भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( २५१ ) यदि समस्तशब्दोंका सत्ताही अर्थ हो तो सब पर्याय होनेसे अनेक शब्दोंका प्रयोगही असंगत होगा । अभियुक्तोंनेभी कहा है पर्याय शब्दोंका युगपत् प्रयोग इष्ट नहीं है । यतः पर्याय ( एक-एक ) अर्थके बोधक होते हैं मिलकरके नहीं होते हैं अतः यह पक्ष विचार योग्यभी नहीं है ॥ २७ ॥ तदेतद्गगनरोमन्थकल्पं नीललोहितपीताद्युपरञ्जकद्रव्यभेदेन स्फटिकमणेरिव सम्बन्धिभेदात् सत्तायास्तदात्मना भेदेन प्रतिपत्तिसिद्धौ गोसत्तादिरूपगोत्वादिभेदनिबन्धनव्यवहारवैल- क्षण्योपपत्तेः । तथाचाप्तवाक्यम्-“स्फटिकं विमलं द्रव्यं यथा- युक्तं पृथक् पृथक् । नीललोहितपीताद्यैस्तद्वर्णमुपल- भ्यते ॥ ” इति ॥ २८ ॥ यहभी आकाशचर्वणके समान है क्योंकि नीलपीतादि वस्तुके सन्निधानमें जिस प्रकार नीलपीतादिरूप भासित होता है तिसी प्रकार व्यञ्जकध्वनिभेद होनेसे सत्ताभी उसके साथ भिन्न होकर गोसत्तारूप गोत्वादि व्यवहार वैलक्षण्य हो जाते हैं । आप्तवाक्यभी है कि जिस प्रकार निर्मल स्फटिक नील, लोहित, और पीतादि उपरञ्जक भेदसे तत्तद्वर्ण प्रतीत होता है तिसी प्रकार व्यञ्जकवर्णभेदसे सत्ताजा- तिभी भिन्न २ रूप प्रतीत होती है ॥ २८ ॥ तथा हरिणाप्युक्तम्-“सम्बन्धिभेदात् सत्तैव भिद्यमाना गवा- दिषु । जातिरित्युच्यते तस्यां सर्वे शब्दा व्यवस्थिताः ॥ तां प्रातिपदिकार्थं च धात्वर्थं च प्रचक्षते । सा सत्ता सा महा- नात्मा तामाहुस्त्वतलादयः ॥” इति । आश्रयभूतैः सम्बन्धि- भिर्भिद्यमाना कल्पितभेदा गवाश्वादिषु सत्तैव महासामान्य- मेव जातिः । गोत्वादिकमपरं सामान्यं परमार्थतस्तत्तो भिन्नं न भवति । गोसत्तैव गोत्वं नापरमन्वायि प्रतिभासते । एवम- श्वसत्ता अश्वत्वमित्यादि वाच्यम् ॥ एवञ्च तस्यामेव गवादि- भिन्नायां सत्तायां जातौ सर्वे गोशब्दादयो वाचकत्वेन व्यव- स्थिताः प्रातिपदिकार्थश्च सत्तेति प्रसिद्धम् । भाववचनो धातु रिति पक्षे भावः सत्तैवेति धात्वर्थः सत्ता भवत्येव क्रियावचनो