भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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दर्शनम् ] , भाषाटीकासमेत । ( २६७ )

ननु पुष्करपलाशवन्निर्लेपस्य तस्य तापः कथमुपपद्यते येन परमेश्वरोऽनुग्राहकत्तया कक्षीक्रियते इति चेदुच्यते तापकस्य रजः सत्त्वमेव तप्यं बुद्ध्यात्मना परिणमते इति सत्त्वे परि- तप्यमाने तमोधशेन तदभेदावगाहिपुरुषोऽपि तप्यत इत्यु- च्यते ॥ तदुक्तमाचार्यैः- "सत्त्वं तप्यं बुद्धिभावेन वृत्तं भावा ते वा राजसास्तापकास्ते । तप्याभेदग्राहिणी तामसी वा वृत्ति- स्तस्या तप्य इत्युक्तमात्मा ॥” इति ॥ ३ ॥

कमलके पत्तेके समान निर्लेप पुरुषको तापही कैसे हो सकते हे जिसमें जगनुग्रा- हक परमेश्वरकी अपेक्षा हों सो कहते हैं (सत्त्वमेवेति) तापकर जो गुणके तप्य सत्त्व- गुणही बुद्धिरूपसे परिणत होता है अत सत्त्व तप्त होनेपर तमोगुणवश सत्त्वके साथ अभेदसे प्रतीयमान पुरुषभी तप्त कहा जाता है । "बुद्धिरूपसे परिणत सत्त्व तप्य है राजसभाब सब तापक है तप्यके साथ अभेद ग्रह करनेवाली तामसवृत्ति होनेसे आत्माभी तप्य कहाता है ॥ ३ ॥

पतञ्जलिनाप्युक्तम् । अपरिणामिनी हि भोक्तृशक्तिरप्रतिसं- क्रमा च परिणामिनीत्यर्थे प्रतिसंक्रान्तेव तद्वृत्तिमन्भभव- तीति ॥ भोक्तृशक्तिरिति चिच्छक्तिरुच्यते । सा चात्मैव परि- णामीत्यर्थे बुद्धितत्त्वे प्रतिसंक्रान्तेव प्रतिबिम्बिते तद्वृत्तिम- नुभवतीति बुद्धौ प्रतिबिम्बिता सा चिच्छक्तिर्बुद्धिच्छायापत्त्या बुद्धिवृत्त्यनुकारवतीति भावः । तथा शुद्धोऽपि पुरुषः प्रत्ययं बौद्धमनुपश्यति तमनुपश्यन्नतदात्मापि तदात्मक इव प्रतिभा- सत इति ॥ ४ ॥

पतञ्जलिभी कहा है कि स्वयं अपरिणामी ओर असंक्रमणशील चिच्छक्ति ( आत्मा ) परिणामी बुद्धितत्त्वमें प्रतिबिम्बित होनेपर अर्थात् बुद्धिमें प्रतिबिम्बित चिच्छक्ति बुद्धिच्छायासे बुद्धिवृत्तिको अनुग्रण करती है । तथा पुरुष शुद्ध हो तोभी बुद्धिका भोगको भोगता है उसको अनुभव करते हुए शुद्धात्मा पुरुष तत्तद्रिपया- भेदसे प्रतीत होता है ॥ ४ ॥