सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत' । ( २८३ ) ज्ञातसमाधि सम्यक् प्रज्ञायतेऽस्मिन् प्रकृतेर्विविक्ततया चित्त- मिति व्युत्पत्ते । स चतुर्विधः सवितर्कादिभेदात् । समाधि- र्नाम भावना, सा च भाव्यस्य विषयान्तरपरिहारेण चेतसि पुनः पुनर्न्निवेशनम् । भाव्यञ्च द्विविधम् ईश्वरस्तत्त्वानि च । तान्यपि द्विविधानि जडाजडभेदात् । जडानि प्रकृतिमहदहं- कारादीनि चतुर्विंशति अजड पुरुष ॥ ३७ ॥ सम्प्रज्ञात असम्प्रज्ञात भेदसे समाधि दो प्रकार है एकाग्रचित्तम बाह्यविषय प्र- माणादि वृत्तिका निरोध सम्प्रज्ञात समाधि है प्रकृतिसे पृथक् करके चित्तको सम्यक् प्रकार जिसम जाना जाय यह सम्प्रज्ञात समाधिकी व्युत्पत्ति है सवितर्कादि भेदसे सम्प्रज्ञात चार प्रकार है । भावनाको समाधि कहते हैं वह विषयान्तरको त्यागकर भाव्यको पुनः पुनः चित्तमें स्थिर करना है । ईश्वर और तत्त्वभेदसे तत्त्व दो प्रकारके हैं जड और अजडभेदसे तत्त्वभी दो प्रकारके हैं जड प्रकृति महदादि २४ पूर्वोक्त हैं अजड पुरुष है ॥ ३७ ॥ तत्र यदा पृथिव्यादीनि स्थूलानि विषयत्वेनादाय पूर्वापरानुस- न्धानेन शब्दार्थोल्लेख्यसम्भेदेन भावना प्रवर्त्तते स समाधि सवितर्क , यदा तन्मात्रान्तःकरणलक्षणं सूक्ष्म विषयमाल- म्ब्य देशाद्यवच्छेदेन भावना प्रवर्त्तते तदा सविचार , यदा रजस्तमोलेशानुपविद्धं चित्तं भाव्यते तदा सुखप्रकाशं यस्य सत्त्वस्योद्रेकात् सानन्द , यदा रजस्तमोलेशानभिभूतं शुद्ध- सत्त्वमालम्बनीकृत्य या प्रवर्त्तते भावना तदा तस्यां सत्त्वस्य न्यग्भावाच्चितिशक्तेरुद्रेकाच्च सत्त्वमात्रावशेषत्वेन सास्मित- समाधि वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात् सम्प्रज्ञात इति सर्ववृत्तिनिरोधे त्वसम्प्रज्ञात समाधि ॥ ३८ ॥ स्थूलपृथिव्यादि वस्तुको लक्ष्य करके पूर्वापरानुसन्धानपूर्वक घटादि शब्दार्थाल्ले- खसे भावना करते हैं उसको सवितर्क समाधि कहते हैं जिस प्रकार तीर चलानेवाले प्रथम स्थूलवस्तुको लक्ष्य करके निशाना लगाते हैं अनन्तर सूक्ष्म सूक्ष्मतरको लगाने हैं तिसी प्रकार योगाभ्यास करनेवालेभी प्रथमस्थूल मात्रावस्तुको लक्ष्य करके
( २८४ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ पातञ्जल- भावना करते हैं तदनन्तर सूक्ष्मपरमाण्वादि एव क्रमे निरालम्बन समाधि कर सकते हैं जब अन्त करण लक्षण सूक्ष्मतन्मात्राको आलम्बन कर पूर्वादि देश- कालपरिच्छेदसे भावना होती है तब सविचार समाधि कहते हैं जब रजोगुण तमोगुण- का लेशमात्रसे युक्त अतएव सत्त्ववृद्धि होनेमे सुख प्रकाश चित्तको भाव्य (लक्ष्य) करके भावना प्रवृत्त होती है तब सानन्द समाधि कहाते हैं जब रजस्तमलेशरहित शुद्धसत्त्वको आलम्बन करके भावना प्रवृत्त होती है उस भावनामें सत्त्वका न्यग्भाव (तिरोभाव) चितिशक्तिका उद्रेक (वृद्धि) होनेसे सत्त्वमात्र अवशिष्ट होनेसे सास्मित समाधि कहाता है। समस्तवस्तुनिरोध होनेसे असम्प्रज्ञात समाधि कहाता है ॥ ३८ ॥ ननु सर्ववृत्तिनिरोधो योग इत्युक्ते सम्प्रज्ञाते व्याप्तिर्न स्यात् तत्र सत्त्वप्रधानाया सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिलक्षणाया वृत्ते- रनिरोधादिति चेत्तदेतद्वार्त्तं क्लेशकर्मविपाकाशयपरिपन्थीच- त्तवृत्तिनिरोधो योग इत्यङ्गीकारात् । क्लेशा पुन पञ्चधा प्रसिद्धा अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशा ॥ ३९ ॥ समस्त वृत्तिका निरोधको योग मानो तो सम्प्रज्ञातसमाधिमें अव्याप्ति होगी उसमें सत्त्वप्रधान सत्त्वपुरुषको अन्यत्वज्ञान लक्षणवृत्तिका निरोध नहीं होता है ऐसे नहीं कह सकते क्लेशकर्म विपाकादिके विरोधी चित्तवृत्तिनिरोधको योग मानते हैं अवि- द्यादि पञ्च क्लेश हैं ॥ ३९ ॥ नन्वविद्येत्यत्र किमाश्रीयते पूर्वपदार्थप्राधान्यम् अमक्षिकं वर्त्तत इतिवत् उत्तरपदार्थप्राधान्यं वा राजपुरुष इतिवत् अन्य- पदार्थप्राधान्यं वा अमक्षिको देश इतिवत् । तत्र न पूर्वं पूर्व- पदार्थप्रधानत्वे अविद्याया प्रसज्यप्रतिषेधोपपत्तौ क्लेशादि कारकत्वानुपपत्ते अविद्याशब्दस्य स्त्रीलिगतवाभावापत्तेश्च । न द्वितीय कस्यचिदभावेन विशिष्टाया विद्याया- क्लेशादिपरि- पन्थित्वेन तद्वीजत्वानुपपत्तेः । न तृतीय नञोऽस्त्यर्थानां बहुव्रीहिर्वा चोत्तरपदलोप इति वृत्तिकारवचनानुसारेण अवि- द्यमाना विद्या यस्या सा अविद्या बुद्धिरिति समाधिसिद्धौ
