भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( २७७ ) यद् जगत है जीवेश्वरसंयोगके कारण जीव अथवा ईश्वर एककाभी कर्म्म नहीं है । व्यापक जनक संयोगका नैयायिकों और वैशेषिकोंने प्रत्याख्यानभी किये हैं “अप्राप्तयोस्तु या प्राप्तिः सैव संयोग ईरितः” इति । मीमांसक रीतिसे माने तोभी जीवेश्वर संयोग नित्य सिद्ध होनेसे सिद्धसाधनतापत्त्या शास्त्रही विफल होगा । और धातुका अनेकार्य होनेसे समाध्यर्थकमी हो सकता है ॥ २५ ॥ तदुक्तम्-“निपाताश्चोपसर्गाश्च धातवश्चेति ते त्रय । अने- कार्था स्मृताः सर्वे पाठस्तेषां निदर्शनम् ॥” इति । अत- एव केचन युजि समाधावपि पठन्ति ‘युज समाधौ’ इति । नापि याज्ञवल्क्यवचनव्याकोपः तत्रस्थस्यापि योगशब्दस्य समाध्यर्थत्वात् । “समाधिः समतावस्था जीवात्मपरमात्मनो । ब्रह्मण्येव स्थितिर्या सा समाधि प्रत्यगात्मन ॥” इति तेनै- वोक्तत्वाच्च । तदुक्तं भगवता व्यासेन ‘योगः समाधि’ इति ॥ २६ ॥ कहाभी है निपात, उपसर्ग और धातु यह तीनों अनेकार्थक हैं तत्तत् अर्थनि- र्देश उपलक्षणमात्र है । कोई कोई युज् धातुको समाधि अर्थमेंभी पढते हैं याज्ञवल्क्य- बचनविरोधभी नहीं क्योंकि तत्रत्य योगशब्दभी समाधिअर्थक है जीवात्मा परमा- त्माकी समताको समाधि कहते हैं । जीवात्माको ब्रह्मभावमें जो स्थिति है वही जीवात्माका समाधि है इत्यादि उन्होंने कहा है । व्यास भगवाननेभी समाधिको योग कहा है ॥ २६ ॥ यद्येवमष्टाङ्गयोगे चरमस्यांगस्य समाधित्वमुक्तं पतञ्जलिना यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारध्यानधारणासमाधयोऽष्टांगानि योगस्येति । न चांग्येवांगतां गन्तुमुत्सहते उपकार्योपकारक- भावस्य दर्शपूर्णमासप्रयाजादौ भिन्नायतनत्वेनात्यन्तभेदादतः समाधिरपि न योगशब्दार्थो युज्यते ॥ २७ ॥ यदि कहो अष्टाङ्गयोगमें अन्तिम क्रियाको योग कहा । पतञ्जलिने यमनियमादि समाध्यन्त आठ योगके अङ्ग कहे अङ्गी कदापि अङ्ग नहीं हो सकता अङ्गी होता है उपकार्य, अङ्ग है उपकारक यह दोनों दर्शपूर्णमासादिमें अत्यन्त भेदसे प्रतीत है अतः योगशब्दका अर्थ समाधिभी युक्त नहीं है ॥ २७ ॥ ३५