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सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

(२६०) सर्वदर्शनसंग्रह । [ सांख्य- किञ्च कार्येण कारणं सम्बद्धं तज्जनकम् असम्बद्धं वा । प्रथमे कार्यस्य सत्त्वमायातं सतोरेव सम्बन्ध इति नियमात् । चरमे सर्वं कार्यजात सर्वस्माज्जायेत असम्बद्धत्वाविशेषात् ॥ तदा- ख्यायि साङ्ख्याचार्यैः-“असत्त्वान्नास्ति सम्बन्धः कारणे सत्त्वसङ्गिभिः । असम्बद्धस्य चोत्पत्तिमिच्छतो न व्यव- स्थिति ॥” इति ॥ ७ ॥ अथच कारण कार्यसे सम्बद्ध होकर कार्यका उत्पादक होता है या असम्बद्ध होकर ? प्रथमपक्षमे कार्यका सत्व हो जायगा क्योकि विद्यमानहीका सम्बन्ध होता है। द्वितीय पक्षमें सब कार्य सभीसे होने लगेंगे क्योंकि असम्बद्धता समान है साख्या- चार्यनेभी कहा है कि कार्य असत् होनेसे सत्त्वरूप कारणके साथ सम्बन्ध न हो सकता कारणमें असम्बद्ध कार्यकी उत्पत्ति माने तो सबसे सभी उत्पन्न होने लगेंगे तो कहीं व्यवस्थाभी न होगी ॥ ७ ॥ अथैवं मन्येत असम्बद्धमपि तत्त तदेव जनयति यत्र यच्छक्तम् शक्तिश्च कार्यदर्शनोन्नेयेति तन्न संगच्छते तिलेषु तैलजननश- क्तिरित्युत्र तैलस्यासत्त्वे सम्बद्धत्वासम्बद्धत्वविकल्पेन तच्छ- क्तिरिति निरूपणायोगात् । कार्यकारणयोरभेदाच्च कार्यस्य सत्त्वं कारणात् पृथक् न भवति पटस्तन्तुभ्यो न भिद्यते तद्ध- र्मत्वान्न यदेवं न तदेवं यथा गोरश्व तद्धर्मश्च पटस्तस्मान्ना- र्थान्तरम् ॥ ८ ॥ यदि कहा असम्बद्ध होनेपरभी कारण वही कार्यको उत्पन्न करेगा जिस कारणमें जिस कार्यकी शक्ति हो शक्तिभी कार्यको देखकर अनुमान की जाती है यहमं संगत नहीं क्योंकि तिलमें तैलजननशक्तिभी तैलसम्बन्ध सम्बन्धविकल्पसे निरूप णयोग्य होती है कार्यकारणको तादात्म्य होनेसे कारणसे पृथक कार्यकी सत्तामं नहीं हो सकती तन्तुका धर्म होनेसे पट तन्तु ( सूत ) से भिन्न नहीं है जिसर्ग जिसका धर्म नहीं वह उससे अभिन्नभी नहीं है जिस प्रकार अश्व गो नही प तन्तु धर्म होनेसे अर्थान्तर नहीं है ॥ ८ ॥ तर्हि प्रत्येकं त एव प्रावरणकार्यं कुर्युुरिति चेत् संस्थानभेदे- नाविर्भूतपटभावानां प्रावरणार्थक्रियाकारित्वोपपत्तेः । यथा हि

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( २६१ ) कूर्मस्यांगानि कूर्मशरीरे निविशमानानि तिरोभवन्ति निःसर- न्ति चाविर्भवन्ति एवं कारणस्य तन्त्वादेः पटादयो विशेषा निःसरन्त आविर्भवन्त उत्पद्यन्त इत्युच्यन्ते निविशमानास्ति- रोभवन्तो विनश्यन्तीत्युच्यन्ते न पुनरसतामुत्पत्तिः सतां वा विनाशः । यथोक्तं भगवद्गीतायाम्- "नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत " इति ॥ ततश्च कार्यानुमानात् तत्प्र- धानसिद्धिः ॥ ९ ॥ यदि सूतही पट है तो एक एक सूतसे ओढने बिछोनेका कार्य होना चाहिये यहभी नहीं कह सकते आतानवितानरूप सन्निवेशविशेषसे आविर्भूत पटही आच्छा- दन कार्यक्षम होता है जिस प्रकार कछुवका अङ्ग शरीरमें प्रविष्ट होनेसे तिरोहित और बाहर निकलनेसे आविर्भूत होता है तिसी प्रकार पटादि आविर्भूत होनेसे उत्प- द्यमान कहाते हैं तिरोधानदशामें नष्ट कहे जाते हैं न असत्‌की उत्पत्ति है और न सत्‌का विनाशही है । गीतामेंभी कहा है कि असत्‌वस्तुकी उत्पत्ति और सद्‌वस्तुका विनाश नहीं होता है अतः कार्यद्वारा कारणानुमानसे प्रधानकी सिद्धि होती है ॥ ९ ॥ तदुक्तम्- "असदकरणादुपादानग्रहणात् सर्वसम्भवाभावात् । शक्तस्य शक्यकरणात् कारणभावाच्च सत्कार्यम् ॥" इति ॥ नापि सतो ब्रह्मतत्त्वस्य विवर्त्तं प्रपञ्च वाधानुपलम्भात् अधि- ष्ठानारोप्ययोश्चिञ्जडयोः कलधौतरूप्यादिवत् सारूप्याभावे- नारोपासम्भवाच्च ॥ १० ॥ असत्कार्यका करना असम्भव होनेसे उपादानग्रहण अर्थात् घटके प्रति मृत्तिकाही- को उपादान करते हैं पटके लिये सूतहीको उपादान करते हैं अन्यको नहीं करते इससे सबसे सबकी उत्पत्ति न होनेसे कारणमें शक्त कार्यको करते हैं इन हेतुओंसे और कारणरूपसे कार्य सत् है सत् जो ब्रह्मतत्त्व उसका विवर्त्त प्रपञ्च नहीं है, क्योंकि बाधक उपलब्ध नहीं होता अधिष्ठान आरोप्य जो चित् और जड है उनका परस्पर शुक्तिरजतके समान सारूप्य न होनेसे आरोपही असम्भवही है ॥ १० ॥ तस्मात् सुखदुःखमोहात्मकस्य तथाविधकारणमवधारणीयं तथा च प्रयोग विमतं भावजातं सुखदुःखमोहात्मककारणकं

( २६२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ सांख्य- तदन्वितत्वात् यद्येनान्वीयते तत्तत्कारणक यथा रुचकादिकं सुवर्णान्वितं सुवर्णकारणकं तथाचेदं तस्मात्तथोति ॥ ११ ॥ अतः सुखदुःखमोहात्मक जगत्का तादृश कारणही होना चाहिये अनुमान- प्रयोगभी है कि विवादास्पद वस्तुजात सुखदुःखमोहात्मक कारणजन्य है धर्मयुक्त होनेसे, जो जिस धर्मयुक्त हो वह तादृशकारणक होता है कटककुण्डलादि सुवर्णधर्मयुक्त होनेसे सुवर्ण कारणक है ॥ ११॥ तत्र जगत्कारणे येयं सुखात्मकता तत् सत्त्व, या दुः- कता तद्रजः, या च मोहात्मकता तत्तम् इति त्रिगुणात्- कारणसिद्धिः । तथाहि प्रत्येकं भावास्त्रैगुण्यवन्तोऽनुभूयन्- यथा मैत्रदारेषु सत्यवत्यां मैत्रस्य सुखमाविरास्ति तं प्रति सत्त्वगुणप्रादुर्भावात् तत्सपत्नीनां दुःखम् । तां प्रति रजोगुण- प्रादुर्भावात् तामलभमानस्य चैत्रस्य मोहो भवति तं प्रति तमोगुणसमुद्भवात् एवमन्यदपि घटादिक लभ्यमानं सुख करोति परैरपि ह्रियमाण दुःखाकरोति उदासीनस्योपेक्षाविष- यत्वेनोपतिष्ठते उपेक्षाविषयत्वं नाम मोहः मुह वैचित्त्येत्य- स्माद्धातोर्मोहशब्दनिष्पत्तेः उपेक्षणीयेषु चित्तवृत्त्यनुदयात्॥१२॥ जगत्के कारणम जो सुखात्मकता है वह सत्त्वगुण है । जो दुःखात्मकता है वह रजोगुण है और जो मोहात्मकता है वह तमोगुण है । एवं त्रिगुणात्मक कारण सिद्ध है । प्रत्येक वस्तु त्रिगुणात्मक उपलब्ध होता है जिस प्रकार मैत्रनामक एक पुरुषके, अनेक भार्याओंमें एकके विषयमें प्रेमाधिक होनेसे मैत्रको सुख प्रकट होता है उसके प्रति सत्त्वगुण प्रकट हुआ है अन्य सपत्नीको दुःख प्रकट होता है क्योंकि उनके प्रति रजोगुण अधिक आविर्भूत हो गया है । सत्यवतीके अलाभसे चैत्रको मोह होता है क्योंकि अलाभसे तमोगुण उत्पन्न हो जाता है । इसी प्रकार अन्य- घटादि जिसको मिल जाता है उसको सुख होता है और उसीके नष्ट होनेसे दुःख होता है । उदासीनके उपेक्षाविषय होता है उसका नाम मोह है मुहधातु वैचित्त्यर्थक है वैचित्त्यका अर्थ चित्तविकार है उपेक्षणीयविषयमें चित्तवृत्ति नहीं होती है ॥ १२ ॥ 1