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत. । ( २८५ ) तस्या अविद्यायाः क्लेशादिबीजत्वानुपपत्तेः विवेकख्यातिपूर्व- कसर्ववृत्तिसम्पन्नायास्तस्यास्तथात्वाप्रसङ्गाच्च ॥ ४० ॥ अविद्या पद समस्त है इसमे तीन समास हो सकते है विद्याया अभाव यह अव्ययीभाव समास है इसमे पूर्वपद ( नञ् अ ) का अर्थ प्रधान रहता है यथा अमक्षिकम् । दूसरा न विद्या अविद्या यह तत्पुरुष है इसमे उत्तरपद ( विद्या ) का अर्थ प्रधान रहता है यथा राजपुरुषादि । तृतीय न विद्या यस्य यस्मिन् वा यह बहुव्रीहि है इसमें अन्यपद ( यस्य ) का अर्थ प्रधान रहता हे यथा अमक्षिक देश इत्यादि । प्रकृतमें तीनोंमेंसे क्या विवक्षित है ? प्रथमपक्षमें अभाव प्रधान होनेसे अभा- वको क्लेशादिजनकत्व अनुपपन्न होगा अव्ययीभाव समास नियमसे अव्यय होनेमे अविद्या पदमें स्त्रीलिङ्गत्वभी अनुपपन्न होगा । यत्किञ्चित् प्रतियोगिक अभावविशिष्ट अविद्या क्लेशादिके विरोधी होनेसे क्लेशादिका कारणत्व असम्भव होनेके कारण द्वि- तीयभी नहीं कह सकते । तृतीय पक्षमेंभी नञोऽस्त्यर्थानाम् इति वार्तिकनलसे अवि- द्यमान है विद्या जिस बुद्धिकी ऐसा विग्रह कर विद्यमानपदका लोप करनेसे अविद्या पदसेही समाधि बोधित होगा । पुनः अविद्याको क्लेशादिजनकत्व असम्भव है विवेक ख्यातिपूर्वक सर्ववृत्तिसम्पन्न अविद्या उस प्रकार होभी नहीं सकती है ॥ ४० ॥ उक्तञ्च-अस्मितादीना क्लेशानामविद्यानिदानत्वम् 'अवि- द्याक्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम्' इति । तत्र प्रसुप्तत्वं प्रबोधसहकार्याभावेनानभिव्यक्ति, तनुत्वं प्रतिपक्षभा- वनया शिथिलीकरणं, विच्छिन्नत्वं बलवता क्लेशेनाभिभवः, उदारत्वं सहकारिसन्निधिवशात् कार्यकारित्वम् । तदुक्तं वाच- स्पतिमिश्रेण व्यासभाष्यव्याख्यायाम् "प्रसुप्तास्तत्त्वलीनानां तनुदग्धाश्च योगिनाम् । विच्छिन्नोदाररूपाश्च क्लेशा विषयस- ङ्गिनाम् ॥" इति ॥ ४१ ॥ अविद्याक्षेत्रत्वमुत्तरेषामित्यादि अस्मितादिको अविद्यामूलत्व कहा हे प्रबोधका सहकारी न होनेसे अनभिव्यक्ति प्रसुप्तत्व है प्रतिपक्षभावनासे शिथिलीकरण तनुत्व है प्रबलक्लेशसे अभिभव विच्छिन्नत्व है सहकारीके सन्निधानसे कार्यकारित्व उदारत्व है वाचस्पतिमिश्रनेभी व्याख्यान किया है तत्त्वमें लीनोंके लिये प्रसुप्त योगि- योंके लिये तनुदग्ध है क्लेश अविषयसङ्गियोंके लिये विच्छिन्न उदाररूप है इति ॥ ४१ ॥
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( २८६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ पातञ्जल- द्वन्द्ववत् स्वतन्त्रपदार्थद्वयानवगमादुभयपदार्थप्रधानत्वं नाश- ङ्कितम् । तस्मात् पक्षद्वयेऽपि क्लेशादिनिदानत्वमविद्यायाः प्रसिद्धं हीयेतेति चेत् तदपि न शोभनं विभाति पर्युदासश- क्तिमाश्रित्याविद्याशब्देन विद्याविरुद्धस्य विपर्ययज्ञान- स्याभिधानमिति वृद्धैरङ्गीकारात् । तदाह-“नामधात्वर्थयोगे तु नैव नञ् प्रतिषेधक । वदत्यब्राह्मणाधर्म्मावन्यमात्रविरोधि- नौ ॥”इति । वृद्धप्रयोगगम्या हि शब्दार्थाः सर्व एव न । तेन यत्र प्रयुक्तो यो न तस्मादपनीयते ॥” इति च ॥ ४२ ॥ धवखदिरादिवत् पदार्थद्वय प्रसिद्ध न होनेसे द्वन्द्वकी आशङ्का नहीं की अतः पक्ष- द्वयमें भी क्लेशादिजनकत्व जो अविद्यामें प्रसिद्ध हे वह नहीं रहेगा ऐसे कहो तो यह भी शोभा नहीं देती है क्योंकि पर्युदासार्थ मानकर विद्याविरुद्ध विपर्ययज्ञान बोधकत्व वृद्धोंने माना है तदाह प्रतिपादिकार्थके योगमें नञ् प्रतिषेधार्थक नहीं होता है अब्राह्मण अधर्म्म इत्यादिमे ब्राह्मणसे अन्य धर्म्मसे विरुद्धको कहते हैं शब्दका अर्थ वृद्धव्यवहारसे जाना जाता है अतः वृद्धोंने जिस अर्थमें प्रयोग किये हों उस अर्थसे अन्यार्थबोधक नहीं हो सकेगा ॥ ४२ ॥ वाचस्पतिमिश्रैरप्युक्तम् “लोकाधीनावधारणो हि शब्दार्थयोः सम्बन्ध लोके चोत्तरपदार्थप्रधानस्यापि नञ् उत्तरपदार्थामिधे- योपमर्दकस्य तद्विरुद्धतया तत्र तत्रोपलम्भेरिहापि तद्विरुद्धे प्रवृत्ति ”इति। एतदेवाभिप्रेत्योक्तम् “अनित्याशुचिदुःखाना- त्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्येति । अतस्मिंस्तद्बु- द्धिविपर्ययः” इत्युक्तं भवति । तद्यथा अनित्ये घटादा । नत्य त्वाभिमानः अशुचौ कार्थादौ शुचित्वप्रत्यय ॥ ४३ ॥ कि शब्दार्थसम्बन्ध लोकव्यवहारसे निश्चत होता है लोकमें उत्तरपदार्थप्रधानको भी उत्तरपदार्थको उपमर्दक तद्विरुद्धार्थक नञ् उपलब्ध होता है। अतः यहाँ भी तद्वि- रुद्धार्थमें प्रवृत्ति होगी इस प्रकार वाचस्पतिमिश्रने कहा हे इसी अभिप्रायसे अनित्य घटादिमें नित्यत्वाभिमान, अशुचिकार्यमें, शुचित्वप्रतीति दुःखमें सुखाभिमान ओर अनात्मा देहादिमे आत्माभिमानको अविद्या कहा है । अन्यमें अन्य बुद्धिको विपर्यय कहा है ॥ ४३ ॥
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतं । ( २८७ ) "स्थानाद्बीजादुपष्टम्भान्नि ष्यन्दान्निधनादपि । कायमावेय- शौचत्वात् पण्डिता ह्यशुचिं विदुः ॥" इति । परिणामता- पसंस्कारैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिन इति न्या- येन दुःखे स्रक्चन्दनवनितादौ सुखत्वारोपः अनात्मनि देहा- दावात्मबुद्धि । तदुक्तम्- "अनात्मनि च देहादावात्मबुद्धिस्तु देहिनाम् । अविद्या तत्कृतो बन्धस्तन्नाशे मोक्ष उच्यते " ॥ इति । एवमियमविद्या चतुष्पादा भवति ॥ ४४ ॥ पण्डितलोग शरीरको निम्न लिखित हेतुओंसे सदा अशुचि कहते हैं स्थान मलमू- त्रादिसे पूरित माताके उदरमें स्थिति होनेसे शुक्रशोणितादिसे उत्पन्न होनेसे निष्पन्दसे अर्थात् मलमूत्रादिका निर्गमनद्वार होनेसे नाश होनेसे मलमूत्राद्याधार होनेसे सांसारिक सुख सब विवेकियोके लिये दुःख है यथा परिणाम यावत्काल विषय भोग करता है तावत्काल सुख प्रतीत होता है अनन्तर भोगतृष्णादि बढनेसे उसका परिणाम दुःख होता है एव ताप वही वस्तु जिनको नही मिलनेसे तापकारक होता है उसकी प्राप्तिकी चिन्ता बनी रहनेसे सस्कारमेंभी दुःखी होता है अतएव कहा है "तदेव प्रीतये भूत्वा पुनर्दुःखाय कल्पते" इति। चन्दन, कुसुम, रमणी आदि दुःखहेतुमे सुखत्वारोप है। प्राणियोंकी अनात्मभूत देहादिमें आत्मबु- द्विको अविद्या कहते है तादृश अविद्यामूलक बन्ध (ससार) होता है अविद्या नाश होनेसे मोक्ष होता है इस प्रकार अविद्याको अनित्य अशुचि दुःख अनात्मरूप चार पाद है ॥ ४४ ॥ नन्वेतेष्वविद्याविशेषेषु किञ्चिदनुगतं सामान्यलक्षणं वर्णनीयम् अन्यथा विशेषस्यासिद्धे । तथाचोक्तं भट्टाचार्यैः -"सामान्य- लक्षणं त्यक्त्वा विशेषस्यैव लक्षणम् । न शक्यं केवलं वक्तुमं- गोऽप्यस्य न वाच्यता ॥" इति । तदपि न वाच्यमतस्मिं- स्तद्बुद्धिरिति सामान्यलक्षणाभिधानदत्तोत्तरत्वात् ॥ ४५ ॥ लक्षणप्रमाणसे वस्तुसिद्ध होती है लक्षणभी सामान्यलक्षणपूर्वक विशेष लक्षण होता है यथा द्रव्यसामान्यज्ञानानन्तर द्रव्यविशेष पृथिव्यादिका लक्षण होता है तद्वत् अविद्याविशेषमें सर्वत्र अनुगत सामान्य लक्षण कहना चाहिये नहीं तो विशेष प्रतीति न होगी "सामान्यलक्षणको छोडकर केवल विशेषकाही लक्षण कहना अ
