भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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( २८४ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ पातञ्जल- भावना करते हैं तदनन्तर सूक्ष्मपरमाण्वादि एव क्रमे निरालम्बन समाधि कर सकते हैं जब अन्त करण लक्षण सूक्ष्मतन्मात्राको आलम्बन कर पूर्वादि देश- कालपरिच्छेदसे भावना होती है तब सविचार समाधि कहते हैं जब रजोगुण तमोगुण- का लेशमात्रसे युक्त अतएव सत्त्ववृद्धि होनेमे सुख प्रकाश चित्तको भाव्य (लक्ष्य) करके भावना प्रवृत्त होती है तब सानन्द समाधि कहाते हैं जब रजस्तमलेशरहित शुद्धसत्त्वको आलम्बन करके भावना प्रवृत्त होती है उस भावनामें सत्त्वका न्यग्भाव (तिरोभाव) चितिशक्तिका उद्रेक (वृद्धि) होनेसे सत्त्वमात्र अवशिष्ट होनेसे सास्मित समाधि कहाता है। समस्तवस्तुनिरोध होनेसे असम्प्रज्ञात समाधि कहाता है ॥ ३८ ॥ ननु सर्ववृत्तिनिरोधो योग इत्युक्ते सम्प्रज्ञाते व्याप्तिर्न स्यात् तत्र सत्त्वप्रधानाया सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिलक्षणाया वृत्ते- रनिरोधादिति चेत्तदेतद्वार्त्तं क्लेशकर्मविपाकाशयपरिपन्थीच- त्तवृत्तिनिरोधो योग इत्यङ्गीकारात् । क्लेशा पुन पञ्चधा प्रसिद्धा अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशा ॥ ३९ ॥ समस्त वृत्तिका निरोधको योग मानो तो सम्प्रज्ञातसमाधिमें अव्याप्ति होगी उसमें सत्त्वप्रधान सत्त्वपुरुषको अन्यत्वज्ञान लक्षणवृत्तिका निरोध नहीं होता है ऐसे नहीं कह सकते क्लेशकर्म विपाकादिके विरोधी चित्तवृत्तिनिरोधको योग मानते हैं अवि- द्यादि पञ्च क्लेश हैं ॥ ३९ ॥ नन्वविद्येत्यत्र किमाश्रीयते पूर्वपदार्थप्राधान्यम् अमक्षिकं वर्त्तत इतिवत् उत्तरपदार्थप्राधान्यं वा राजपुरुष इतिवत् अन्य- पदार्थप्राधान्यं वा अमक्षिको देश इतिवत् । तत्र न पूर्वं पूर्व- पदार्थप्रधानत्वे अविद्याया प्रसज्यप्रतिषेधोपपत्तौ क्लेशादि कारकत्वानुपपत्ते अविद्याशब्दस्य स्त्रीलिगतवाभावापत्तेश्च । न द्वितीय कस्यचिदभावेन विशिष्टाया विद्याया- क्लेशादिपरि- पन्थित्वेन तद्वीजत्वानुपपत्तेः । न तृतीय नञोऽस्त्यर्थानां बहुव्रीहिर्वा चोत्तरपदलोप इति वृत्तिकारवचनानुसारेण अवि- द्यमाना विद्या यस्या सा अविद्या बुद्धिरिति समाधिसिद्धौ