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतं । ( २६३ ) तस्मात् सर्वं भावजातं सुखदुःखमोहात्मकं त्रिगुणप्रधानका- रणकमवगम्यते । तथाच श्वेताश्वतरोपनिषदि श्रूयते- “अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां वह्वीः प्रजा जनयन्ती सरूपा । अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोन्यः ” इति ॥ अत्र लोहितशुक्लकृष्णशब्दा रञ्जकत्वप्रकाशकत्वा- वरकत्वसाधर्म्यात् रजःसत्त्वतमोगुणत्वप्रतिपादनपराः ॥ १३ ॥ अतः सुख, दुःख मोहात्मक पदार्थमात्र त्रिगुणात्मक प्रधानकारणक प्रतीत होता है । श्रुतिनेभी कहा है कि ' अज ( नित्य ) लोहित' शुक्ल, कृष्ण, रञ्जक, प्रकाशक, आवरक धर्मवान् रजोगुण, सत्त्वगुण तमोगुणयुक्त सुखदुःखमोहात्मक समानरूप अनेकविध सृष्टि करनेवालीको एक अज ( जीव ) प्रकृतिपुरुष विवेक- ज्ञानशून्य अतएव सेवन करनेवाला बद्ध होता है । अन्य प्रकृतिपुरुष विवेकज्ञानवान् भोग भोगचुकनेसे उस प्रकृतिकों त्याग देते हैं ॥ १३ ॥ नन्वचेतनं प्रधान चेतनानधिष्ठितं महदादिकार्य्यं न व्याप्रि- यते । अतः केनचिच्चेतनेनाधिष्ठात्रा भवितव्यं तथा च सर्वा- र्थदर्शी परमेश्वरः स्वीकर्त्तव्यः स्यादिति चेत् तदसङ्गतम् अचेतनस्यापि प्रधानस्य प्रयोजनवशेन प्रवृत्त्युपपत्ते । दृष्टं च अचेतनं चेतनानधिष्ठितं पुरुषार्थाय यथा वत्सवृद्ध्यर्थमचेतनं क्षीरं प्रवर्त्तते यथा जलमचेतनं लोकोपकाराय प्रवर्त्तते तथा च प्रकृतिरचेतनापि पुरुषविमोक्षाय प्रवर्त्स्यति ॥ तदुक्तम्- “वत्सविदृद्धिनिमित्तं क्षीरस्य यथा प्रवृत्तिरज्ञस्य । पुरुषविमो- क्षनिमित्तं तथा प्रवृत्तिः प्रधानस्य ॥ ” इति ॥ १४ ॥ अचेतनप्रधान अधिष्ठाता कोई चेतनके विना महदादिकार्यको नहीं कर सकता अतः अधिष्ठाता चेतन अवश्य होना चाहिये तथाच सर्वज्ञ परमेश्वर स्वीकार्य होगा यहभी अयुक्त है । अचेतनभी प्रयोजनवश प्रवृत्त होता है देखाभी गया है कि वत्सकी वृद्धिके लिये अचेतन क्षीर चेतनाधिष्ठानके विना प्रवृत्त होता है यथा वा अचेतन जल पुरुषोपकारक लिये प्रवृत्त होता है उसी प्रकार अचेतन प्रकृतिभी पुरुषके मोक्षके लिये प्रवृत्त होगी । इसी बातको वत्सविवृद्धीत्यादिसे कहा है ॥१४॥

( २६४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ सांख्य- यस्तु परमेश्वरः करुणया प्रवर्तक इति परमेश्वरास्तित्ववादिनां डिण्डिमः स प्रायेण गतः विकल्पानुपपत्तेः । स किं सृष्टेः प्राक् प्रवर्त्तते सृष्ट्युत्तरकाले वा । आद्ये शरीराद्यभावेन दुःखानु- त्पत्तौ जीवानां दुःखप्रहेणेच्छानुपपत्तिः । द्वितीये परस्पराश्रय- प्रसंगः करुणया सृष्टिः सृष्ट्या च कारुण्यमिति ॥ तस्माद- चेतनस्यापि चेतनानाधिष्ठितस्य प्रधानस्य महदादिरूपेण परिणामः पुरुषार्थप्रयुक्तः प्रधानपुरुषसंयोगनिमित्तः ॥ १५ ॥ परमेश्वर करुणासे प्रवर्तक है यह जो ईश्वरास्तित्ववादियोंका उद्घोष है । वहभी वक्ष्यमाण विकल्पानुपपत्तिसे परास्त है । तथाहि ईश्वर सृष्टिके पूर्व प्रवृत्त होते हैं या उत्तर कालमें प्रवृत्त होते हैं ? प्रथम पक्षमें शरीरेन्द्रियादि न होनेके कारण जीवको दुःखोत्पत्ति न होनेसे दुःखनाशकी इच्छाही अनुपपन्न है । द्वितीयपक्षमें करुणासे सृष्टि, सृष्टिसे करुणा इस प्रकार अन्योन्याश्रय होगा । अतः चेतनानाधिष्ठित अचेतन प्रधानकोभी प्रधा- नपुरुषसंयोगनिमित्त पुरुषार्थके लिये महदादिरूपस परिणाम मानना होगा ॥ १५ ॥ यथा निर्व्यापारस्याप्ययस्कान्तस्य सन्निधानेन लोहस्य व्यापारः तथा निर्व्यापारस्य पुरुषस्य सन्निधानेन प्रधानव्या- पारो युज्यते । प्रकृतिपुरुषसम्बन्धश्च पङ्ग्वन्धवत्परस्परापेक्षा- निबन्धनः ॥ प्रकृतिर्हि भोग्यतया भोक्तारं पुरुषमपेक्षते । पुरुषोऽपि भेदाग्रहाद्बुद्धिच्छायापत्त्या तद्गतं दुःखत्रयं वारय- माणः कैवल्यमपेक्षते । तत् प्रकृतिपुरुषविवेकानिबन्धनं न च तदन्तरेण युक्तमिति कैवल्यार्थं पुरुषः प्रधानमपेक्षते । यथा खलु कौचित् पंग्वन्धौ पथि सार्थेन गच्छन्तौ दैवकृता- दुपप्लवात् परित्यक्तसाथौ मन्दमन्दमितस्ततः परिश्रमन्ता भयाकुलौ दैववशात् संयोगमुपगच्छेतां तत्र चान्धेन पंगुः स्कन्धमारोपितः ततः पगुदर्शितेन मार्गेणान्धः समीहितं स्थानं प्राप्नोति । पंगुरपि स्कन्धाधिरूढः तथा परस्परापेक्ष- प्रधानपुरुषनिबन्धनः सर्गः ॥ यथोक्तम्--“पुरुषस्य दर्शनार्थं