( २८८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ पातञ्जल- शक्य है” इत्यादि भट्टाचार्यनेभी कहा है। प्रकृतमें सामान्यलक्षण न कहनेसे अनुपप- त्ति होगी ऐसेभी नहीं कह सकते क्योंकि अन्यमें अन्य बुद्धि अविद्या है इस प्रकार अविद्याका सामान्य लक्षण कह चुका हूँ ॥ ४५ ॥ सत्त्वपुरुषयोरहमस्मीत्येकताभिमानोऽस्मिता । तदप्युक्तं, ‘दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मत्वाभिमानोऽस्मिता’ इति ॥ ४६ ॥ अत्यन्तविलक्षण सत्त्व ( प्रधान ) और पुरुष दोनोंकी एकताभिमान अस्मिता है दृक्शक्ति पुरुष है दर्शनशक्ति बुद्धि ( अन्तःकरण ) है आत्मा नित्य और असंग है अन्त करण सुखदु खादिका भोक्ता है अविद्यावश दोनोंका अभेदाभिमान होता है ॥ ४६ ॥ सुखाभिज्ञस्य सुखानुस्मृतिपूर्वक सुखसाधनेषु तृष्णारूपो गर्द्धो राग ॥ ४७ ॥ अनुभूत सुखको स्मरण कर सुखसाधनोंमें तृष्णा बढाना राग है अनुभूत दु खको स्मरण कर दु खसाधनोंमें निन्दाका नाम द्वेष है ॥ ४७ ॥ दु खज्ञस्य तदनुस्मृतिपुर सर तत्साधनेषु निन्दा द्वेष. । तदुक्तं ‘सुखानुशयी राग दु खानुशयी द्वेष.’ इति । किमत्रानु- शायिशब्दे ताच्छील्यार्थे णिनिरिनिर्वा मत्वर्थो योऽभिमत. । नाद्यः सुप्यजातौ णिनिस्ताच्छील्य इत्यत्र सुपीति वर्त्तमाने पुन सुब्ग्रहणस्य उपसर्गेनिवृत्त्यर्थत्वेन सोपसर्गाद्धातोर्णिने- रनुत्पत्ते यथाकथञ्चिदंगीकारेऽपि अचोऽणितीति वृद्धिम- सक्तावतिशय्यादिपदवदनुशायिपदस्य प्रयोगप्रसंगात् । न द्वितीय । ‘एकाक्षरात् कृतो जातेः सप्तम्यां च न तौ स्मृतौ” इति। तत्प्रतिषेधादत्र चानुशयशब्दस्याजन्तत्वेन कृदन्त- त्वात् । तस्मादनुशयिशब्दो दुरुपपाद इति चेत् नैतद्भद्रं भावानवबोधात् प्रायिकाभिप्रायमिद् वचनम् । अतएवोक्तं वृत्तिकारेण-‘इतिकरणो विवक्षार्थ सर्वत्राभिसम्बध्यते’ इति । तेन काचिद्भवति कार्य कार्थिकस्तण्डुली तण्डुलिक इति ।
१३. शाङ्कर अद्वैत वेदान्त दर्शन व उपसंहार
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( २८९ ) तथाच कृदन्ततया जातेश्च प्रतिषेधस्य प्रायिकत्वम् अनुशयश- ब्दस्य कृदन्तात् इनेरुपपत्तिरिति सिद्धम् ॥ ४८ ॥ शंका-सुखानुशयी और दुःखानुशयी इन दोनों सूत्रोंम जो अनुशयी शब्द है उसमें क्या ताच्छील्येऽर्थम णिनि प्रत्यय है या मत्वर्थमे इनिप्रत्यय है । प्रथम कह नहीं सकते क्योंकि सुप्यजातौ इस सूत्रमें सुपिस्यमे सुप्की अनुवृत्ति चली, आती है पुन' सुप्करन सामर्थ्यसे उपसर्गभिन्न सुप्का ग्रहण होता है अत उपस- र्गपूर्वक धातुसे णिनि नहीं होगा “पतत्यधो धाम विसारि सर्वतः” “स वभ्रुगोपजीवि- नाम् ' इत्यादि प्रसिद्ध कविप्रयोगोंकी समान कथञ्चित् णिनि मानाभी जाय तोभी वृद्धि दुर्वार होनेसे अनुशायी पद बनेगा अनुशयी न बन सकेगा । द्वितीयभी नहीं कह सकते एकाचूसे जातिवाचक कृदन्तसे, सहमन्तसे इन् और ठन् नहीं होते हैं श्ववान्, व्यघ्रवान्, दण्ड' सन्ति अस्या शालायाम् इत्या- दि इसके उदाहरण है यहा परभी अनुशयशब्द कृदन्ती अच्प्रत्ययान्त है अतः अनुशयी शब्द असाधु है ऐसा कहनाभी अनुचित है क्योंकि अभिप्रायको आप नहीं जानते हैं यह वार्तिक प्रायिक है अर्थात् सर्वत्र निषेध करताही है ऐसा नियम नहीं है अतएव वृत्तिकारने इतिशब्दको विवक्षितार्थ कहा है अतएव कार्य्यी इत्या- दिमें इनि भया अत अनुशयशब्द कृदन्त होनेपरभी इनि हो गया वस्तुत' अनुशन्द कृदन्त होनेपरभी व्याघ्रादिवत् जातिवाचक न होनेसे निषेधकी प्रवृत्तिही नहीं है अत शंका समाधान दोनों भूसा लेपनमात्र है ॥ ४८ ॥ पूर्वजन्मानुभूतमरणदुःखानुभववासनावलात् सर्वस्य प्राणभृ- न्मात्रस्याकृमेश च विदुषः सञ्जायमान शरीरविषयादेर्मम वियोगो मा भूदिति प्रत्यह निमित्त विना प्रवर्त्तमानोभयरू- पोऽभिनिवेश पञ्चम क्लेश । 'मा च भूवं हि भूयासमिति प्रार्थनाया प्रत्यात्ममनुभवसिद्धत्वात् । तदाह 'स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेश' इति । ते चाविद्यादय पञ्च सांसारिकविविधदुःखोपहारहेतुत्वेन पुरुष क्लिश्नन्तीति क्लेशा- प्रसिद्धाः ॥ ४९ ॥ पूर्वजन्ममें अनुभूत मरणदुःखानुभववासनावश कृमिसे लेकर बडे ज्ञानविर्य्य ट समस्त आर विषयादि प्राणियाको हमारे शरीरका नाश न हो इस प्रकार विन निमित्तके उत्पन्न भयरू। नाम अभिनिवेश है यही पाँचों क्लेश हैं उक्त अविद्यादिन १९
