भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत. । ( २७५ ) सकते क्योंकि तहापर अथशब्द शमाद्यानन्तर्य्यप्रतिपादक होनेसे शमादियुक्त अधि कारीका समर्पण होता है अतः आर्थिकत्व शंकाही नहीं । श्रुतिसिद्ध अर्थमें प्रकर- णादिका अवकाश नहीं श्रुतिसे अर्थ न लभ्य हों वही प्रकरणादि नियामक होते हैं अन्यत्र नहीं हैं ॥ २० ॥ शीघ्रबोधिन्या श्रुत्या बोधितेऽर्थे तद्विरुद्धार्थं प्रकरणादि समर्प- यति अविरुद्धं वा । न प्रथमः विरुद्धार्थबोधकस्य तस्य बाधि- तत्वात् । न चरमः वैयर्थ्यात्तदाह श्रुतिलिङ्गवाक्यप्रकरणस्था- नसमाख्यानां समवाये पारदौर्बल्यमर्थविप्रकर्षादिति ॥ २१ ॥ क्योंकि झटित्यर्थावबोधक श्रुति बोधित अर्थसे विरुद्ध अर्थको प्रकरणादिका बोधन करते हैं या अविरुद्ध अर्थका ? बाधित होनेसे विरुद्धार्थका बोधन नहीं कर सकते व्यर्थतापत्त्या अविरुद्धार्थकोभी नहीं बोधन कर सकते अतएव कहा है श्रुति, लिङ्ग, वाक्य, प्रकरण, स्थान, समाख्यामें पूर्व पूर्वक प्रति पर पर दुर्बल होते हैं क्योंकि उत्तरोत्तरसे अर्थबोधनमें विलम्ब होता है श्रुति निरपेक्ष वेदशब्द होनेसे दूसरेके अपेक्षा नहीं करती लिङ्ग श्रुतिकी कल्पना कर श्रुतिद्वारा अर्थबोधन करेगा बाक्यलिङ्ग श्रुति दोनोंकी कल्पना करके एव प्रकरणादिकभी पूर्वपूर्वकी कल्पना करेगा इसीमे उत्तरोत्तरमें विलम्ब होता है ॥ २१ ॥ " बाधिकैव श्रुतिर्नित्यं समाख्या बाध्यते सदा । मध्यमाना तु बाध्यत्वं बाधकत्वमपेक्षया ॥" इति च । तस्माद्विषयादिम- त्त्वाद् ब्रह्मविचारशास्त्रवद् योगानुशासनं शास्त्रमारम्भणीय- मिति स्थितम् ॥ २२ ॥ श्रुति नित्यही बाधिक बाध करनेवाली होती है अर्थात् श्रुतिका बाधक कोई नहीं होता । समाख्या नित्यही पूर्वपूर्वसे बाधित रहती है लिंगादिक पूर्वपूर्वका बाध्य और उत्तरोत्तरका बाधक होते हैं। अत विषयप्रयोजनादिक होनेसे ब्रह्मविचारशा- स्त्रवत् योगानुशासनभी आरम्भणीय है । यह सिद्ध हुआ ॥ २२ ॥ ननु व्युत्पाद्यमानतया योग एवात्र प्रस्तुतो न शास्त्रमिति चेत् सत्यं प्रतिपाद्यतया योगः प्राधान्येन प्रस्तुत स च तद्विषयेण शास्त्रेण प्रतिपाद्यत इति तत्प्रतिपादने करणं शास्त्रं करणगो- रश्च कर्तृव्यापारा न कर्मगोचरतामाचरति ॥ यथा छेतुर्देवद-