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( २६६ ) कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य । पङ्ग्वन्धवदुभयोरपि सम्बन्ध- स्तत्कृतः सर्गः ॥ ” इति ॥ १६ ॥ जिस प्रकार व्यापारशून्य अयस्कान्त (चुम्बक) के संयोगसे लोहेमें व्यापार होता है तिसी प्रकार निर्व्यापार पुरुषके सन्निधानसे प्रधानमे व्यापार उत्पन्न होता है । प्रकृतिपुरुषका सम्बन्धभी पंगु और अन्धेके सम्बन्धवत् परस्पर प्रयोजनसे होता है प्रकृति भोग्य होनेसे भोक्ता पुरुषकी अपेक्षा करती है । बुद्धि प्रतिबिम्बित होनेसे भेदज्ञान न होनेके कारण पुरुषभी दुःखत्रयनिवारणार्थ कैवल्यकी अपेक्षा करते हैं । कैवल्य प्रकृतिपुरुषविवेकनिबन्धन है उसके बिना नहीं हो सक्ता यथा एक अंध और एक पंगु दोनों साथही राजमार्गसे जा रहे दैव- दुर्विपाकसे मार्ग छुट गया अनन्तर भयसे इतस्ततः घूमते हुये भाग्यवश दोनों मिलगये पुनः दोनों सम्मति कर अन्धने पंगुको अपने कन्धेपर चढालिया ओर पंगुके दिखाये मार्गसे अन्ध अपने स्थानपर पहुंच गया पंगुभी कन्धेपर चढकर स्वस्थान पहुंचा इस प्रकार परस्परापेक्ष प्रधान पुरुष निमित्त सृष्टि होती है । पुरुषके दर्शनार्थ तथा कैवल्यार्थ प्रधानकी प्रवृत्ति है पंगु अन्धवत् दोनोंका सम्बन्ध है एत- न्मूलही सृष्टि है ॥ १६ ॥ ननु पुरुषार्थनिबन्धना भवतु प्रकृतेः प्रवृत्ति निवृत्तिस्तु कथमुपप- द्यत इति चेदुच्यते यथा भर्त्रा दृष्टदोषा स्वैरिणी भर्त्तारं पुन- र्नोपैति यथा वा कृतप्रयोजना नर्त्तकी निवर्त्तते तथा प्रकृता- रपि ॥ यथोक्तम्- “रङ्गस्य दर्शयित्वा निवर्त्तते नर्त्तकी यथा नृत्यात् । पुरुषस्य तथात्मानं प्रकाश्य विनिवर्त्तते प्रकृतिः ॥ ” इति । एतदर्थे निरीश्वरसाङ्ख्यशास्त्रप्रवर्त्तककपिलानुसारिणां मतमुपन्यस्तम् ॥ १७ ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहे सांख्यदर्शनं समाप्तम् ॥ १४ ॥ पुरुषार्थ निमित्त प्रधानकी प्रवृत्ति हो परन्तु निवृत्ति कैसे हो सकती है, सो कहते हैं जिस प्रकार जिसके दोष पतिने देखे हैं ऐसी व्यभिचारिणी स्त्री पुनः पतिके पास नहीं जाती है यथा वा नृत्य समाप्त होनेसे नर्तकी रङ्गस्थानमे निवृत्त होती है तिसी प्रकार प्रकृतिभी कृतकृत्य होकर निवृत्त होती है इस विषयमें निरीश्वर सांख्यशास्त्र- प्रवर्त्तक कपिलका मत मैंने दिखाया ॥ १७ ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहमें सांख्यदर्शन समाप्तम् ।

१२. सांख्य व पातञ्जल योग दर्शन

( २६६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ पातञ्जल- अथ पातञ्जलदर्शनम् ॥ १५ ॥ साम्प्रतं सेश्वरसांख्यप्रवर्त्तकपतञ्जलिप्रभृतिमुनिमतमनुवर्त्तमा- नाना मतमुपन्यस्यते ॥ तत्र सांख्यप्रवचनापरनामधेयं योग- शास्त्र पतञ्जलिप्रणीतं पादचतुष्टयात्मकम् । तत्र प्रथमे पादे अथ योगानुशासनमिति योगशास्त्रारम्भप्रतिज्ञां विधाय योग- श्चित्तवृत्तिनिरोध इत्यादिना योगलक्षणमभिधाय समाधौ सप्र- पञ्चं निरदिक्षत् भगवान् पतञ्जलि । द्वितीये तप स्वाध्या- येश्वरप्रणिधानानि क्रियायोग इत्यादिना व्युत्थितचित्तस्य क्रियायोग यमादीनि पञ्च बहिरंगानि साधनानि । तृतीये देश- बन्धश्चित्तस्य धारणेत्यादिना धारणाध्यानसमाधित्रयमन्तरंग संयमपदवाच्य तत्रावान्तरफलं विभूतिजातम् । चतुर्थे जन्मौ- षधिमन्त्रतप समाधिजा सिद्धय इत्यादिना सिद्धिपञ्चकप्रप- ञ्चनपुरस्सरं परम प्रयोजनं कैवल्यम् ॥ १ ॥ सम्प्रति सेश्वरसारख्यशास्त्रप्रवर्तक पतञ्जलिप्रभृतिके मत कहते हैं-इसके लिये साख्यप्रवचनापरनामक योगशास्त्र पादचतुष्टयात्मक और पतञ्जलिप्रणीत है प्रथम पादमें योगशास्त्रारम्भकी प्रतिज्ञा कर चित्तवृत्तिनिरोधात्मक योगलक्षण तथा सवि- स्तार समाधिस्वरूपको भगवान् पतञ्जलिने कहा । द्वितीय पादमें व्युत्थितचित्तको क्रियायोग यमादि पांच बहिरङ्गसाधन, तृतीयमें धारण ध्यानसमाध्यादि विभूति- जात और चतुर्थमें सिद्धिपञ्चकका प्रदर्शनपुरस्सर और परमपदकैवल्यका निर्देश किया ॥ १ ॥ प्रधानादीनि पञ्चविंशति तत्त्वानि प्राचीनान्येव सम्मतानि षड्विंशस्तु परमेश्वर क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्ट पुरुष स्वेच्छया निर्माणकायमधिष्ठाय लौकिकवैदिकसम्प्रदायप्र- वर्त्तक संसारांगारे तप्यमानानां प्राणभृतामनुग्राहकश्च ॥ २ ॥ प्रकृत्यादि २५ तत्त्व पूर्वतन्त्रोक्त है २६ मा तत्त्व क्लेशादिशून्य स्वेच्छामे निर्माण कायको अधिष्ठान कर लौकिक और वैदिक सम्प्रदायप्रवर्तक संसाराग्निमें दग्ध प्राणि- योंपर अनुग्रहकर्ता पुरुषविशेष ईश्वर है ॥ २ ॥

दर्शनम् ] , भाषाटीकासमेत । ( २६७ )

ननु पुष्करपलाशवन्निर्लेपस्य तस्य तापः कथमुपपद्यते येन परमेश्वरोऽनुग्राहकत्तया कक्षीक्रियते इति चेदुच्यते तापकस्य रजः सत्त्वमेव तप्यं बुद्ध्यात्मना परिणमते इति सत्त्वे परि- तप्यमाने तमोधशेन तदभेदावगाहिपुरुषोऽपि तप्यत इत्यु- च्यते ॥ तदुक्तमाचार्यैः- "सत्त्वं तप्यं बुद्धिभावेन वृत्तं भावा ते वा राजसास्तापकास्ते । तप्याभेदग्राहिणी तामसी वा वृत्ति- स्तस्या तप्य इत्युक्तमात्मा ॥” इति ॥ ३ ॥

कमलके पत्तेके समान निर्लेप पुरुषको तापही कैसे हो सकते हे जिसमें जगनुग्रा- हक परमेश्वरकी अपेक्षा हों सो कहते हैं (सत्त्वमेवेति) तापकर जो गुणके तप्य सत्त्व- गुणही बुद्धिरूपसे परिणत होता है अत सत्त्व तप्त होनेपर तमोगुणवश सत्त्वके साथ अभेदसे प्रतीयमान पुरुषभी तप्त कहा जाता है । "बुद्धिरूपसे परिणत सत्त्व तप्य है राजसभाब सब तापक है तप्यके साथ अभेद ग्रह करनेवाली तामसवृत्ति होनेसे आत्माभी तप्य कहाता है ॥ ३ ॥