( २९० ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ पातञ्जल- सांसारिक विविध दुःखहेतु होनेके कारण पुरुषको क्लेश ( उपताप ) युक्त कर देनेसे क्लेश कहे जाते हैं ॥ ४९ ॥ कर्माणि विहितप्रतिषिद्धरूपाणि ज्योतिष्टोमब्रह्महत्यादीनि विपाकाः कर्मफलानि जात्यायुर्भोगाः आफलविपाकाच्चित्त- भूमौ शेरते इत्याशया धर्माधर्मसंस्काराः तत्परिपन्थिचि- त्तवृत्तिनिरोधो योगः निरोधो नाभावमात्रमभिमतं तस्य तुच्छ- त्वेन भावरूपसंस्कारजननक्षमतासम्भवात्, किन्तु तदा- श्रयो मधुमतीमधुप्रतीकाविशोकासंस्कारशेषतान्यपदेश्यः चित्तस्यावस्थाविशेषः निरुध्यन्तेऽस्मिन् प्राणाद्याश्चित्तवृत्तय इति व्युत्पत्तेरुपपत्तेः ॥ ५० ॥ विहित ज्योतिष्टोम अग्निहोत्रादि और प्रतिषिद्ध ब्रह्महत्या कलञ्जभक्षणादि कर्म हैं ब्राह्मणत्वादि जाति, आयु भोगरूप कर्मका फल विपाक है विपाकका फलो- त्पत्तिपर्यन्त चित्तभूमिमें रहनेवाले धर्माधर्मसंस्कार आशय हैं उसके विरोधी जो चित्तकी वृत्तियां हैं उनका रोकना योग है निरोधपदमें अभावमात्र नहीं विवक्षित है क्योंकि अभाव अलीक पदार्थ होनेसे वह भावरूप संस्कारका जनक नहीं हो सकता किन्तु मधुमति मधुप्रतीकादि संज्ञक चित्तकी अवस्थाविशेष निरोध है निरोध किया जाय प्राणादि चित्तवृत्तिको जिसमें इस व्युत्पत्तिसे यही अर्थ प्रतीत होता है ॥ ५० ॥ अभ्यासवैराग्याभ्यां वृत्तिनिरोधः तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः। प्रकाशनप्रवृत्तिरूपवृत्तिरहितस्य चित्तस्य स्वरूपनिष्ठः परि- णामविशेषः स्थितिः । तन्निमित्तीकृत्य यत्नः पुनः पुनस्त- थात्वेन चेतसि निवेशनमभ्यासः। चर्मणि द्वीपिनं हन्तीति व- न्निमित्तार्थेयं सप्तमीत्युक्तं भवति ॥ ५१ ॥ ‘तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्’ इत्युक्तप्रकार निरोध दुःसाध्य समझकर उसका उपाय कहते हैं (अभ्यासेति) अभ्यास ओर वैराग्यसे उसका निरोध प्रकाशनप्रवृत्तिरहित चित्तकी स्वरूपावस्थानरूप परिणामविशेष स्थिति है उस स्थितिके लिये यत्न बारम्बार चित्तमें निवेश करना अभ्यास है। स्थितौ यहांपर सप्तमी निमित्त अर्थमें है जिस प्रकार चर्मणिद्वीपिनंहन्ति इत्यादि स्थलमें है॥ ५१ ॥
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( २९१ ) दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् । ऐहि- कपारत्रिकविषयादौ दोषदर्शनान्निराभिलाषस्य ममैते विषया वश्याः नाहमेतेषां वश्य इति विमर्शो वैराग्यमित्युक्तं भवति ॥ समाधिपरिपन्थिकेशतनूकरणार्थं समाधिलाभार्थं च प्रथमं क्रियायोगविधानपरेण योगिना भवितव्यं क्रियायोगसम्पादने अभ्यासवैराग्ययोः सम्भवात् ॥ ५२ ॥ इस लोक और परलोकमें दुःखजनकत्व परिणामित्वादि दोष देखकर तद्विषयक अभि- लाषा छोड यह सब मेरे वश्य हैं। मैं इनके वश्य नहीं हूं इस विचारको वैराग्य कहते हैं । समाधिके विरोधी क्लेशादिको शिथिल करनेके ओर समाधिप्राप्तिके लिये प्रथम क्रिया हे योगीको योगविधानमे तत्पर होना चाहिये क्रियायोगसम्पादनसेही अभ्यास और वैराग्य होसकता है ॥ ५२ ॥ तदुक्तं भगवता-“आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते । योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥” इति । क्रिया- योगश्चोपदिष्टः पतञ्जलिना-‘तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः' इति । तपः स्वरूपं निरूपितं याज्ञवल्क्येन । “विधिनाक्तेिन मार्गेण कृच्छ्रचान्द्रायणादिभिः । शरीरशोषणं प्राहुस्तपसां तप उत्तमम् ॥” इति । प्रणवगायत्रीप्रभृती- नामध्ययनं स्वाध्याय इति । ते च मन्त्रा द्विविधा वैदिका- स्तान्त्रिकाश्च । वैदिकाश्च द्विविधाः प्रगीता अप्रगीताश्च । तत्र प्रगीता सामानि, अप्रगीताश्च द्विविधा छन्दोवद्धास्त- द्विलक्षणाश्च । तत्र प्रथमा ऋच । द्वितीया यजूंषि । तदुक्तं जैमिनिना-‘तेषामृग् यत्रार्थवशेन पाद्व्यवस्था गीतिषु सामा- ख्या शेषे यजु शब्द' इति ॥ ५३ ॥ योगमार्गमें चढनेकी इच्छावाले मुनिको प्रथम कर्म ( क्रिया ) करना चाहिये योगमें आरूढ मुनिको शम साधन हे । क्रिया योगभी पतञ्जलिने कहा है । तप, स्वाध्याय ओर ईश्वरप्रणिधानका नाम क्रिया योग है । वेदादिविहित प्रकार
