सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २८० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ पातञ्जल- उपरागानुपराग धर्मी होनेसे लोहाके समान धर्म्मवाला चित्त परिणामी कहता है ॥ ३१ ॥ ननु चित्तस्येन्द्रियाणां चाहंकारिकाणां सर्वगतत्वात् सर्वविषयै- रस्ति सदा सम्बन्धः तथा च सर्वेषां सर्वदा सर्वत्र ज्ञान प्रस- ज्येत । सर्वगतत्वेऽपि चित्तं यत्र शरीरे वृत्तिमत् तेन शरीरेण सह सम्बन्धो येषां विषयाणां तेष्वेवास्य ज्ञानं भवति नेतरेष्वि- त्यतिप्रसंगाभावादत एवायस्कान्तमणिकल्पा विषया अय - सधर्मकं चित्तमिन्द्रियप्रणालिकयाभिसम्बध्योपरञ्जयन्ति । तस्माच्चित्तस्य धर्मा वृत्तयो नात्मनः । तथा च श्रुतिः 'कामः संकल्पो विचिकित्सा श्रद्धा अश्रद्धा धृतिरधृतिरित्येतत्सर्वं मन एव' इति ॥ ३२ ॥ यदि कहो चित्त और आहंकारिक इन्द्रिय सब सर्वगत होनेसे सभी वस्तुके साथ सदा सम्बन्ध रहेगा अत सदा सबका ज्ञानका प्रसंग होगा सोभी नहीं चित्त सर्व- गत होनेपरभी जिस शरीरमें रहता हे उसी शरीरसे सम्बन्ध जिन विषयोंका हो उन्ही विषयका ज्ञान होता है अन्यका नहीं अत सर्वज्ञानप्रसगरूप अतिव्याप्ति नहीं एवञ्च लोहचुम्बकके समान विषय लोहाका समान चित्तको इन्द्रियप्रणालीद्वारा सम्बद्ध होकर उपरक्त करते हैं अत वृत्ति चित्तका धर्म्म है आत्माका नहीं श्रुतिमी कामसङ्कल्पादिको चित्तका धर्म्म कहती है ॥ ३२ ॥ चिच्छक्तेरपरिणामित्वं पञ्चशिखाचार्यैराख्यायि अपरिणा- मिनी भोक्तृशक्तिरिति पतञ्जलिनापि सदाज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्त- त्प्रभोः पुरुषस्यापरिणामित्वादिति चित्तपरिणामित्वेऽनुमान- मुच्यते । चित्तं परिणामि ज्ञाताज्ञातविषयत्वात् श्रोत्रादिव- दिति ॥ ३३ ॥ चिच्छक्ति को अपरिणामी पञ्चशिखाचार्यने और पतञ्जलि दोनोंने कहे हैं चि- त्तके अधिष्ठाता पुरुष अपरिणामी होनेसे सदा ज्ञाता है चित्तका अपरिणामित्वमें श्रोत्रके समान ज्ञाताज्ञातविषय होनेसे चित्त परिणामि है इत्यादि अनुमानभी है ॥ ३३ ॥