पतञ्जलिनाप्युक्तम् । अपरिणामिनी हि भोक्तृशक्तिरप्रतिसं- क्रमा च परिणामिनीत्यर्थे प्रतिसंक्रान्तेव तद्वृत्तिमन्भभव- तीति ॥ भोक्तृशक्तिरिति चिच्छक्तिरुच्यते । सा चात्मैव परि- णामीत्यर्थे बुद्धितत्त्वे प्रतिसंक्रान्तेव प्रतिबिम्बिते तद्वृत्तिम- नुभवतीति बुद्धौ प्रतिबिम्बिता सा चिच्छक्तिर्बुद्धिच्छायापत्त्या बुद्धिवृत्त्यनुकारवतीति भावः । तथा शुद्धोऽपि पुरुषः प्रत्ययं बौद्धमनुपश्यति तमनुपश्यन्नतदात्मापि तदात्मक इव प्रतिभा- सत इति ॥ ४ ॥

पतञ्जलिभी कहा है कि स्वयं अपरिणामी ओर असंक्रमणशील चिच्छक्ति ( आत्मा ) परिणामी बुद्धितत्त्वमें प्रतिबिम्बित होनेपर अर्थात् बुद्धिमें प्रतिबिम्बित चिच्छक्ति बुद्धिच्छायासे बुद्धिवृत्तिको अनुग्रण करती है । तथा पुरुष शुद्ध हो तोभी बुद्धिका भोगको भोगता है उसको अनुभव करते हुए शुद्धात्मा पुरुष तत्तद्रिपया- भेदसे प्रतीत होता है ॥ ४ ॥

( २६८ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ पातञ्जल- इत्थ तप्यमानस्य पुरुषस्यादरनैरन्तर्यदीर्घकालानुबन्ध्यम- नियमाद्यष्टांगयोगानुष्ठानेन परमेश्वरप्रणिधानेन च सत्त्वपुरुषा- न्यताख्यातावनुप्लवायां जातायामविद्यादयः पञ्च क्लेशाः समू- लकाषंकषिता भवन्ति । कुशलाकुशलाश्च कर्माशयाः समू- लघातं हता भवन्ति । ततश्च पुरुषस्य निर्लेपस्य कैवल्येना- वस्थानं कैवल्यमिति सिद्धम् ॥ ५ ॥ इस प्रकार तप्यमान पुरुषको दीर्घकालतक निरन्तर आदरातिशयपूर्वक यमनि- यमाद्यष्टाङ्गयोगके अनुष्ठानसे परमेश्वराराधन वश प्रकृति पुरुषान्यत्व दृढ हो जाने पर अविद्याऽस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेशरूप क्लेशपञ्चक समूल उच्छिन्न होता है अनन्तर निर्लेप पुरुषको कैवल्यलक्षण मोक्ष होता है ॥ ५ ॥ तत्राथ योगानुशासनमिति प्रथमसूत्रेण प्रेक्षावत्प्रवृत्त्यङ्गं विषय- प्रयोजनसम्बन्धाधिकारिरूपमनुबन्धचतुष्टयं प्रतिपाद्यते ॥ अत्राथशब्दोऽधिकारार्थे स्वीक्रियते ॥ ६ ॥ प्रथमसूत्रमे विचारशीलकी प्रवृत्तिके उपयोगी अश्यागेक्षित विषय, प्रयोजन, सम्बन्ध और अधिकारी रूप अनुबन्ध चतुष्टयका प्रतिपादन किया इसी सूत्रमें अथशब्दको अधिकारार्थक मानते हैं ॥ ६ ॥ अथशब्दस्यानेकार्थत्वे संभवति कथमारम्भार्थत्वपक्षे पक्ष- पातः सम्भवेत् । अथशब्दस्य मङ्गलाद्यनेकार्थत्वं नामलिङ्गा- नुशासनेनानुशिष्टं ' मङ्गलानन्तरारम्भप्रश्नकात्स्न्येष्वथो अथ ' इति ॥ ७ ॥ शंका-अथशब्दके मङ्गल, अनन्तर, आरम्भ प्रश्न और कात्स्न्य आदि अनेक अर्थका कोशकारोंने प्रतिपादन किये हैं तब केवल आरम्भार्थ कही है इस प्रकारका पक्ष- पात कैसा संगत होगा ॥ ७ ॥ अत्र प्रश्नकात्स्न्ययोरसम्भवेऽपि पूर्वप्रकृतापेक्षानन्तर्यमंगला रम्भलक्षणानामर्थाना सम्भवादारम्भार्थत्वानुपपत्तिरितिचेन्मैवं मंस्था विकल्पासहत्वात् आनन्तर्यमथशब्दार्थ इति पक्षे यत

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( ५६९ ) कुतश्चिदानन्तर्य पूर्ववृत्तिभावसाधारणात् कारणादानन्तर्यं वा। न प्रथमः, न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृदिति न्यायेन सर्वो जन्तुः किञ्चित् कृत्वा किञ्चित् करोत्येवेति तस्याभिधानमन्तरेणापि प्राप्ततया तदर्थाथशब्दप्रयोगवैयर्थ्य- प्रसक्तेः । न चरमः, शमाद्यनन्तरं योगस्य प्रवृत्तावपि तस्या- नुशासनप्रवृत्त्यनुबन्धतया शब्दतः प्राधान्याभावात् ॥८ ॥ यद्यपि प्रश्न और कार्त्स्न्यरूप अर्थ असम्भव है तथापि अवशिष्ट अर्थका सम्भव हो सकते हैं एवञ्च केवल आरम्भार्थस्त्व कथन अयुक्त है । समाधान-आनन्तर्य अथ शब्दका अर्थ है तो क्या नहीं कहींसे आनन्तर्य है या पूर्ववृत्त साधारणकारणसे आनन्तर्य है । कोई एक क्षणभी बिना कर्मके नहीं रह सकता है इस न्यायसे प्राणी- मात्र कुछ करके कुछ करते रहेंगे उसमें विधिके विनापि आनन्तर्य प्राप्त रहेगा अतः तथा अथशब्दका आरम्भ व्यर्थ है । क्योंकि “ अनन्यलभ्यो हि शब्दार्थः ” इस न्यायसे जो प्रकारान्तरसे प्राप्त न हो सके वही शब्दका अर्थ हो सकता है। आनन्तर्य स्वतः सिद्ध है । द्वितीय पक्षमें शमदमाद्यनन्तर योगशास्त्र प्रवृत्त होनेपरभी योगा- नुशासनमें शमादिक अनुबन्धकोटि प्रविष्ट होनेसे अनुशासनप्राधान्य होनेके कारण शब्दतः योगमें प्राधान्य नहीं रहेगा ॥ ८ ॥ न च शब्दतः प्रधानभूतस्यानुशासनस्य शमाद्यानन्तर्य- मथशब्दार्थः किं न स्यादिति वदितव्यम् । अनुशासनमिति हि शास्त्रमाह अनुशिष्यते व्याख्यायते लक्षणभेदोपायफलस- हितो योगो येन तदनुशासनमिति व्युत्पत्तेः । अनुशासनस्य च तत्त्वज्ञानचिख्यापयिषानन्तरभावित्वेन शमदमाद्यानन्तर्य- नियमाभावात् जिज्ञासाज्ञानयोस्तु शमाद्यानन्तर्यमाम्नायते । तस्माच्छान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः श्रद्धान्वितः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्येदित्यादिना । नापि तत्त्वज्ञानचिख्या- पयिषानन्तर्यमथशब्दार्थ तस्य सम्भवेऽपि श्रोतृप्रतिपत्तिप्र- वृत्त्योरनुपयोगेनानभिधेयत्वात् ॥ ९ ॥

