सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २७० ) सर्वदर्शनसंग्रह. । [ पातञ्जल- यदि कहो शब्दतः प्रधानभूत अनुशासनका शमाद्यानन्तर्य अथशब्दार्थ क्यों होगा सो नहीं कह सकते क्योंकि लक्षणभेद, उपाय, फलसहित योगका व्याख्यान जिससे न किया जाय इस व्युत्पत्तिसे निष्पन्न अनुशासन शब्दशास्त्र को कहता है अनु शासनकी तत्त्वज्ञानप्रकटनेच्छा उत्तरकालिक होनेसे शमदगाद्यानन्तर्य नियम नहीं हो सकता है जिज्ञासा और ज्ञानके शमाद्यनन्तरभावित्वका श्रुतिप्रतिपादन करती है कि शान्त इति बाह्याभ्यन्तरेन्द्रियनियमनपूर्वक तितिक्षु होकर हृदयमें आत्माको देखें इत्यादि तत्त्वज्ञान प्रकटनेच्छाके अनन्तरभी अथशब्दार्थ न हो सकता क्योंकि सम्भव भी तोभी श्रोताका विश्वास और प्रवृत्तिके अनुपयोग होनेसे वैयर्थ्य प्रसङ्ग है ॥९॥ तथापि निःश्रेयसहेतुतया योगानुशासनं प्रमितं न वा । आद्ये तदभावेऽपि उपादेयत्वं भवेत् । द्वितीये तदभावेऽपि हेयत्वं स्यात् । प्रमितं चास्य निःश्रेयसनिदानत्वम् 'अध्यात्मयोगाधि- गमेन चैवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाती' तिश्रुते । 'समाधाव चला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसी' ति स्मृतेश्च । अतएव शिष्य- प्रश्नतपश्चरणरसायनाद्युपयोगानन्तर्यं पराकृतम् ॥ १० ॥ ( तथापीति ) क्या मोक्षसाधनत्व योगानुशासनमें ज्ञात है या नहीं ? प्रथमपक्षमें अथ शब्दके विनाभी उपादेय हो जायगा । द्वितीय पक्षमें अथशब्द रहनेपरभी अनु पादेय होजायगा । 'अध्यात्मयोगद्वारा ध्यान करके वीर योगी पुरुष हर्ष शोकसे छूट जाता है' इत्यादि श्रुतियोंसे मोक्षसाधनत्वयोगमें प्रमित हे । समाधिमें निश्चल बुद्धि होनेसे योग प्राप्त होता है ऐसी स्मृतिभी है इसीमे शिष्य प्रश्न तपश्चरणायनन्तर्यभी तिरस्कृत हो गया ॥ १० ॥ अथातो ब्रह्मजिज्ञासेत्यत्र तु ब्रह्मजिज्ञासाया. अनधिकार्यत्वे- नाधिकार्यार्थत्वं परित्यज्य साधनचतुष्टयसंपत्तिविशिष्टाधिका- रिसमर्पणाय शमदमादिवाक्यविहिताच्छमादेरानन्तर्यमथश- ब्दार्थ इति शङ्कराचार्यैर्निरटङ्कि ॥ ११ ॥ ब्रह्मजिज्ञासासूत्रमें अथ जिस प्रकार आनन्तर्यार्थक है तिसी प्रकार योगानुशा- सनशास्त्रमेंभी क्यों न होगा इस आशंकाका परिहार करते हैं (अथात इति) अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" इत्यादि स्थलमें ब्रह्मजिज्ञासा अनधिकार्य होनेसे अधिकार्यार्थको त्याग कर शमदमादिसाधनचतुष्टययुक्त अधिकारिविशेषद्योतनार्थ शमाद्यानन्तर्यार्थकत्व शङ्कराचार्यने कहा है ॥ ११ ॥