सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( २५९ ) इह कार्यकारणभावे चतुर्द्धा विप्रतिपत्तिः प्रसरति । असतः सज्जायत इति सौगताः संगिरन्ते । नैयायिकादयः सतोऽ सज्जायत इति । वेदान्तिनः सतो विवर्त्तं कार्यजातं न वस्तु सदिति । सांख्याःपुनः सतःसज्जायत इति । तत्रासतः सज्जायत इति अप्रामाणिकः पक्षः । असतो निरुपाख्यस्य शशविषाण- वत्कारणत्वानुपपत्तेः तुच्छाऽतुच्छयोस्तादात्म्यानुपपत्तेश्च । नापि सतोऽसज्जायते कारकव्यापारात् प्रागसतः शशविषा- णवत्सत्तासम्बन्धलक्षणोत्पत्त्यनुपपत्ते । न हि नीलं निपुणत- मेनापि पीतं कर्तुं पार्यते । ननु सत्त्वासत्त्वे घटस्य धर्माविति चेत्तदचारु असति धर्मिणि तद्धर्म इति व्यपदेशानुपपत्त्या धर्मिणः सत्त्वापत्ते । तस्मात्कारकव्यापारात् प्रागपि कार्य्यं सदेव सतश्चाभिव्यक्तिरुपपद्यते । यथा पीडनेन तिलेषु तैलस्य दोहेन सौरभेयीषु पयसः । असतः कारणे किमपि निदर्शनं न दृश्यते ॥ ६ ॥ कार्यकारणभावमें चार प्रकारके मतभेद हैं बौद्ध कहते हैं असत् ( अभावसे ) सत्कार्य उत्पन्न होता है । तार्किकलोग सत्से असत्की उत्पत्ति मानते हैं । वेदान्ती लोग सत् कारणके विवर्त्तको कार्य कहते हैं वास्तवमें कार्य कुछभी नहीं यथा रज्जु सर्प ऐसे मानते हैं सांख्य सत्से सत्की उत्पत्ति मानते हैं । प्रथम पक्ष अप्रामाणिक है शशशृङ्गके समान तुच्छरूप अभावका कारणत्व अनुपपन्न है तुच्छ और अतुच्छका तादात्म्यभी अनुपपन्न है सत् कारणसे अविद्यमान कार्य होता है यह नैयायिक पक्षभी असंगत है कारकव्यापारसे पूर्व अविद्यमान खरगोशके सींगके समान सत्ता- सम्बन्धरूप उत्पत्ति असम्भव है चतुरसे चतुरभी नीलको पीत नहीं कर सकते सत्त्व और असत्त्व घटका धर्म माननाभी अयुक्त है क्योंकि धर्मीयके बिना उस- का धर्म व्यवहारभी असम्भूत होनेसे धर्मीकाभी सत्त्व हो जायगा अतः कारक व्यापारसे पूर्वभी कार्य सत्ही है कारकव्यापारसे केवल अभिव्यक्ति होती है यथा पीडनसे ( पेरनेसे ) तिलसे तेल प्रगट होता है दुहनेसे गौसे दूध प्रगट होता है अविद्यमानके कारणत्वमें कोईभी दृष्टान्त नहीं है ॥ ६ ॥