( २७० ) सर्वदर्शनसंग्रह. । [ पातञ्जल- यदि कहो शब्दतः प्रधानभूत अनुशासनका शमाद्यानन्तर्य अथशब्दार्थ क्यों होगा सो नहीं कह सकते क्योंकि लक्षणभेद, उपाय, फलसहित योगका व्याख्यान जिससे न किया जाय इस व्युत्पत्तिसे निष्पन्न अनुशासन शब्दशास्त्र को कहता है अनु शासनकी तत्त्वज्ञानप्रकटनेच्छा उत्तरकालिक होनेसे शमदगाद्यानन्तर्य नियम नहीं हो सकता है जिज्ञासा और ज्ञानके शमाद्यनन्तरभावित्वका श्रुतिप्रतिपादन करती है कि शान्त इति बाह्याभ्यन्तरेन्द्रियनियमनपूर्वक तितिक्षु होकर हृदयमें आत्माको देखें इत्यादि तत्त्वज्ञान प्रकटनेच्छाके अनन्तरभी अथशब्दार्थ न हो सकता क्योंकि सम्भव भी तोभी श्रोताका विश्वास और प्रवृत्तिके अनुपयोग होनेसे वैयर्थ्य प्रसङ्ग है ॥९॥ तथापि निःश्रेयसहेतुतया योगानुशासनं प्रमितं न वा । आद्ये तदभावेऽपि उपादेयत्वं भवेत् । द्वितीये तदभावेऽपि हेयत्वं स्यात् । प्रमितं चास्य निःश्रेयसनिदानत्वम् 'अध्यात्मयोगाधि- गमेन चैवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाती' तिश्रुते । 'समाधाव चला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसी' ति स्मृतेश्च । अतएव शिष्य- प्रश्नतपश्चरणरसायनाद्युपयोगानन्तर्यं पराकृतम् ॥ १० ॥ ( तथापीति ) क्या मोक्षसाधनत्व योगानुशासनमें ज्ञात है या नहीं ? प्रथमपक्षमें अथ शब्दके विनाभी उपादेय हो जायगा । द्वितीय पक्षमें अथशब्द रहनेपरभी अनु पादेय होजायगा । 'अध्यात्मयोगद्वारा ध्यान करके वीर योगी पुरुष हर्ष शोकसे छूट जाता है' इत्यादि श्रुतियोंसे मोक्षसाधनत्वयोगमें प्रमित हे । समाधिमें निश्चल बुद्धि होनेसे योग प्राप्त होता है ऐसी स्मृतिभी है इसीमे शिष्य प्रश्न तपश्चरणायनन्तर्यभी तिरस्कृत हो गया ॥ १० ॥ अथातो ब्रह्मजिज्ञासेत्यत्र तु ब्रह्मजिज्ञासाया. अनधिकार्यत्वे- नाधिकार्यार्थत्वं परित्यज्य साधनचतुष्टयसंपत्तिविशिष्टाधिका- रिसमर्पणाय शमदमादिवाक्यविहिताच्छमादेरानन्तर्यमथश- ब्दार्थ इति शङ्कराचार्यैर्निरटङ्कि ॥ ११ ॥ ब्रह्मजिज्ञासासूत्रमें अथ जिस प्रकार आनन्तर्यार्थक है तिसी प्रकार योगानुशा- सनशास्त्रमेंभी क्यों न होगा इस आशंकाका परिहार करते हैं (अथात इति) अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" इत्यादि स्थलमें ब्रह्मजिज्ञासा अनधिकार्य होनेसे अधिकार्यार्थको त्याग कर शमदमादिसाधनचतुष्टययुक्त अधिकारिविशेषद्योतनार्थ शमाद्यानन्तर्यार्थकत्व शङ्कराचार्यने कहा है ॥ ११ ॥

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( २७१ ) अथ मा नाम भूदानन्तर्यार्थोऽथशब्दः मङ्गलार्थः किं न स्यात् न स्यान्मंगलस्य वाक्यार्थे समन्वयाभावात् । अगर्हि- ताभीष्टवाप्तिर्मङ्गलम् । अभीष्टं च सुखावाप्तिदुःखपरिहाररू- पतयेष्टं योगानुशासनस्य च सुखदुःखनिवृत्त्योरन्यतरत्वाभा- वान्न मंगलता । तथा च योगानुशासनं मंगलमिति न संपद्यते मृदंगध्वनेरिवाथशब्दश्रवणस्य कार्यतया मंगलस्य वाच्यत्व- लक्ष्यत्वयोरसंभवाच्च यथार्थिकार्थो वाक्यार्थे निनिशते तथा कार्यमपि निविशेत अपदार्थत्वाविशेषात् । पदार्थै पदार्थ एव हि वाक्यार्थे समन्वीयते अन्यथा शब्दप्रमाणकानां शाब्दी ह्याकांक्षा शब्देनैव पूर्येति मुद्राभंगकृतो भवेत् ॥ १२ ॥ यद्यपि अथशब्द आनन्तर्यार्थक न हो तथापि मंगलार्थक क्यों न माना जाय ? यहभी नहीं हो सकता मंगलका वाक्यार्थमें अन्वयही नहीं होगा क्योंकि अनिन्दित और अभीष्टप्राप्ति मंगल है तत्र दुःखपरिहारपूर्वक सुखकी प्राप्ति अभीष्ट है योगानु- शासन सुखप्राप्ति दुःखनिवृत्ति दोनोंमेंसे एकभी न होनेसे मंगल नहीं हो सकता यो- गानुशासन मंगल है ऐसा वाक्यार्थ न हो सकता क्योंकि मृदङ्गध्वनिके समान अ- थशब्दका श्रवणकार्य होनेसे मंगलवाच्यार्थ और लक्ष्यार्थ दोनोंमेंसे एकभी नहीं हो सकता जिस प्रकार आर्थिकार्थ वाक्यार्थमें निविष्ट नहीं होता है उसी प्रकार कार्य- भी वाक्यार्थमें न मिल सकेगा पदार्थही वाक्यार्थमें सम्बद्ध होता है यदि आर्थिका- र्थकोभी वाक्यार्थमें अन्वयमानो तो शाब्दी आकांक्षा शब्दहीसे शान्त होती है यह सिद्धान्तभी भग्न होगा ॥ १२ ॥ ननु प्रारिप्सितप्रबन्धपरिसमाप्तिपरिपन्थिप्रत्यूहव्यूहप्रशमनाय शिष्टाचारपरिपालनाय च शास्त्रारम्भे मंगलाचरणमनुष्ठेयम् । मंगलादीनि मंगलमध्यानि मंगलान्तानि च शास्त्राणि प्रथन्ते आयुष्मत्पुरुषकाणि वीरपुरुषकाणि च भवन्तीत्याभियुक्तोक्तेः । भवति च मंगलार्थोऽथशब्दः । “ओङ्कारश्चाथशब्दश्च द्वावेतौ ब्रह्मणः पुरा । कण्ठं भित्वा विनिर्याताै तस्

