भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( २९७ ) तत्रान्तःकरणादिपदवेदनीयं महत्तत्त्वमहङ्कारस्य प्रकृति- मूलप्रकृतेस्तु विकृति ॥ एवमहङ्कारतत्त्वमभिमानापरनाम- धेयं महतो विकृतिः प्रकृतिश्च तदेवाहंकारतत्त्वं तामसं सत् पञ्चतन्मात्राणां सूक्ष्माभिधानां तदेव सात्त्विकं सत् प्रकृतिरे- कादशेन्द्रियाणां बुद्धीन्द्रियाणां चक्षुःश्रोत्रघ्राणरसनात्वगा- ख्यानां कर्मेन्द्रियाणां वाक्पाणिपादपायूपस्थाख्यानामुभया- त्मकस्य मनसश्च रजसस्तूभयत्र क्रियोत्पादनद्वारेण कारण- त्वमस्तीति न वैयर्थ्यम् ॥ ३ ॥ महत्, अहङ्कार, पञ्चतन्मात्रा, प्रकृतिविकृति अर्थात् कार्यकारण उभयरूप है अन्तःकरणपर्याय महत्तत्त्व अहङ्कारकी प्रकृति ( कारण ) मूलप्रकृतिका कार्य है अभिमानपर्याय अहङ्कारतत्त्व महत्तत्त्वकी विकृति है वही अहङ्कार तामस होकर सूक्ष्मावस्थापन्न पञ्चतन्मात्राकी सात्त्विक होकर श्रोत्रादि पञ्च ज्ञानेन्द्रिय हस्तादि पञ्च कर्मेन्द्रिय दोनोंके नियन्ता मनकी प्रकृति है रजोगुण दोनों अवस्थामें क्रियो- त्पादनद्वारा कारण है अत उसका वैयर्थ्य नहीं अतएव सांख्यकारिकामे कहा है अभिमानरूप अहङ्कारसे दो प्रकार सर्ग होते हैं एकादश इन्द्रिय और पञ्चतन्मात्र सात्त्विक अहङ्कारसे सात्त्विक एकादश इन्द्रिय भूतादि ( तामस ) से तन्मात्रा तैजस ( राजस ) से उभयविध अहङ्कार प्रवर्त्त होता है ॥ ३ ॥ तदुक्तमीश्वरकृष्णेन-“अभिमानोऽहंकारस्तस्माद् द्विविध प्रव- र्त्तते सर्ग । एकादशकश्च गणस्तन्मात्रपञ्चकं चैव ॥ सात्त्विक एकादशक प्रवर्त्तते वैकृतादहंकारात् । भूतादेस्तन्मात्रः स तामसस्तैजसादुभयम् । बुद्धीन्द्रियाणि चक्षु श्रोत्रघ्राणरसन- त्वगाख्यानि । वाक्पादपाणिपायूपस्थानि कर्मेन्द्रियाण्याहु ॥” 'उभयात्मकमत्र मन संकल्पविकल्पकञ्च साधर्म्यात् 'इति ॥ विवृतञ्च तत्त्वकौमुद्यामाचार्यवाचस्पतिभिः केवला विकृतिस्तु वियदादीनि पञ्चभूतानि एकादशेन्द्रियाणि च तदुक्तं, षोडश- कस्तु विकार इति षोडशसंख्यावच्छिन्नो गणः षोडशको विकार एव न प्रकृतिरित्यर्थ । यद्यपि पृथिव्यादयो गोघटा- १७