सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( २६१ ) कूर्मस्यांगानि कूर्मशरीरे निविशमानानि तिरोभवन्ति निःसर- न्ति चाविर्भवन्ति एवं कारणस्य तन्त्वादेः पटादयो विशेषा निःसरन्त आविर्भवन्त उत्पद्यन्त इत्युच्यन्ते निविशमानास्ति- रोभवन्तो विनश्यन्तीत्युच्यन्ते न पुनरसतामुत्पत्तिः सतां वा विनाशः । यथोक्तं भगवद्गीतायाम्- "नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत " इति ॥ ततश्च कार्यानुमानात् तत्प्र- धानसिद्धिः ॥ ९ ॥ यदि सूतही पट है तो एक एक सूतसे ओढने बिछोनेका कार्य होना चाहिये यहभी नहीं कह सकते आतानवितानरूप सन्निवेशविशेषसे आविर्भूत पटही आच्छा- दन कार्यक्षम होता है जिस प्रकार कछुवका अङ्ग शरीरमें प्रविष्ट होनेसे तिरोहित और बाहर निकलनेसे आविर्भूत होता है तिसी प्रकार पटादि आविर्भूत होनेसे उत्प- द्यमान कहाते हैं तिरोधानदशामें नष्ट कहे जाते हैं न असत्की उत्पत्ति है और न सत्का विनाशही है । गीतामेंभी कहा है कि असत्वस्तुकी उत्पत्ति और सद्वस्तुका विनाश नहीं होता है अतः कार्यद्वारा कारणानुमानसे प्रधानकी सिद्धि होती है ॥ ९ ॥ तदुक्तम्- "असदकरणादुपादानग्रहणात् सर्वसम्भवाभावात् । शक्तस्य शक्यकरणात् कारणभावाच्च सत्कार्यम् ॥" इति ॥ नापि सतो ब्रह्मतत्त्वस्य विवर्त्तं प्रपञ्च वाधानुपलम्भात् अधि- ष्ठानारोप्ययोश्चिञ्जडयोः कलधौतरूप्यादिवत् सारूप्याभावे- नारोपासम्भवाच्च ॥ १० ॥ असत्कार्यका करना असम्भव होनेसे उपादानग्रहण अर्थात् घटके प्रति मृत्तिकाही- को उपादान करते हैं पटके लिये सूतहीको उपादान करते हैं अन्यको नहीं करते इससे सबसे सबकी उत्पत्ति न होनेसे कारणमें शक्त कार्यको करते हैं इन हेतुओंसे और कारणरूपसे कार्य सत् है सत् जो ब्रह्मतत्त्व उसका विवर्त्त प्रपञ्च नहीं है, क्योंकि बाधक उपलब्ध नहीं होता अधिष्ठान आरोप्य जो चित् और जड है उनका परस्पर शुक्तिरजतके समान सारूप्य न होनेसे आरोपही असम्भवही है ॥ १० ॥ तस्मात् सुखदुःखमोहात्मकस्य तथाविधकारणमवधारणीयं तथा च प्रयोग विमतं भावजातं सुखदुःखमोहात्मककारणकं