( २७२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ पातञ्जल- भौ ॥” इति स्मृतिसम्भवात् । तथाच वृद्धिरादैजित्यादौ वृद्ध्या- दिशब्दवदथशब्दो मंगलार्थः स्यादिति चेत् ॥ १३ ॥ यदि कहो आरम्भ करनेके अभिमतप्रबन्धकी परिसमाप्तिके प्रतिबन्धक दुरितपु- ञ्जका उपशमनके लिये एव शिष्टाचारपरिपालनके लियेभी शास्त्रका आरम्भमें मंगल अवश्य अनुष्ठेय है अतएव भाष्यकारने कहाभी है कि जिस शास्त्रका आरम्भमें मंगल हो और मध्य तथा अन्तमें मंगल हो वह अत्यन्त प्रसिद्ध ( विस्तृत ) होता है ऐसे शास्त्रको बनानेवाले पुरुष आयुष्मान् ( दीर्घजीवी ) होते हैं वीर होते हैं इत्यादि । अथशब्दके मंगलार्थकत्व स्मृतिमेंभी कहा है “ ओंकार और अथशब्द दोनों ब्रह्माके कण्ठको भेदन करके निकले हैं अतएव दोनों मांगलिक हैं ” अतः वृद्धिश- ब्दवत् अथशब्दभी मंगलार्थक होगा ॥ १३ ॥ मैवं भाषिष्ठा । अर्थान्तरानिधानाय प्रयुक्तस्याथशब्दस्य वीणावेण्वादिध्वनिवच्छ्रवणे मंगलफलत्वोपपत्ते ॥ अथार्थान्त- रारम्भवाक्यार्थधीफलकस्याथशब्दस्य कथमन्यफलकतेति चेन्न अन्यार्थनीयमानोदकुम्भोपलम्भवत् तत्सम्भवात् । न च स्मृतिव्याकोपः मांगलिकविति मंगलप्रयोजकत्वविवक्षया प्रवृत्तेः । नापि पूर्वप्रकृतापेक्षोऽथशब्दः फलत आनन्तर्याव्य- तिरेकेण प्रागुक्तदूषणानुपङ्गात् ॥ १४ ॥ यहभी नहीं कह सकता अर्थान्तरतात्पर्यसे प्रयुक्तभी अथशब्द श्रवणमात्रसे मंग- लार्थ हो सकता है यथा वीणा वंशी आदिका शब्द श्रवणमात्रसे मंगलप्रद है यथा वा अन्यदीय दध्यादिका दर्शनमात्रसे मंगल होता है । यदि कहो अर्थान्तरारम्भक वाक्यार्थ ज्ञानफलक अथशब्दभी मंगलफलक कैसा होगा सो सुनो जिस प्रकार यात्रादिसमयमें दूसरेके लिये ले जाते हुये भरे घटको देखनेसे शुभ होता है तिसी प्रकार अथशब्दभी स्वरूपतः मंगल होगा । स्मृतिविरोधभी नहीं होगा क्योंकि उसमें मांगलिक पद है उसका अर्थ मंगल प्रयोजन है पूर्वप्रकृतापेक्षभी न होगा क्योंकि ऐसे होनेसे पूर्वोक्त विकल्पदोष तदवस्त होता है ॥ १४ ॥ किमयमथशब्दोऽधिकारार्थ अथानन्तर्यार्थ इत्यादिविमर्शा- वाक्ये पक्षान्तरोपन्यासे तत्सम्भवेऽपि प्रकृते तदसम्भवाच्च ।

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( २७३ ) तस्मात्पारिशेष्यादधिकारपदवेदनीयप्रारम्भार्थोऽथशब्द इति विशेषो भाष्यते ॥ १५ ॥ यह अथशब्द क्या अधिकारार्थक है अथ आनन्तर्यार्थक ? इत्यादि विचारस्थलमें जो द्वितीय पक्षका उपन्यास हो वहाँ प्रश्नार्थकत्व सम्भव होनेपरभी यहाँ वह सम्भ- व नहीं है अत॰ परिशेष अधिकारपदबोध्य प्रारम्भार्थक अथ शब्द है ॥ १५ ॥ अथैष ज्योतिरथैष विश्वज्योतिरित्यार्थाथशब्दः क्रतुविशेषप्रार- म्भार्थः परिगृहीतो यथा अथशब्दानुशासनमित्यत्राथशब्दो व्याकरणशास्त्राधिकारार्थः । तद्वदपि व्यासभाष्ये योगसूत्र- विवरणपरे ‘अथेत्ययमधिकारार्थः प्रयुज्यते’ इति तद् व्याचख्यौ वाचस्पतिः । तस्मादयमथशब्दोऽधिकारद्योतको मंगलार्थ- श्वेति सिद्धमिति ॥ १६ ॥ अथ एष ज्योति इत्यादि स्थलमें जिस प्रकार ऋतुविशेष पारम्भार्थक अथशब्द है जिस प्रकार अथ शब्दानुशासनमित्यादिमें अथशब्द व्याकरणशास्त्रका अधिकारार्थ- क है तिसी प्रकार योगसूत्रविवरणपर योगभाष्यमेंभी अथशब्दको अधिकारार्थक कहा है । वाचस्पतिमिश्रनेभी इसी प्रकार व्याख्यान किया है अत अथशब्द अधिकारार्थक और स्वरूपतः मंगलार्थकभी है यह सिद्ध हुआ ॥ १६ ॥ तदित्थममुष्याथशब्दस्याधिकारार्थत्वपक्षे शास्त्रेण प्रस्तूयमा- नस्य योगस्योपवर्त्तनात् समस्तशास्त्रतात्पर्यव्याख्यानेन शास्त्रस्य सुखावबोधप्रवृत्तिरास्तामित्युपपन्नम् ॥ १७ ॥ इस प्रकार अथशब्द अधिकारार्थक होनेसे आरम्भमाण योगशास्त्रका उपक्रम करके समस्तशास्त्रतात्पर्य व्याख्यानद्वारा शास्त्रका सुखावगमप्रवृत्तिभी सिद्ध हुई ॥ १७ ॥ ननु 'हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः' इति याज्ञवल्क्य- स्मृतेः पतञ्जलि कथं योगस्य शासितेति चेदद्धा अतएव तत्र तत्र पुराणादौ विशिष्य योगस्य विप्रकीर्णतया दुर्ग्राह्यार्थत्वं मन्यमानेन भगवता कृपासिन्धुना फणिपतिना सारं सञ्जिघृ- क्षुणा अनुशासनमारब्धं न तु साक्षाच्छासनम् ॥ १८ ॥ ३८ ३५

( २७४ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ पातञ्जल- शंका-याज्ञवल्क्यस्मृतिमें योगशास्त्रके प्रवर्तक हिरण्यगर्भको कहा है उनके वि- परीत पतञ्जलिको शास्त्रप्रवर्तक कैसे कहते हो ? सो सुनो ब्रह्माजीने तत्तत्पुराणोंमें प्रकीर्णरूपसे संक्षेपन कहा है इस लिये उक्त योग विशेषरूपसे दुर्बोध होनेके कारण परमदयालु शेषावतार पतञ्जलिने साङ्गको संग्रह करके अनुशासन ( पश्चादुपदे- श ) किया है साक्षात् शासन ( उपदेश ) नहीं किया ॥ १८ ॥ यदायमयंशब्दोऽधिकारार्थ तदैनं काव्यार्थं सम्पद्येत योगानु- शासनं शास्त्रमधिकृतं वेदितव्यमिति तत्र शास्त्रे व्युत्पाद्यमान- तया योग ससाधन सफलो विषय तद्व्युत्पादनमवान्तर- फल व्युत्पादितस्य योगस्य कैवल्यं परमप्रयोजनं शास्त्रयोगयो प्रतिपाद्यप्रतिपादकभावलक्षण सम्बन्धः योगस्य कैवल्यस्य च साध्यसाधनाभावलक्षण सम्बन्ध । स च श्रुत्यादिप्रसिद्ध इति प्रागेवावादिषम् । मोक्षमपेक्षमाणा श्रवणाधिकारिण इत्यर्थसिद्धम् ॥ १९ ॥ ( यदायमयशब्द ) इति जबके अधिकारार्थपक्षमें योगानुशासनको शास्त्र जानना ऐसा वाक्यार्थ होता है शास्त्रम व्युत्पाद्य मानेसे साधन और फलसहित योग इस शास्त्रका विषय है उसका व्युत्पादन अवान्तर फल है व्युत्पादित योगका कैवल्य (मोक्ष) परम प्रयोजन है शास्त्र और योगका प्रतिपाद्यप्रतिपादक भाव सम्बन्ध है कैवल्य और योगका साध्यसाधनभाव सम्बन्ध है वह 'अध्यात्मयोगा- धिगमेनेत्यादि पूर्वोक्तश्रुत्यादि सिद्ध है मोक्षार्थी श्रवणके अधिकारी है एवम् अनुब- न्धचतुष्टयभी उपपन्न हुआ ॥ १९ ॥ न चाथातो ब्रह्मजिज्ञासेत्यादावधिकारिणोऽर्थत सिद्धिरशं- कनीया तत्राथशब्देनानन्तर्याभिधाने प्रणाडिकया अधिकारि- समर्पणसिद्धावार्थिकत्वशङ्खानुदयात् । अत एवोक्तं 'श्रुतिप्राप्ते प्रकरणादीनामनवकाश' इति । अस्यार्थ यत्र हि श्रुत्या अर्थो न लभ्यते तत्रैव प्रकरणादयोऽर्थं समर्पयन्ति नेतरत्र । यत्र तु शब्दादेवार्थस्योपलम्भ तत्र नेतरस्य सम्भव ॥ २० ॥ जिस प्रकार योगशास्त्रमें अश्रुतभी कैवल्याभिलाषीरूप अधिकारी अर्थात् लब्ध होता है तिसी प्रकार ब्रह्म जिज्ञासादिमे अधिकारीको अर्थतः सिद्धत्व नहीं कह

