सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ पातञ्जल- (२७८) सर्वदर्शनसंग्रहः । इति चेत्तन्न युज्यते व्युत्पत्तिमात्राभिधित्सया तदेवार्थमात्रानि- र्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिरिति निरूपितचरमांगवाचकेन समाधिशब्देनांगिनो योगस्याभेदविवक्षया व्यपदेशोपपत्ते । न च व्युत्पत्तिबलादेव सर्वत्र शब्दः प्रवर्त्तते तथात्वे गच्छ- तीति गौरिति व्युत्पत्ते तिष्ठन् गौर्न स्यात् गच्छतो देवद- त्तस्य स्यात् ॥ २८ ॥ यहभी अयुक्त है क्योकि युज्यते इति व्युत्पत्तिमात्र विवक्षित है वही स्वरूप शून्य अर्थमात्र निर्भासक उक्त अन्तिम अङ्गरूप समाधिको अङ्गीरूप योगके साथ अभेद विवक्षा होनेसे योगशब्द व्यवहार होता है व्युत्पत्तिबलसेही सर्वत्र शब्द प्रवर्त्त होता है ऐसा नियम नहीं जन्यथा गच्छति ऐसी गौकी व्युत्पत्ति होनेसे स्थिति और शयनकालमें गौ नही कह सकेगी चलने समय देवदत्तकीभी गौसञ्ज्ञा होने लगेगी ॥ २८ ॥ प्रवृत्तिनिमित्तञ्च प्रागुक्तमेव चित्तवृत्तिनिरोध इति तदुक्तं योग- श्चित्तवृत्तिनिरोध इति । ननु वृत्तीना निरोधश्चेद्योगोऽभिमत- स्तासा ज्ञानत्वेवात्माश्रयतया तन्निरोधोऽपि प्रध्वंसपदेवेदनी- यस्तदाश्रयो भवेत् प्रागभावप्रध्वंसयोः प्रतियोगिसमानाश्रय- त्वनियमात् । ततश्चोपपन्नस्त्वयं धर्मो विकरोति हि धर्मिणमिति न्यायेनात्मन कौटस्थ्यं विहन्येतेति चेत्तदपि न घटते निरोधाना प्रमाणविपर्य्ययविकल्पनिद्रास्मृतिस्वरूपाणा वृत्तीनामन्त करणाद्यपरपर्य्यायचित्तधर्मत्वांगीकारात् । कूटस्थानित्या चिच्छक्तिरपरिणामिनी विज्ञानधर्माश्रयो भवितु नार्ह- त्येव ॥ २९ ॥ योगपदका प्रवृत्तिनिमित्त पूर्वोक्त चित्तवृत्तिको रोकना है यदि वृत्तिका निरोधही योग हो तो वृत्ति ज्ञानरूप होनेसे जात्माश्रित होगी उसका निरोध होगा प्रध्वस तादृश प्रध्वसकाभी आश्रय जात्मा होगा प्रागभाव, प्रध्वस दोनो स्वप्रतियोगीके साधिकरणवृत्ति होते हैं यथा भूतलवृत्ति घटका प्रध्वस भी मृतलवृत्ति होता है एवञ्च ध्वंसरूप धर्म रहनेसे धर्म धर्मोको विकारयुक्त करता है इस नियममे आत्माका