सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २५० ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ पाणिनि- स्वाध्यायः सकृत्पठ्यमानो नावधार्यते अभ्यासेन तु स्फुटा- वसाय यथा वा रत्नतत्त्वं प्रथमप्रतीतौ स्फुटं न चकास्ति चरमे चेतसि यथावदभिव्यज्यते ।"नादैराहितबीजायामन्त्येन ध्वनिना सह ॥ आवृत्तिपरिपाकायां बुद्धौ शब्दोऽवधार्यते ॥” इति प्रामाणिकोक्तेः ॥ २५ ॥ यदि कहो उक्त दोष स्फोटपक्षमेंभी तुल्य होनेसे घाटपरकीकुटीम दीप जलाकर प्रभात मानना है । यहभी वैषम्य हास मनोरथ मात्र है अभिव्यञ्जकत्वाविशेष होनेपरभी प्रथम ध्वनि स्फोटको किञ्चित् अभिव्यञ्जन करेगी उत्तरोत्तर स्फुट स्फुटतर यथा एकवार पढनेसे अर्थ ज्ञान नहीं होता परन्तु अभ्याससे स्फुटावबोध होता है जिस प्रकार रत्नपरीक्षामें एकवार देखनेसे सम्यक् परिज्ञान नहीं होता पुनः पुनः देखनेसे यथावत् प्रकाशित होता है । नादसे आहित सस्कार आवृत्तिसे परिपक्व बुद्धिमें अन्त्यध्वनिके साथ शब्द ( स्फोट ) प्रकाशित होता है इत्यादि प्रामाणिक वचनभी है ॥ २५ ॥ तस्मादस्माच्छब्दादर्थं प्रतिपद्यामह इति व्यवहारवशाद्वर्णाना- मर्थवाचकत्वानुपपत्तेः प्रथमे काण्डे तत्रभवद्भिर्भर्तृहरिभिरभि- हितत्वात् निरवयवमर्थप्रत्यायकं शब्दतत्त्वं स्फोटाभावमभ्युप- गन्तव्यमिति ॥ एतत्सर्वं परमार्थसंविल्लक्षणसत्ता जाति- रेव सर्वेषा शब्दानांमर्थ इति प्रतिपादनपरे जातिसमुद्देशे प्रति- पादितम् ॥ २६ ॥ अत इस शब्दसे अर्थप्रत्यय होता है इत्यादि व्यवहारसे वर्णको वाचकत्व असम्भव होनेके कारण तथा भर्तृहरिके वचनोंसे निरवयव स्फोट अवगन्तव्य है । यह सब परमार्थ संवित्स्वरूप सत्ताजातिही सभी शब्दोंका अर्थ है इत्येतत्प्रतिपादक जातिसमु- देशमें स्पष्ट है ॥ २६ ॥ यदि सत्तवै सर्वेषां शब्दानांमर्थस्तर्हि सर्वेषां शब्दाना पर्या- यता स्यात् तथा च क्वचिदपि युगपन्त्रिचतुरपदप्रयोगायोग इति महच्चातुर्यमायुष्मतः । तदुक्तम्-“पर्यायाणां प्रयोगो हि यौग- पद्येन नेष्यते । पर्यायेणैव ते यस्माद्वदन्त्यर्थं न संहता ”इति ॥ तस्मादयं पक्षो न क्षोदक्षम इति चेत् ॥ २७ ॥