( २९२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ पातञ्जल- कृच्छ्रचान्द्रायणादि व्रतोंसे शरीरको शोषण करना उनमें श्रेष्ठ तप है। प्रणव गायत्री वेदोपनिषदादिका अध्ययन स्वाध्याय है । वैदिक तान्त्रिक भेदसे मन्त्र दो प्रकार है वैदिक मन्त्रभी दो प्रकार है एक प्रगीत दूसरा अप्रगीत है । प्रगीत साम है जिसको गान किया जाता है छन्दोबद्ध और उससे विलक्षण भेदमे अप्रगीतभी दो प्रकार है प्रथम ऋक् है जिसमें अर्थवश पादव्यवस्था होती है दूसरा यजु है इसमें पादव्यवस्था नहीं है ॥ ५३ ॥ तन्त्रेषु कामिककारणप्रपञ्चाद्यागमेषु ये ये वर्णितास्ते तान्त्रि- का ॥ ते पुनर्मन्त्रास्त्रिविधा स्त्रीपुन्नपुंसकभेदात्तत्राह-“स्त्री- पुंनपुंसकत्वेन त्रिविधा मन्त्रजातयः । स्त्रीमन्त्रा वह्निजायान्ता नमोऽन्ताः स्युर्नपुंसका । शेषाः पुमांसस्ते शस्ता सिद्धा वश्यादिकर्मणि ॥” इति ॥ ५४ ॥ कामिक और कारण प्रपञ्चाद्यागममें जो प्रतिपादित मन्त्र हे वह तान्त्रिक हे । स्त्री पुरुष नपुंसकभेदसे वे मन्त्र तीन प्रकार हैं । स्वाहान्त मन्त्र स्त्री मन्त्र है नम पद जिसके अन्तमें हो वह नपुंसक मन्त्र है । अवशिष्ट पुरुष मन्त्र हैं । वशीकरणादि कार्योंमें पुमन्त्र प्रशस्त हैं ॥ ५४ ॥ स्नापनादिसंस्काराभावेऽपि निरस्तसमस्तदोषत्वेन सिद्धिहेतु- त्वात् सिद्धत्वम् । स च संस्कारो दशविध कथितः शारदा- तिलके ॥ “मन्त्राणा दश कथ्यन्ते संस्कारा सिद्धिदायिन । निर्दोषतां प्रयान्त्याशु ते मन्त्राः साधु संस्कृताः ॥ ५५ ॥ अभिषेकादि संस्कार न होनेपरभी निर्दोष होनेके कारण सिद्ध हेतु होनेसे सिद्ध कहाते हैं । मन्त्रोंके सिद्धि प्रद दश प्रकारके संस्कारोंको कहते हैं जिन संस्कारोंसे संस्कृत मन्त्र शीघ्रही निर्दुष्ट हो जाते हैं ॥ ५५ ॥ जननं जीवनञ्चैव ताडनं बोधनं तथा । अभिषेकोऽथ विमली- करणाप्यायने पुनः ॥ तर्पणं दीपनं गुप्तिर्दशैता मन्त्रसत्क्रिया ॥ मन्त्राणां मातृकावर्णादुद्धारो जननं स्मृतम् ॥ ५६ ॥ दशविध संस्कार इस प्रकार हैं । १ जनन २ जीवन ३ ताडन ४ बोधन ५ अभि- षेक ६ विमलीकरण ७ आप्यायन (पुष्टि) ८ तर्पण ९ दीपन और १० गुप्ति यही दश संस्कार हैं मन्त्रोंको मातृका वर्णोंसे उद्धार करनेका नाम जनन है ॥५६॥
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( २९३ ) प्रणवान्तरितान् कृत्वा मन्त्रवर्णान् जपेत् सुधी ॥ मन्त्रार्ण- संख्यया तद्धि जीवनं संप्रचक्षते ॥ ५७ ॥ बुद्धिमान् लोग प्रणवको अन्तरित युक्त करके मन्त्रवर्णको मन्त्रके अक्षरोंकी संख्यामें जप करनेका नाम जीवन है ॥ ५७ ॥ मन्त्रवर्णान् समालिख्य ताडयेच्चन्दनाम्भसा ॥ प्रत्येकं वायु- बीजेन ताडनं तदुदाहृतम् ॥ ५८ ॥ मन्त्राक्षरोंको लिखकर प्रत्येक अक्षरोंको वायुबीजका उच्चारण करके चन्दनजलसे ताडन ( प्रोक्षण ) करनेको ताडन कहते हैं ॥ ५८ ॥ विलिख्य मन्त्रवर्णांस्तु प्रसूनै करवीरजैः ॥ मन्त्राक्षरेण संख्या- तैर्हन्यात्तद्बोधनं मतम् ॥ ५९ ॥ मन्त्राक्षरोंको लिखकर अक्षरसमसंख्यक कनेरके फूलोंसे हनन करनेको बोधन कहते हैं ॥ ५९ ॥ स्वतन्त्रोक्तविधानेन मन्त्री मन्त्रार्णसंख्यया ॥ अश्वत्थपल्लवै- र्मन्त्रमभिषिञ्चेद्विशुद्धये ॥ ६० ॥ जापक तत्तन्मन्त्रविधिसे मन्त्र शुद्धयर्थ पीपलके पत्तोंसे मन्त्राक्षरसंख्याकी बराबर अभिषिक्त करनेको अभिषेक कहते हैं ॥ ६० ॥ सञ्चिन्त्य मनसा मन्त्रं ज्योतिर्मन्त्रेण निर्दहेत् । मन्त्रे मलत्रयं मन्त्री विमलीकरणं हि तत् ॥ तारव्योमाग्निमनुयुक्तं ज्योति- र्मन्त्र उदाहृत ॥ ६१ ॥ मनसे मन्त्रको चिन्तवन कर ज्योतिर्मन्त्रसे मलत्रयको निर्दहन करे इसीको विमली करण कहते हैं । तार, व्योम, अग्नियुक्त मन्त्र ज्योतिर्मन्त्र है ॥ ६१ ॥ कुशोदकेन जप्तेन प्रत्यर्णं प्रोक्षणं मनो । वारिबीजेन विधिव- देतदाप्यायनं मतम् ॥ ६२ ॥ अभिमन्त्रित कुशोदकसे मन्त्रके प्रत्येक अक्षरोंको वारि बीजोच्चारण कर विधिवत् प्रोक्षण करनेको आप्यायन कहते हैं ॥ ६२ ॥ मन्त्रेण वारिणा मन्त्रे तर्पणं तर्पणं स्मृतम् ॥ ६३ ॥
