सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २७४ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ पातञ्जल- शंका-याज्ञवल्क्यस्मृतिमें योगशास्त्रके प्रवर्तक हिरण्यगर्भको कहा है उनके वि- परीत पतञ्जलिको शास्त्रप्रवर्तक कैसे कहते हो ? सो सुनो ब्रह्माजीने तत्तत्पुराणोंमें प्रकीर्णरूपसे संक्षेपन कहा है इस लिये उक्त योग विशेषरूपसे दुर्बोध होनेके कारण परमदयालु शेषावतार पतञ्जलिने साङ्गको संग्रह करके अनुशासन ( पश्चादुपदे- श ) किया है साक्षात् शासन ( उपदेश ) नहीं किया ॥ १८ ॥ यदायमयंशब्दोऽधिकारार्थ तदैनं काव्यार्थं सम्पद्येत योगानु- शासनं शास्त्रमधिकृतं वेदितव्यमिति तत्र शास्त्रे व्युत्पाद्यमान- तया योग ससाधन सफलो विषय तद्व्युत्पादनमवान्तर- फल व्युत्पादितस्य योगस्य कैवल्यं परमप्रयोजनं शास्त्रयोगयो प्रतिपाद्यप्रतिपादकभावलक्षण सम्बन्धः योगस्य कैवल्यस्य च साध्यसाधनाभावलक्षण सम्बन्ध । स च श्रुत्यादिप्रसिद्ध इति प्रागेवावादिषम् । मोक्षमपेक्षमाणा श्रवणाधिकारिण इत्यर्थसिद्धम् ॥ १९ ॥ ( यदायमयशब्द ) इति जबके अधिकारार्थपक्षमें योगानुशासनको शास्त्र जानना ऐसा वाक्यार्थ होता है शास्त्रम व्युत्पाद्य मानेसे साधन और फलसहित योग इस शास्त्रका विषय है उसका व्युत्पादन अवान्तर फल है व्युत्पादित योगका कैवल्य (मोक्ष) परम प्रयोजन है शास्त्र और योगका प्रतिपाद्यप्रतिपादक भाव सम्बन्ध है कैवल्य और योगका साध्यसाधनभाव सम्बन्ध है वह 'अध्यात्मयोगा- धिगमेनेत्यादि पूर्वोक्तश्रुत्यादि सिद्ध है मोक्षार्थी श्रवणके अधिकारी है एवम् अनुब- न्धचतुष्टयभी उपपन्न हुआ ॥ १९ ॥ न चाथातो ब्रह्मजिज्ञासेत्यादावधिकारिणोऽर्थत सिद्धिरशं- कनीया तत्राथशब्देनानन्तर्याभिधाने प्रणाडिकया अधिकारि- समर्पणसिद्धावार्थिकत्वशङ्खानुदयात् । अत एवोक्तं 'श्रुतिप्राप्ते प्रकरणादीनामनवकाश' इति । अस्यार्थ यत्र हि श्रुत्या अर्थो न लभ्यते तत्रैव प्रकरणादयोऽर्थं समर्पयन्ति नेतरत्र । यत्र तु शब्दादेवार्थस्योपलम्भ तत्र नेतरस्य सम्भव ॥ २० ॥ जिस प्रकार योगशास्त्रमें अश्रुतभी कैवल्याभिलाषीरूप अधिकारी अर्थात् लब्ध होता है तिसी प्रकार ब्रह्म जिज्ञासादिमे अधिकारीको अर्थतः सिद्धत्व नहीं कह