सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेत' । ( २८३ ) ज्ञातसमाधि सम्यक् प्रज्ञायतेऽस्मिन् प्रकृतेर्विविक्ततया चित्त- मिति व्युत्पत्ते । स चतुर्विधः सवितर्कादिभेदात् । समाधि- र्नाम भावना, सा च भाव्यस्य विषयान्तरपरिहारेण चेतसि पुनः पुनर्न्निवेशनम् । भाव्यञ्च द्विविधम् ईश्वरस्तत्त्वानि च । तान्यपि द्विविधानि जडाजडभेदात् । जडानि प्रकृतिमहदहं- कारादीनि चतुर्विंशति अजड पुरुष ॥ ३७ ॥ सम्प्रज्ञात असम्प्रज्ञात भेदसे समाधि दो प्रकार है एकाग्रचित्तम बाह्यविषय प्र- माणादि वृत्तिका निरोध सम्प्रज्ञात समाधि है प्रकृतिसे पृथक् करके चित्तको सम्यक् प्रकार जिसम जाना जाय यह सम्प्रज्ञात समाधिकी व्युत्पत्ति है सवितर्कादि भेदसे सम्प्रज्ञात चार प्रकार है । भावनाको समाधि कहते हैं वह विषयान्तरको त्यागकर भाव्यको पुनः पुनः चित्तमें स्थिर करना है । ईश्वर और तत्त्वभेदसे तत्त्व दो प्रकारके हैं जड और अजडभेदसे तत्त्वभी दो प्रकारके हैं जड प्रकृति महदादि २४ पूर्वोक्त हैं अजड पुरुष है ॥ ३७ ॥ तत्र यदा पृथिव्यादीनि स्थूलानि विषयत्वेनादाय पूर्वापरानुस- न्धानेन शब्दार्थोल्लेख्यसम्भेदेन भावना प्रवर्त्तते स समाधि सवितर्क , यदा तन्मात्रान्तःकरणलक्षणं सूक्ष्म विषयमाल- म्ब्य देशाद्यवच्छेदेन भावना प्रवर्त्तते तदा सविचार , यदा रजस्तमोलेशानुपविद्धं चित्तं भाव्यते तदा सुखप्रकाशं यस्य सत्त्वस्योद्रेकात् सानन्द , यदा रजस्तमोलेशानभिभूतं शुद्ध- सत्त्वमालम्बनीकृत्य या प्रवर्त्तते भावना तदा तस्यां सत्त्वस्य न्यग्भावाच्चितिशक्तेरुद्रेकाच्च सत्त्वमात्रावशेषत्वेन सास्मित- समाधि वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात् सम्प्रज्ञात इति सर्ववृत्तिनिरोधे त्वसम्प्रज्ञात समाधि ॥ ३८ ॥ स्थूलपृथिव्यादि वस्तुको लक्ष्य करके पूर्वापरानुसन्धानपूर्वक घटादि शब्दार्थाल्ले- खसे भावना करते हैं उसको सवितर्क समाधि कहते हैं जिस प्रकार तीर चलानेवाले प्रथम स्थूलवस्तुको लक्ष्य करके निशाना लगाते हैं अनन्तर सूक्ष्म सूक्ष्मतरको लगाने हैं तिसी प्रकार योगाभ्यास करनेवालेभी प्रथमस्थूल मात्रावस्तुको लक्ष्य करके