत्यवस्तुमे सत्य वस्तुका निर्णय होता है असत्योपाधिरूपशब्दसे सत्यका अभिधान होता है । जिस प्रकार काकवत् देवदत्तगृह इत्यादि स्थलमें अध्रुव काकादि निमित्तसे देवदत्तगृह उपलभ्य होता है। तद्वत् गृहशब्दसेभी शुद्धतत्त्वका अभिधान होता