सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्यक्त स्फोटको अर्थ प्रतिपादक मानो तो क्या अभिव्यञ्जक प्रत्येक वर्ण अभि- व्यक्ति करते हैं या समुदाय ? उभयथा वाचकपक्षमें उक्त दोष स्फोट पक्षमेंभी समान है। अतएव कुमारिलभट्टने कहा है कि जिनके मतम निरवयवस्फोटवर्णमे अभिव्यक्त होता है सो भी उक्तपूर्वपक्षसे मुक्त नहीं ॥ २१ ॥ विभक्त्यन्तेष्वेव वर्णेषु पाणिनिना ते विभक्त्यन्ताः पदमिति गौतमेन च पदसंज्ञाया विहितत्वात् सङ्केतग्रहणेनानुग्रहवशाद्व- र्णेष्वेव पदबुद्धिर्भविष्यति तर्हि सर इत्येतस्मिन् पदे यावन्तो वर्णास्तावन्त एव रस इत्यत्रापि एवं वनं नवं नदी दीना रामो मारो राजा जारेत्यादिष्वर्थभेदप्रतीतिर्न स्यादिति चेन्न क्रम- भेदेन भेदसम्भवात् । तदुक्तं तौतातितैः-“यावन्तो यादृशा ये च यदर्थप्रतिपादने । वर्णाः प्रज्ञातसामर्थ्यास्ते तथैवावबो- धकाः” इति ॥ तस्माद्यस्योभयोः समो दोषो न तेनैकश्चोद्यो भवतीति न्यायात् वर्णानामेव वाचकत्वोपपत्तौ नातिरिक्तस्फो- टकल्पनावकल्पते इति चेत् ॥ २२ ॥ गोतम और पाणिनि दोनो विभक्त्यन्तकोही पदसंज्ञा कहे हैं यदि संकेतवश वर्णहीम पदबुद्धि मानो तो सर इस पदम जितने वर्ण है उतनेही वर्ण रस इस पदमभी हैं एव नदी दीन राम मार राजा जार इत्यादिमें हैं एवञ्च परस्पर अर्थभेद न होगा यहभी नहीं सन्निवेश क्रमभेदसे अर्थभेदभी हो सकता है यादृश आनुपूर्वी युक्त जितने वर्ण यादृश अर्थबोधनम समर्थ हों वह उसी क्रमसे अर्थको बोधक होते हैं इत्यादि तोतातित ( कश्चित् जैन ) नेभी कहा है दोनों पक्षमें समान दोष हो तो एकके ऊपर आक्षेप नहीं किया जाता है इस न्यायसे वर्णको वाचकत्व हो जायगा अतिरिक्त स्फोटकल्पना व्यर्थ है ॥ २२ ॥ तदेतत् काशकुशावलम्बनकल्पनं विकल्पानुपपत्तेः कि वर्ण- मात्रे पदप्रत्ययावलम्बनं वर्णसमूहे वा । नाद्यः परस्परविलक्ष- णवर्णमालायामभिन्न निमित्तं पुष्पेषु विना सूत्रं मालाप्रत्ययव- दित्येकं पदमिति प्रतिपत्तेरनुपपत्ते । नापि द्वितीय उच्चारि- तप्रध्वस्तानां वर्णाना समूहभानासम्भवात् । तत्र हि समूहव्य-