भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

पृष्ठ 267, कुल 316 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 267

(२६०) सर्वदर्शनसंग्रह । [ सांख्य- किञ्च कार्येण कारणं सम्बद्धं तज्जनकम् असम्बद्धं वा । प्रथमे कार्यस्य सत्त्वमायातं सतोरेव सम्बन्ध इति नियमात् । चरमे सर्वं कार्यजात सर्वस्माज्जायेत असम्बद्धत्वाविशेषात् ॥ तदा- ख्यायि साङ्ख्याचार्यैः-“असत्त्वान्नास्ति सम्बन्धः कारणे सत्त्वसङ्गिभिः । असम्बद्धस्य चोत्पत्तिमिच्छतो न व्यव- स्थिति ॥” इति ॥ ७ ॥ अथच कारण कार्यसे सम्बद्ध होकर कार्यका उत्पादक होता है या असम्बद्ध होकर ? प्रथमपक्षमे कार्यका सत्व हो जायगा क्योकि विद्यमानहीका सम्बन्ध होता है। द्वितीय पक्षमें सब कार्य सभीसे होने लगेंगे क्योंकि असम्बद्धता समान है साख्या- चार्यनेभी कहा है कि कार्य असत् होनेसे सत्त्वरूप कारणके साथ सम्बन्ध न हो सकता कारणमें असम्बद्ध कार्यकी उत्पत्ति माने तो सबसे सभी उत्पन्न होने लगेंगे तो कहीं व्यवस्थाभी न होगी ॥ ७ ॥ अथैवं मन्येत असम्बद्धमपि तत्त तदेव जनयति यत्र यच्छक्तम् शक्तिश्च कार्यदर्शनोन्नेयेति तन्न संगच्छते तिलेषु तैलजननश- क्तिरित्युत्र तैलस्यासत्त्वे सम्बद्धत्वासम्बद्धत्वविकल्पेन तच्छ- क्तिरिति निरूपणायोगात् । कार्यकारणयोरभेदाच्च कार्यस्य सत्त्वं कारणात् पृथक् न भवति पटस्तन्तुभ्यो न भिद्यते तद्ध- र्मत्वान्न यदेवं न तदेवं यथा गोरश्व तद्धर्मश्च पटस्तस्मान्ना- र्थान्तरम् ॥ ८ ॥ यदि कहा असम्बद्ध होनेपरभी कारण वही कार्यको उत्पन्न करेगा जिस कारणमें जिस कार्यकी शक्ति हो शक्तिभी कार्यको देखकर अनुमान की जाती है यहमं संगत नहीं क्योंकि तिलमें तैलजननशक्तिभी तैलसम्बन्ध सम्बन्धविकल्पसे निरूप णयोग्य होती है कार्यकारणको तादात्म्य होनेसे कारणसे पृथक कार्यकी सत्तामं नहीं हो सकती तन्तुका धर्म होनेसे पट तन्तु ( सूत ) से भिन्न नहीं है जिसर्ग जिसका धर्म नहीं वह उससे अभिन्नभी नहीं है जिस प्रकार अश्व गो नही प तन्तु धर्म होनेसे अर्थान्तर नहीं है ॥ ८ ॥ तर्हि प्रत्येकं त एव प्रावरणकार्यं कुर्युुरिति चेत् संस्थानभेदे- नाविर्भूतपटभावानां प्रावरणार्थक्रियाकारित्वोपपत्तेः । यथा हि