सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेत. । ( २७९ ) कूटस्थत्व नष्ट होगा यहभी संगत नहीं हे क्योंकि निरोधनीय प्रमाण, विपर्यय, वि- कल्प, निद्रा, और स्मृतिरूप वृत्तिको अन्त'करणपर्याय चित्तके धर्म माने हैं अतः कूटस्थ, नित्य और अपरिणामी चित् शक्ति विज्ञानधर्मका आश्रय नहीं हो सकती है ॥ २९ ॥ न च चितिशक्तेरपरिणामित्वमसिद्धमिति मन्तव्यम्, चिति- शक्तिरपरिणामिनी सदा ज्ञातृत्वात् न यदेवं न तदेवं यथा चित्तादि इत्याद्यनुमानसम्भवात् तथा यद्यसौ पुरुषः परि- णामी स्यात्तदा परिणामस्य कादाचित्कत्वात्तासां चित्तवृ- त्तीनां सदा ज्ञातृत्वं नोपपद्येत चिद्रूपस्य पुरुषस्य सदैवाधिष्ठा- तृत्वेनावस्थितस्य यदन्तरंगनिर्मलं सत्त्वं तस्यापि सदैव स्थितत्वात् येन येनार्थेनोपरक्तं भवति तस्य दृश्यस्य सदैव चिच्छायापत्त्या भानोपपत्त्या पुरुषस्य निःसंगत्वं सम्भवति । ततश्च सिद्धं तस्य सदाज्ञातृत्वामीति न काचित् परिणामित्वाशंकावतरति ॥ ३० ॥ शंका-चित्शक्ति अपरिणामिनी है इसमें कोई प्रमाणही नहीं । समाधान-ऐसाभी नहीं कह सकते क्योंकि चित्शक्ति अपरिणामी है सदा ज्ञाता होनेसे जो अपरिणामी नहीं वह सदा ज्ञाताभी जैसे चित्त इत्यादि अनुमानही प्रमाण है तथा यदि पुरुष परिणामी होते तो परिणाम कादाचित्क होनेसे चित्तवृत्तियोंको सदा ज्ञातृत्व उपपन्न नही होता सदा अधिष्ठातृत्वसे अवस्थित चिद्रूपपुरुषका अन्तरंग निर्मल सत्त्वभी सदा स्थित होनेसे जिस जिस वस्तुसे चित्त उपरक्त हो उस दृश्यका पुरुष प्रतिबि- म्बमात्रसे भान होनेमे पुरुष असंगभी होते हैं अत सदा ज्ञातृत्व सिद्ध होनेसे परि- णामित्व शंकाभी नही रही ॥ ३० ॥ चित्तं पुनर्येन विषयेणोपरक्तं भवति स विषयो ज्ञात , यदुप- रक्तं न भवति तदज्ञातमिति वस्तुनोऽयस्कान्तमणिकल्पस्य ज्ञानाज्ञानकारणभूतोपरागाजुरागधर्मित्वादय सधर्मकं चित्तं परिणामि इत्युच्यते ॥ ३१ ॥ चित्त जिस विषयसे उपरक्त हो वह ज्ञात होता है जिससे उपरक्त न होता हं वह अज्ञात होता है अत' लोहचुम्बकके समान वस्तुके नानाज्ञान कारणभूत