( २९४ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ पातञ्जल- मन्त्रसे अभिमन्त्रित जलको मन्त्रम छोडदेनेका नाम तर्पण कहते हैं ॥ ६३ ॥ तारमायारमायोगो मनोर्दीपनमुच्यते ॥ ६४ ॥ तार, माया, और रमायोगको मन्त्रका दीपन कहते हैं ॥ ६४ ॥ जप्यमानस्य मन्त्रस्य गोपनं तप्रकाशनम् ॥ ६५ ॥ जप्यमान मन्त्रका अप्रकाशनका नाम गोपन है ॥ ६५ ॥ संस्कारा दश मन्त्राणां सर्वतन्त्रेषु गोपिता । यत्कृत्वा सम्प्र- दायेन मन्त्री वाञ्छितमश्नुते ॥ ६६ ॥ यह दश सस्कार सब तन्त्राम गुप्त हैं। जिनके करनेसे जापक इष्टसिद्धिको पाते हैं ॥ ६६ ॥ रुद्धकीलितविच्छिन्नसुप्तशतादयोऽपि च । मन्त्रदोषा प्रण- श्यन्ति संस्कारैरेभिरुत्तमै ॥ ” इति । तदल प्रकाण्डताण्डव- कल्पेन मन्त्रशास्त्ररहस्योद्धोषणेन ॥ ६७ ॥ रुद्ध कीलित, विच्छिन्न, सुप्त, शप्त, आदि मन्त्रदोष उक्त संस्कारसे नष्ट होते हैं । योगविचारके बीचमें अप्रासंगिक मन्त्रशास्त्रोंके व्यर्थ विचारोंसे विरत होता हूं ॥ ६७ ॥ ईश्वरप्रणिधानं नामाभिहितानामनभिहितानाञ्च सर्वासां क्रियाणां परमेश्वरे परमगुरौ फलानपेक्षया समर्पणम् । अत्रेद्- मुक्तम्—“कामतॊऽकामतॊ वापि यत्करोमि शुभाशुभम् । तत्सर्वं त्वयि विन्यस्तं त्वत्प्रयुक्तः करोम्यहम् ॥ ” इति ॥ ६८ ॥ विहिताविहित समस्त क्रियाको फलाकांक्षारहित होकर परम गुरु ईश्वरम समर्पण करना ईश्वरप्रणिधान है सकाम या निष्कामसे मैं जो शुभाशुभ करता हूं वह सब आपके विषयमें समर्पण करता हूं आपसे प्रेरित होकर मैं करता हूं ॥ ६८ ॥ क्रियाफलसंन्यासोऽपि भक्तिविशेषापरपर्यायं प्रणिधानमेव फलाभिसन्धानेन कर्मकरणात् । तथाच गीयते गीतासु भग- वता । “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्म- फलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥ ” इति ॥ ६९ ॥
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( २९५ ) क्रियाफलका त्यागभी भक्तिविशेषरूप ईश्वरप्रणिधानही है । अतएव भगवद्गीता- में कहा है हे अर्जुन ! तुमको कर्महीमें अधिकार है फलमे कदाचित् अधिकार नहीं कर्म और फलका हेतुभी न हो अर्थात् फलाभिलाषासे कर्म न करो कर्मके त्यागमें भी तुम्हारी रुचि न हो ॥ ६९ ॥ फलाभिसन्धेरुपघातकत्वमभिहितं भगवद्भिर्नीलकण्ठभारती- श्रीचरणै । “अपि प्रयत्नसम्पन्नं कामेनोपहतं तपः । न तुष्टये महेशस्य श्वाल्लीढमिव पायसम् ॥” इति ॥ ७० ॥ नीलकण्ठभारतीजीने कहा है-अत्यन्त प्रयत्नसे किया हुआभी फलकामनायुक्त तप ईश्वरकी प्रीतिकारक नहीं होता है जिस प्रकार कुकरका उच्छिष्ट पायस किसीके प्रतिकारक नहीं होता है ॥ ७० ॥ सा च तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानात्मिका क्रिया योगसाधन- त्वाद्योग इति । शुद्धसारोपलक्षणावृत्त्याश्रयणेन निरूप्यते यथायुर्धृतमिति । शुद्धसारोपलक्षणा नाम लक्षणाप्रभेदः मुख्यार्थबाधतद्योगाभ्यामर्थान्तरप्रतिपादनं लक्षणा । सा द्विविधा रूढिमूला प्रयोजनमूला च तदुक्तं । काव्यप्रकाशे । “मुख्यार्थबाधे तद्योगे रूढितोऽथ प्रयोजनात् । अन्योऽर्थो लक्ष्यते यत् सा लक्षणारोपिता क्रिया ॥” इति । तच्छब्देन लक्ष्यत इत्याख्याते गुणीभूत प्रतिपादनमात्र परा- मृश्यते । सा लक्षणेति प्रतिनिर्दिश्यमानापेक्षया तच्छब्दस्य स्त्रीलिङ्गत्वोपपत्तिः तदुक्तं कैयटै । निर्दिश्यमानप्रतिनिर्दिश्य- मानयोरैक्यमापादयन्ति सर्वनामानि पर्यायेण तत्तल्लिङ्गमुपाद- दत इति ॥ ७१ ॥ तप, ईश्वर प्रणिधान स्वाध्यायरूप क्रिया योग साधन होनेके कारण शुद्धसारो पलक्षणासे योग कहाता है जैसे आयुका साधक घृतमें आयुर्घृतम् इत्यादि व्याहार होता है तथाहि शब्दका मुख्यार्थ ( शक्तिसे उपस्थितार्थ ) का बाध होनेपर मुख्या- र्थयुक्त अर्थान्तर बोधनका नाम लक्षणा है । वह रूढि ओर प्रयोजनवती भेदसे दो प्रकार हे । इस विषयमें काव्यप्रकाशकारकी सम्मति कहते हैं मुख्यार्थ बाध इति रूढिका अर्थ प्रसिद्ध है प्रयोजन व्यङ्ग्यार्थ प्रति...
