भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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( २६६ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ सार्थ-

अथ सांख्यदर्शनम् ॥ १४ ॥ अथ सांख्यैराख्याते परिणामवादे परिपन्थिनि जागरूके कथ- ङ्कारं विवर्त्तवाद आदरणीयो भवेदेष हि तेषामाघोष । सङ्क्षे- पेण हि सांख्यशास्त्रस्य चतस्रो विधाः सम्भाव्यन्ते । कश्चिदर्थ प्रकृतिरेव, कश्चिद्विकृतिरेव, कश्चिद्विकृति प्रकृतिश्च, कश्चि- दनुभय इति । तत्र केवला प्रकृति प्रधानपदेन वेदनीया मूलप्रकृतिः नासावन्यस्य कस्याचिद्विकृतिः ॥ १॥ परिणामवादी सांख्य जबतक जीवित है तबतक शाब्दिकोंका विवर्त्तवाद कैसे आदरणीय होगा उनका यह डिंडिमा है कि संक्षेपसे सांख्यशास्त्रमें पदार्थके चार क्रम हैं कोई पदार्थ केवल प्रकृति और कोई पदार्थ केवल विकृति कोई २ प्रकृति विकृतिरूप और कोई उभय भिन्न हैं। प्रधानपदबोध्य मूलप्रकृति केवल प्रकृति है वह अन्यका विकार नहीं ॥ १ ॥ प्रकरोतीति प्रकृतिरिति व्युत्पत्या सत्त्वरजस्तमोगुणानां साम्यावस्थाया अभिधानात् । तदुक्तं 'मूलप्रकृतिरविकृतिः' इति । मूल चासौ प्रकृतिश्च मूलप्रकृतिः । महदादे कार्यकला- पस्यासौ मूलं न त्वस्य प्रधानस्य मूलान्तरमस्ति अनवस्था- पातात् । न च बीजाङ्कुरवदनवस्थादोषो न भवतीति वाच्य प्रमाणाभावादिति भावः ॥ २ ॥ अतिशयरूपसे कार्यको करे इत्यर्थक प्रकृतिपद सत्त्वादि गुणत्रयकी न्यूनाधिक भावनापन्न अवस्था विशेषबोधक है मूलरूप प्रकृति अर्थात् महदादि समस्त कार्यों- का मूल कारण जिसका कारणान्तर नही अन्यथा अनवस्थादोष होगा बीजाङ्कुर- न्यायसे अनवस्थादोष परिहार नहीं कर सकते क्योंकि बीजाङ्कुरन्यायप्रमाणसद्भावमें प्रवृत्त होना है ॥ २ ॥ विकृतयश्च प्रकृतयश्च महदहङ्कारतन्मात्राणि । तदप्युक्तं, महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्तेति । अस्यार्थः प्रकृतयश्च ता विकृतयश्चेति प्रकृतिविकृतयः सप्त महदादीनि तत्त्वानि ॥