भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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( २६२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ सांख्य- तदन्वितत्वात् यद्येनान्वीयते तत्तत्कारणक यथा रुचकादिकं सुवर्णान्वितं सुवर्णकारणकं तथाचेदं तस्मात्तथोति ॥ ११ ॥ अतः सुखदुःखमोहात्मक जगत्का तादृश कारणही होना चाहिये अनुमान- प्रयोगभी है कि विवादास्पद वस्तुजात सुखदुःखमोहात्मक कारणजन्य है धर्मयुक्त होनेसे, जो जिस धर्मयुक्त हो वह तादृशकारणक होता है कटककुण्डलादि सुवर्णधर्मयुक्त होनेसे सुवर्ण कारणक है ॥ ११॥ तत्र जगत्कारणे येयं सुखात्मकता तत् सत्त्व, या दुः- कता तद्रजः, या च मोहात्मकता तत्तम् इति त्रिगुणात्- कारणसिद्धिः । तथाहि प्रत्येकं भावास्त्रैगुण्यवन्तोऽनुभूयन्- यथा मैत्रदारेषु सत्यवत्यां मैत्रस्य सुखमाविरास्ति तं प्रति सत्त्वगुणप्रादुर्भावात् तत्सपत्नीनां दुःखम् । तां प्रति रजोगुण- प्रादुर्भावात् तामलभमानस्य चैत्रस्य मोहो भवति तं प्रति तमोगुणसमुद्भवात् एवमन्यदपि घटादिक लभ्यमानं सुख करोति परैरपि ह्रियमाण दुःखाकरोति उदासीनस्योपेक्षाविष- यत्वेनोपतिष्ठते उपेक्षाविषयत्वं नाम मोहः मुह वैचित्त्येत्य- स्माद्धातोर्मोहशब्दनिष्पत्तेः उपेक्षणीयेषु चित्तवृत्त्यनुदयात्॥१२॥ जगत्के कारणम जो सुखात्मकता है वह सत्त्वगुण है । जो दुःखात्मकता है वह रजोगुण है और जो मोहात्मकता है वह तमोगुण है । एवं त्रिगुणात्मक कारण सिद्ध है । प्रत्येक वस्तु त्रिगुणात्मक उपलब्ध होता है जिस प्रकार मैत्रनामक एक पुरुषके, अनेक भार्याओंमें एकके विषयमें प्रेमाधिक होनेसे मैत्रको सुख प्रकट होता है उसके प्रति सत्त्वगुण प्रकट हुआ है अन्य सपत्नीको दुःख प्रकट होता है क्योंकि उनके प्रति रजोगुण अधिक आविर्भूत हो गया है । सत्यवतीके अलाभसे चैत्रको मोह होता है क्योंकि अलाभसे तमोगुण उत्पन्न हो जाता है । इसी प्रकार अन्य- घटादि जिसको मिल जाता है उसको सुख होता है और उसीके नष्ट होनेसे दुःख होता है । उदासीनके उपेक्षाविषय होता है उसका नाम मोह है मुहधातु वैचित्त्यर्थक है वैचित्त्यका अर्थ चित्तविकार है उपेक्षणीयविषयमें चित्तवृत्ति नहीं होती है ॥ १२ ॥ 1