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत. । ( २७५ ) सकते क्योंकि तहापर अथशब्द शमाद्यानन्तर्य्यप्रतिपादक होनेसे शमादियुक्त अधि कारीका समर्पण होता है अतः आर्थिकत्व शंकाही नहीं । श्रुतिसिद्ध अर्थमें प्रकर- णादिका अवकाश नहीं श्रुतिसे अर्थ न लभ्य हों वही प्रकरणादि नियामक होते हैं अन्यत्र नहीं हैं ॥ २० ॥ शीघ्रबोधिन्या श्रुत्या बोधितेऽर्थे तद्विरुद्धार्थं प्रकरणादि समर्प- यति अविरुद्धं वा । न प्रथमः विरुद्धार्थबोधकस्य तस्य बाधि- तत्वात् । न चरमः वैयर्थ्यात्तदाह श्रुतिलिङ्गवाक्यप्रकरणस्था- नसमाख्यानां समवाये पारदौर्बल्यमर्थविप्रकर्षादिति ॥ २१ ॥ क्योंकि झटित्यर्थावबोधक श्रुति बोधित अर्थसे विरुद्ध अर्थको प्रकरणादिका बोधन करते हैं या अविरुद्ध अर्थका ? बाधित होनेसे विरुद्धार्थका बोधन नहीं कर सकते व्यर्थतापत्त्या अविरुद्धार्थकोभी नहीं बोधन कर सकते अतएव कहा है श्रुति, लिङ्ग, वाक्य, प्रकरण, स्थान, समाख्यामें पूर्व पूर्वक प्रति पर पर दुर्बल होते हैं क्योंकि उत्तरोत्तरसे अर्थबोधनमें विलम्ब होता है श्रुति निरपेक्ष वेदशब्द होनेसे दूसरेके अपेक्षा नहीं करती लिङ्ग श्रुतिकी कल्पना कर श्रुतिद्वारा अर्थबोधन करेगा बाक्यलिङ्ग श्रुति दोनोंकी कल्पना करके एव प्रकरणादिकभी पूर्वपूर्वकी कल्पना करेगा इसीमे उत्तरोत्तरमें विलम्ब होता है ॥ २१ ॥ " बाधिकैव श्रुतिर्नित्यं समाख्या बाध्यते सदा । मध्यमाना तु बाध्यत्वं बाधकत्वमपेक्षया ॥" इति च । तस्माद्विषयादिम- त्त्वाद् ब्रह्मविचारशास्त्रवद् योगानुशासनं शास्त्रमारम्भणीय- मिति स्थितम् ॥ २२ ॥ श्रुति नित्यही बाधिक बाध करनेवाली होती है अर्थात् श्रुतिका बाधक कोई नहीं होता । समाख्या नित्यही पूर्वपूर्वसे बाधित रहती है लिंगादिक पूर्वपूर्वका बाध्य और उत्तरोत्तरका बाधक होते हैं। अत विषयप्रयोजनादिक होनेसे ब्रह्मविचारशा- स्त्रवत् योगानुशासनभी आरम्भणीय है । यह सिद्ध हुआ ॥ २२ ॥ ननु व्युत्पाद्यमानतया योग एवात्र प्रस्तुतो न शास्त्रमिति चेत् सत्यं प्रतिपाद्यतया योगः प्राधान्येन प्रस्तुत स च तद्विषयेण शास्त्रेण प्रतिपाद्यत इति तत्प्रतिपादने करणं शास्त्रं करणगो- रश्च कर्तृव्यापारा न कर्मगोचरतामाचरति ॥ यथा छेतुर्देवद-

( २७६ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ पातञ्जल-

तस्य व्यापारभूतमुद्यमननिपातनादिकर्मकरणभूतपरशुगोचरं न कर्मभूतवृक्षादिगोचरं तथा च वक्तुः पतञ्जलेः प्रवचनव्यापा- रापेक्षया योगविषयस्याधिकृतता करणस्य शास्त्रस्याभि- धानव्यापारापेक्षया तु योगस्य वेति विभागः । ततश्च योग- शास्त्रस्यारम्भ सम्भावना भजते ॥ २३ ॥ यदि कहो विवेचनीयरूपसे योगका प्रस्ताव किया है शास्त्रका नहीं पुन शास्त्रका आरम्भणीयत्व कैसे कहते हो । उत्तर-सत्य है प्रधानतया योगही प्रस्तुत है वह योग- शास्त्रसे व्युत्पादित होता है इसलिये योगप्रतिपादनमें शास्त्र करण है करणगोचर कर्तृ- व्यापार कर्मगोचरपरक न हो सकना जिस प्रकार छेदन करनेवाले देवदत्तका व्यापार- भूत उठाना गिराना करणभूत कुठारगोचर है कर्मभूतवृक्षादि गोचर नहीं तिसी प्रकार वक्ता पतञ्जलिका प्रवचनव्यापारापेक्षा योगविषय अधिकृत है । करणभूत शास्त्रका अभिधानव्यापारापेक्षा योग अधिकृत है । यह विभाग है । अतो योगशास्त्रारम्भ सम्भावनिक है ॥ २३ ॥ अत्र चानुशासनीयो योगश्चित्तवृत्तिनिरोध इत्युच्यते । ननु ‘युजिर् योगे’ इति संयोगार्थतया परिपठितात् युजेर्निष्पन्नो यो- गशब्दः संयोगवचन एव स्यान्न तु निरोधवचनः । अतएवोक्तं याज्ञवल्क्येन-‘संयोगो योग इत्युक्तो जीवात्मपरमा- त्मनोः’ इति ॥ २४ ॥ क्लिष्टाक्लिष्टादि पाञ्च प्रकारकी चित्तकी वृत्तिको रोकना योग है यदि कहो संयो- गार्थक युज्धातुसे निष्पन्न योगशब्द संयोगार्थकही होगा नहीं कि निरोधार्थक अत एव याज्ञावल्क्यनेभी कहा है कि जीवात्मा और परमात्माका संयोगको योग कहते हैं इति ॥ २४ ॥ तदेतद्वार्तं जीवपरयोः संयोगे कारणस्यान्यतरकर्मादेरसम्भवा- दजसंयोगस्य कणभक्षाक्षचरणादिभिः प्रतिक्षेपाच्च । मीमांस- कमतानुसारेण तदंगीकारेऽपि नित्यसिद्धस्य तस्य साध्यत्वा- भावेन शास्त्रवैफल्यापत्तेश्च धातूनामनेकार्थत्वेन युजे समाध्य- र्थत्वोपपत्तेश्च ॥ २५ ॥

