भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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( २७२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ पातञ्जल- भौ ॥” इति स्मृतिसम्भवात् । तथाच वृद्धिरादैजित्यादौ वृद्ध्या- दिशब्दवदथशब्दो मंगलार्थः स्यादिति चेत् ॥ १३ ॥ यदि कहो आरम्भ करनेके अभिमतप्रबन्धकी परिसमाप्तिके प्रतिबन्धक दुरितपु- ञ्जका उपशमनके लिये एव शिष्टाचारपरिपालनके लियेभी शास्त्रका आरम्भमें मंगल अवश्य अनुष्ठेय है अतएव भाष्यकारने कहाभी है कि जिस शास्त्रका आरम्भमें मंगल हो और मध्य तथा अन्तमें मंगल हो वह अत्यन्त प्रसिद्ध ( विस्तृत ) होता है ऐसे शास्त्रको बनानेवाले पुरुष आयुष्मान् ( दीर्घजीवी ) होते हैं वीर होते हैं इत्यादि । अथशब्दके मंगलार्थकत्व स्मृतिमेंभी कहा है “ ओंकार और अथशब्द दोनों ब्रह्माके कण्ठको भेदन करके निकले हैं अतएव दोनों मांगलिक हैं ” अतः वृद्धिश- ब्दवत् अथशब्दभी मंगलार्थक होगा ॥ १३ ॥ मैवं भाषिष्ठा । अर्थान्तरानिधानाय प्रयुक्तस्याथशब्दस्य वीणावेण्वादिध्वनिवच्छ्रवणे मंगलफलत्वोपपत्ते ॥ अथार्थान्त- रारम्भवाक्यार्थधीफलकस्याथशब्दस्य कथमन्यफलकतेति चेन्न अन्यार्थनीयमानोदकुम्भोपलम्भवत् तत्सम्भवात् । न च स्मृतिव्याकोपः मांगलिकविति मंगलप्रयोजकत्वविवक्षया प्रवृत्तेः । नापि पूर्वप्रकृतापेक्षोऽथशब्दः फलत आनन्तर्याव्य- तिरेकेण प्रागुक्तदूषणानुपङ्गात् ॥ १४ ॥ यहभी नहीं कह सकता अर्थान्तरतात्पर्यसे प्रयुक्तभी अथशब्द श्रवणमात्रसे मंग- लार्थ हो सकता है यथा वीणा वंशी आदिका शब्द श्रवणमात्रसे मंगलप्रद है यथा वा अन्यदीय दध्यादिका दर्शनमात्रसे मंगल होता है । यदि कहो अर्थान्तरारम्भक वाक्यार्थ ज्ञानफलक अथशब्दभी मंगलफलक कैसा होगा सो सुनो जिस प्रकार यात्रादिसमयमें दूसरेके लिये ले जाते हुये भरे घटको देखनेसे शुभ होता है तिसी प्रकार अथशब्दभी स्वरूपतः मंगल होगा । स्मृतिविरोधभी नहीं होगा क्योंकि उसमें मांगलिक पद है उसका अर्थ मंगल प्रयोजन है पूर्वप्रकृतापेक्षभी न होगा क्योंकि ऐसे होनेसे पूर्वोक्त विकल्पदोष तदवस्त होता है ॥ १४ ॥ किमयमथशब्दोऽधिकारार्थ अथानन्तर्यार्थ इत्यादिविमर्शा- वाक्ये पक्षान्तरोपन्यासे तत्सम्भवेऽपि प्रकृते तदसम्भवाच्च ।