सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऽदर्शनम् ] पदेशः । ये पदार्था एकस्मिन् प्रदेशे सहावस्थिततया बहवोऽ- नुभूयन्ते यथा एकस्मिन् प्रदेशे सहावस्थिततयानुभूयमानेषु धवखदिरपलाशादिषु समूहव्यपदेशः यथा वा गजनरतुरगादिषु न च ते वर्णास्तथानुभूयन्ते उत्पन्नप्रध्वस्तत्वात् ॥ २३ ॥ यह जलमें डूबनेवालेको तृणको अवलम्बनके समान है क्योंकि विकल्पसह है क्या वर्णमात्रमें पद प्रत्यय है या वर्णसमूहमें ? प्रथम कह नहीं सकते जिस प्रकार भिन्नभिन्न पुष्पोंके बीचमें सूत्रके विना मालाकी प्रतीति नहीं होती तिसी प्रकार परस्पर विलक्षण वर्णमालामें निमित्तान्तरके विना एक पदप्रतीति असम्भव है । वर्ण क्षणिक होनेसे द्वितीयभी नहीं कह सकते समुदायव्यवहार वहीं होता है जहाँपर पदार्थ एक देशमें स्थित होकर सबके अनुभवविषय हों यथा एकदेशस्थ नाना- वृक्षोंम समुदाय ( वन ) व्यवहार जिस प्रकार मनुष्य गज लोग तुरंगों मे समुदाय ( सेना ) व्यवहार होता है तिसी प्रकार उत्पन्नविनाशी होनेसे वर्णमे समुदायकी उपलब्धि नहीं होती है ॥ २३ ॥ अभिव्यक्तिपक्षेऽपि क्रमेणैवाभिव्यक्तौ समूहासम्भवात् । नापि वर्णेषु काल्पनिक समूहः कल्पनीयः परस्पराश्रयप्रसङ्गात् । एकार्थप्रत्यायकत्वसिद्धौ तदुपाधिना वर्णेषु पदत्वप्रतीति तत्सिद्धावेकार्थप्रत्यायकत्वसिद्धिरिति । तस्माद्वर्णानां वाचक- त्वासम्भवात् स्फोटोऽभ्युपगन्तव्यः ॥ २४ ॥ अभिव्यक्तिपक्षमेंभी क्रमिक होनेसे समूह असम्भव है । कल्पित समूहभी वर्णके विषयमें नहीं मान सकते क्योंकि अन्योन्याश्रयदोष आता है । तथथा एकार्थ बोधकत्व सिद्ध होनेपर तादृश उपाधिसे पदत्वसिद्धि होगी, पदत्व सिद्धि होनेपर एकार्थ बोधकत्व सिद्धि होगी अत वर्णको वाचकत्व असम्भव होनेमे अतिरिक्त स्फोट मानना होगा ॥ २४ ॥ ननु स्फोटवाचकतापक्षेऽपि प्रागुक्तविकल्पप्रसरेण घट्टकुटी- प्रभातायितमिति चेत्तदेतन्मनोराज्यविजृम्भणं वैषम्यसम्भवात्॥ तथाहि अभिव्यञ्जकोऽपि प्रथमो ध्वनि स्फोटमस्फुटमभिव्य- नक्ति उत्तरोत्तराभिव्यञ्जकक्रमेण स्फुटं स्फुटतरं स्फुटतमं यथा