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( २७७ ) यद् जगत है जीवेश्वरसंयोगके कारण जीव अथवा ईश्वर एककाभी कर्म्म नहीं है । व्यापक जनक संयोगका नैयायिकों और वैशेषिकोंने प्रत्याख्यानभी किये हैं “अप्राप्तयोस्तु या प्राप्तिः सैव संयोग ईरितः” इति । मीमांसक रीतिसे माने तोभी जीवेश्वर संयोग नित्य सिद्ध होनेसे सिद्धसाधनतापत्त्या शास्त्रही विफल होगा । और धातुका अनेकार्य होनेसे समाध्यर्थकमी हो सकता है ॥ २५ ॥ तदुक्तम्-“निपाताश्चोपसर्गाश्च धातवश्चेति ते त्रय । अने- कार्था स्मृताः सर्वे पाठस्तेषां निदर्शनम् ॥” इति । अत- एव केचन युजि समाधावपि पठन्ति ‘युज समाधौ’ इति । नापि याज्ञवल्क्यवचनव्याकोपः तत्रस्थस्यापि योगशब्दस्य समाध्यर्थत्वात् । “समाधिः समतावस्था जीवात्मपरमात्मनो । ब्रह्मण्येव स्थितिर्या सा समाधि प्रत्यगात्मन ॥” इति तेनै- वोक्तत्वाच्च । तदुक्तं भगवता व्यासेन ‘योगः समाधि’ इति ॥ २६ ॥ कहाभी है निपात, उपसर्ग और धातु यह तीनों अनेकार्थक हैं तत्तत् अर्थनि- र्देश उपलक्षणमात्र है । कोई कोई युज् धातुको समाधि अर्थमेंभी पढते हैं याज्ञवल्क्य- बचनविरोधभी नहीं क्योंकि तत्रत्य योगशब्दभी समाधिअर्थक है जीवात्मा परमा- त्माकी समताको समाधि कहते हैं । जीवात्माको ब्रह्मभावमें जो स्थिति है वही जीवात्माका समाधि है इत्यादि उन्होंने कहा है । व्यास भगवाननेभी समाधिको योग कहा है ॥ २६ ॥ यद्येवमष्टाङ्गयोगे चरमस्यांगस्य समाधित्वमुक्तं पतञ्जलिना यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारध्यानधारणासमाधयोऽष्टांगानि योगस्येति । न चांग्येवांगतां गन्तुमुत्सहते उपकार्योपकारक- भावस्य दर्शपूर्णमासप्रयाजादौ भिन्नायतनत्वेनात्यन्तभेदादतः समाधिरपि न योगशब्दार्थो युज्यते ॥ २७ ॥ यदि कहो अष्टाङ्गयोगमें अन्तिम क्रियाको योग कहा । पतञ्जलिने यमनियमादि समाध्यन्त आठ योगके अङ्ग कहे अङ्गी कदापि अङ्ग नहीं हो सकता अङ्गी होता है उपकार्य, अङ्ग है उपकारक यह दोनों दर्शपूर्णमासादिमें अत्यन्त भेदसे प्रतीत है अतः योगशब्दका अर्थ समाधिभी युक्त नहीं है ॥ २७ ॥ ३५

[ पातञ्जल- (२७८) सर्वदर्शनसंग्रहः । इति चेत्तन्न युज्यते व्युत्पत्तिमात्राभिधित्सया तदेवार्थमात्रानि- र्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिरिति निरूपितचरमांगवाचकेन समाधिशब्देनांगिनो योगस्याभेदविवक्षया व्यपदेशोपपत्ते । न च व्युत्पत्तिबलादेव सर्वत्र शब्दः प्रवर्त्तते तथात्वे गच्छ- तीति गौरिति व्युत्पत्ते तिष्ठन् गौर्न स्यात् गच्छतो देवद- त्तस्य स्यात् ॥ २८ ॥ यहभी अयुक्त है क्योकि युज्यते इति व्युत्पत्तिमात्र विवक्षित है वही स्वरूप शून्य अर्थमात्र निर्भासक उक्त अन्तिम अङ्गरूप समाधिको अङ्गीरूप योगके साथ अभेद विवक्षा होनेसे योगशब्द व्यवहार होता है व्युत्पत्तिबलसेही सर्वत्र शब्द प्रवर्त्त होता है ऐसा नियम नहीं जन्यथा गच्छति ऐसी गौकी व्युत्पत्ति होनेसे स्थिति और शयनकालमें गौ नही कह सकेगी चलने समय देवदत्तकीभी गौसञ्ज्ञा होने लगेगी ॥ २८ ॥ प्रवृत्तिनिमित्तञ्च प्रागुक्तमेव चित्तवृत्तिनिरोध इति तदुक्तं योग- श्चित्तवृत्तिनिरोध इति । ननु वृत्तीना निरोधश्चेद्योगोऽभिमत- स्तासा ज्ञानत्वेवात्माश्रयतया तन्निरोधोऽपि प्रध्वंसपदेवेदनी- यस्तदाश्रयो भवेत् प्रागभावप्रध्वंसयोः प्रतियोगिसमानाश्रय- त्वनियमात् । ततश्चोपपन्नस्त्वयं धर्मो विकरोति हि धर्मिणमिति न्यायेनात्मन कौटस्थ्यं विहन्येतेति चेत्तदपि न घटते निरोधाना प्रमाणविपर्य्ययविकल्पनिद्रास्मृतिस्वरूपाणा वृत्तीनामन्त करणाद्यपरपर्य्यायचित्तधर्मत्वांगीकारात् । कूटस्थानित्या चिच्छक्तिरपरिणामिनी विज्ञानधर्माश्रयो भवितु नार्ह- त्येव ॥ २९ ॥ योगपदका प्रवृत्तिनिमित्त पूर्वोक्त चित्तवृत्तिको रोकना है यदि वृत्तिका निरोधही योग हो तो वृत्ति ज्ञानरूप होनेसे जात्माश्रित होगी उसका निरोध होगा प्रध्वस तादृश प्रध्वसकाभी आश्रय जात्मा होगा प्रागभाव, प्रध्वस दोनो स्वप्रतियोगीके साधिकरणवृत्ति होते हैं यथा भूतलवृत्ति घटका प्रध्वस भी मृतलवृत्ति होता है एवञ्च ध्वंसरूप धर्म रहनेसे धर्म धर्मोको विकारयुक्त करता है इस नियममे आत्माका

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत. । ( २७९ ) कूटस्थत्व नष्ट होगा यहभी संगत नहीं हे क्योंकि निरोधनीय प्रमाण, विपर्यय, वि- कल्प, निद्रा, और स्मृतिरूप वृत्तिको अन्त'करणपर्याय चित्तके धर्म माने हैं अतः कूटस्थ, नित्य और अपरिणामी चित् शक्ति विज्ञानधर्मका आश्रय नहीं हो सकती है ॥ २९ ॥ न च चितिशक्तेरपरिणामित्वमसिद्धमिति मन्तव्यम्, चिति- शक्तिरपरिणामिनी सदा ज्ञातृत्वात् न यदेवं न तदेवं यथा चित्तादि इत्याद्यनुमानसम्भवात् तथा यद्यसौ पुरुषः परि- णामी स्यात्तदा परिणामस्य कादाचित्कत्वात्तासां चित्तवृ- त्तीनां सदा ज्ञातृत्वं नोपपद्येत चिद्रूपस्य पुरुषस्य सदैवाधिष्ठा- तृत्वेनावस्थितस्य यदन्तरंगनिर्मलं सत्त्वं तस्यापि सदैव स्थितत्वात् येन येनार्थेनोपरक्तं भवति तस्य दृश्यस्य सदैव चिच्छायापत्त्या भानोपपत्त्या पुरुषस्य निःसंगत्वं सम्भवति । ततश्च सिद्धं तस्य सदाज्ञातृत्वामीति न काचित् परिणामित्वाशंकावतरति ॥ ३० ॥ शंका-चित्शक्ति अपरिणामिनी है इसमें कोई प्रमाणही नहीं । समाधान-ऐसाभी नहीं कह सकते क्योंकि चित्शक्ति अपरिणामी है सदा ज्ञाता होनेसे जो अपरिणामी नहीं वह सदा ज्ञाताभी जैसे चित्त इत्यादि अनुमानही प्रमाण है तथा यदि पुरुष परिणामी होते तो परिणाम कादाचित्क होनेसे चित्तवृत्तियोंको सदा ज्ञातृत्व उपपन्न नही होता सदा अधिष्ठातृत्वसे अवस्थित चिद्रूपपुरुषका अन्तरंग निर्मल सत्त्वभी सदा स्थित होनेसे जिस जिस वस्तुसे चित्त उपरक्त हो उस दृश्यका पुरुष प्रतिबि- म्बमात्रसे भान होनेमे पुरुष असंगभी होते हैं अत सदा ज्ञातृत्व सिद्ध होनेसे परि- णामित्व शंकाभी नही रही ॥ ३० ॥ चित्तं पुनर्येन विषयेणोपरक्तं भवति स विषयो ज्ञात , यदुप- रक्तं न भवति तदज्ञातमिति वस्तुनोऽयस्कान्तमणिकल्पस्य ज्ञानाज्ञानकारणभूतोपरागाजुरागधर्मित्वादय सधर्मकं चित्तं परिणामि इत्युच्यते ॥ ३१ ॥ चित्त जिस विषयसे उपरक्त हो वह ज्ञात होता है जिससे उपरक्त न होता हं वह अज्ञात होता है अत' लोहचुम्बकके समान वस्तुके नानाज्ञान कारणभूत