सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २५८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ सांख्य-
दीना प्रकृतिस्तथापि न ते पृथिव्यादिभ्यस्तत्त्वान्तरमिति न प्रकृतिः तत्त्वान्तरोपादानत्वं चेह प्रकृतित्वमभिमतं गोघटा- दीनां स्थूलत्वेन्द्रियग्राह्यत्वयोः समानत्वेन तत्त्वान्तरत्वा- भावः। तत्र शब्दस्पर्शरूपरसगन्धतन्मात्रेभ्यः पूर्वपूर्वसूक्ष्म- भूतसहितेभ्यः पञ्चभूतानि वियदादीनि क्रमेणैकद्वित्रिचतुः पञ्चगुणानि जायन्ते। इन्द्रियसृष्टिस्तु प्रागेवोक्ता ॥ ४ ॥ आकाशादि पञ्चभूत ओर एकादश इन्द्रिय मिलाकर षोडशसंख्यक गण केवल विकृति है किसीकीभी प्रकृति नही यद्यपि पृथिव्यादि घटादिककी प्रकृति है तथापि घटादि पृथिव्यादिसे भिन्न तत्त्व नही प्रकृतिपदेन तत्त्वान्तरोत्पादकत्वही अभिमत है गोघटादिक स्थूलत्व इन्द्रियग्राह्यत्वादि समान होनेसे तत्त्वान्तर नही शब्दस्पर्शरूपरस गन्धतन्मात्रसे क्रमश उत्तरोत्तर एक एक गुणाधिक स्थूल भूत उत्पन्न होता है अर्थात् शब्दगुणक आकाश, शब्दस्पर्शयुक्त वायु, शब्दस्पर्शरूपयुक्त तेज, गंध रस- युक्त जल, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धयुक्त पृथिवी ॥ ४ ॥ तदुक्तम्- "प्रकृतेर्महांस्ततोऽहंकारस्तस्माद्गणश्च षोडशकः। तस्मादपि षोडशकात् पञ्चभ्य पञ्चभूतानि ॥" इति ॥ अनु- भयात्मकः पुरुषः। तदुक्तं, न प्रकृतिर्न विकृति पुरुष इति। पुरुषस्तु कूटस्थनित्योऽ परिणामो न कस्याचित् प्रकृतिर्नापि विकृति कस्यचिदित्यर्थ ॥ एतत्पञ्चविंशतितत्त्वसाधकत्वेन प्रमाणत्रयमभिमतम् । तदप्युक्तम्- "दृष्टमनुमानमाप्तवचनञ्च सर्वप्रमाणसिद्धत्वात् । त्रिविधं प्रमाणमिष्टं प्रमेयसिद्धि प्रमा- णाद्धि ॥" इति ॥ ५ ॥ अतएव कारिकामे प्रकृतिसे महान् उससे अहङ्कार उससे षोडशगण, उनसे पञ्चभूतोंकी उत्पत्ति कही है पुरुष न प्रकृति है न विकृति है कूटस्थ ( अचल ) नित्य अपरिणामी है एतादृश २५ तत्त्वके साधक तीन प्रमाणभी कहे हैं। प्रत्यक्ष अनुमान, और आप्तवचन, ये तीन प्रमाण इष्ट हैं इतर उपमानादि इसीमें अन्तर्भूत हैं प्रमाणकी आवश्यकता क्यों है इसका उत्तर देते हैं कि प्रमेयसिद्धि प्रमाणसेही होती है ॥ ५ ॥