[Header] ( २९६ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ पातञ्जल-
क्रियाका अर्थ व्यापार हे । तथा च अन्यार्थ जो बोधित होता हे वह लक्षणा है अन्यार्थप्रतिपादनम मुख्यार्थका बाध शक्यार्थ सम्वन्ध ओर रूढि या प्रयोजन यह तीनो हेतु हैं तयोर्ग ( मुख्यार्थसम्वन्धित्व ) लक्षणा में भी जोडना चाहिये नही तो व्यञ्जना ओर शक्तिस्मृतिमे भी अतिव्याप्ति होगी मुख्यकाभी अभिधारूप मुख्यार्थ सम्वन्धसे प्रतिपादन हो सक्ता हे इसलिये उसके वारणार्थ अन्यपद है अन्य अर्थात् अमुख्य हे यल्लक्ष्यते यहापर तिङ्प्रत्ययक अर्थ आश्रयमें यद्यपि धात्वर्थ प्रतिपादन विशेषणी भूत हे तथापि उसीको यत् शब्दसे परामर्श होता हे क्योकि यत् तत् शब्दके नित्य सम्वन्ध होता हे तत् शब्दसे लक्षणा का बोध होता हे अत' यत् शब्दभी धात्वर्थ मात्रका बोधक हे सा इति स्त्रीलिङ्गका निर्देश लक्षणा इति विधेय स्त्रीलिङ्ग पदके अभिप्रायसे हे कैयटनेभी कहा है कि उद्देश्य ओर विधेयका अभेद प्रतिपादन करनेवाले सर्वनामपद क्रमसे दोनोंके लिङ्गके बोधक होते हैं यथा “ शैत्य हि यत्सा प्रकृतिर्जलस्य ” इति ॥ ७१ ॥ तत्र कर्मणि कुशल इत्यादिरूढिलक्षणाया उदाहरणं कुशान् लातीति व्युत्पत्त्या दर्भादानकर्तरि यौगिक कुशलपदं विवेच- कत्वसारूप्यात् प्रवीणे प्रवर्त्तमानम् अनादिवृद्धव्यवहारपरम्प- राजुपातित्वेनाभिधानवत् प्रयोजनमनपेक्ष्य प्रवर्त्तते । तदाह, 'निरूढालक्षणा काश्चित् सामर्थ्यादभिधानवत्' इति ॥ तस्मात् रूढिलक्षणाया प्रयोजनापेक्षा नास्ति । यद्यपि प्रयुक्त शब्द प्रथमे मुख्यार्थं प्रतिपादयति तेनार्थेनार्थान्तर लक्ष्यत इति अर्थधर्मोऽय लक्षणा तथापि तत्प्रतिपादके शब्दे समारोपित सन् शब्दव्यापार इति व्यपदिश्यते । एतदेवाभिप्रेत्योक्त लक्ष- णारोपिता क्रियेति ॥ ७२ ॥ कर्मणि कुशल यह रूढिलक्षणाका उदाहरण है कुशल पद कुशान् लाति इस व्युत्पत्तिसे दर्भका आनयन कर्तामें यौगिक है एतादृश मुख्यार्थ कर्मम बाधित होनेसे विवेचकत्वरूपसम्वन्धसे विचारशीलमें लाक्षणिक है यह अनादि वृद्ध व्यवहारमूलक होनेसे शक्तिके समान है कहाभी है कि निरूढ लक्षणाशक्तिका समानही है अत' रूढिलक्षणा मे प्रयोजनकी अपेक्षा नहीं है । यद्यपि शब्द प्रथम मुख्यार्थका बोधन करता है परन्तु मुख्यार्थके बाध होनेसे अर्थान्तरलक्षित होता हे तथा लक्षणा अर्थका धर्म हे तथापि अर्थ प्रतिपादक शब्दमें आरोपित है इस अभिप्रायसे कहते हैं
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतं । ( २९७ ) कि लक्षणारोपितेति अर्थात् शक्याव्यवहित लक्ष्यार्थ विषयक होनेमे शब्दमें आरो- पितमात्र है वस्तुतः अर्थवृत्तिही हे प्रयोजनवती लक्षणाका उदाहरण गङ्गायांघोषः है यहां शैत्यपावनत्वादि प्रयोजन हे ॥ ७२ ॥ प्रयोजनलक्षणा तु षड्विधा उपादानलक्षणा लक्षणलक्षणा गौणसारोपा गौणसाध्यवसाना शुद्धसारोपा शुद्धसाध्यवसाना चेति । कुन्ताः प्रविशन्ति मञ्चा क्रोशन्ति गौर्वाहीकः गौरयं आयुर्घृतं आयुरेवेदमिति यथाक्रममुदाहरणानि द्रष्टव्यानि ॥७३॥ लक्षणा दो प्रकारकी है. शुद्ध ओर गौणी शुद्धमेंभी उपादानलक्षणा आर लक्षण- लक्षणारूप दो भेद हैं उन दोनोंमेंभी सारोप, ओर साध्यवसानरूप दो भेद हैं अ- र्थात् उपादानलक्षणा सारोपा, उपादानलक्षणा साध्यवसाना, लक्षणलक्षणा सारोपा, और लक्षणलक्षणासाध्यवसाना भेदसं शुद्धलक्षणा चार प्रकारकी है गोणीभी सारोप ओर साध्यवसान भेदमे दो प्रकार है इस प्रकार लक्षणा ६ प्रकार है कुन्ताः प्रवि- शन्ति मञ्चाः क्रोशन्ति, गोर्वाहीकः, गौरयम्, आयुर्धृतम्, आयुरेवेदम् इत्यादि उदाहरण हैं ॥ ७३ ॥ तदुक्तम्- "स्वसिद्धये पराक्षेपः परार्थं स्वसमर्पणम् । उपादानं लक्षणं चेत्युक्ता शुद्धैव सा द्विधा ॥ सारोपान्या तु यत्रोक्तौ विषयी विष- यस्तथा । विषय्यन्तःकृतेऽन्यस्मिन् सा स्यात् साध्यवसा- निका ॥ भेदाविमौ च सादृश्यात् सम्बन्धान्तरतस्तथा । गौणौ शुद्धौ च विज्ञेयौ लक्षणा तेन षड्विधा ॥" इति ॥ तदलं काव्यमीमांसामर्मनिर्मन्थनेन ॥ ७४ ॥ ( तदुक्तमिति ) वाक्यार्थमें स्वार्थका अन्वयप्रवेश सिद्धिके लिये पराक्षेप परका लक्षण अर्थात् स्वार्थको न त्यागकर परार्थलक्षण उपादान लक्षण है यथा "कुन्ताः प्रविशन्ति" यहापर कुन्तको वाक्यार्थमें अन्वयसिद्धिके लिये कुन्तधारी पुरुषका आक्षेप होता है इसीको अजहत्स्वार्था लक्षणा कहते हैं। परार्थमिति । परार्थका अन्वय- सिद्धिके लिये स्वार्थका त्याग लक्षणलक्षणा है यथा "गङ्गायांघोषः " घोषपदार्थके अन्वयसिद्धिके लिये गंगापद स्वार्थको त्यागकर तीरूप अर्थको लक्षित करता है यह दोनों भेद शुद्धके हैं सारोपान्येति अन्य अर्थात् गोणी सारोप ओर साध्यव- सान भेदसे दो प्रकार है विषयी आरोप्यमाण गवादि ओर विषय आरोपके वाही- कादि दोनोके जहाँपर भेदरूपसे सामानाधिकरण्यका प्रतिपादन हो वह सारोप हे यथा गोर्वाहीक इत्यादि आरोप्यमाण गवादि अन्य आरोपविषयमन्तः निगीर्ण
( २९८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ पातञ्जल-
हो अर्थात् भेदसे प्रतीयमान न हो वह साध्यवसाना है उक्त दोनो भेद सादृश्यस- म्बन्धसे हो तो गौणी और अन्यसम्बन्धसे हो तो शुद्धा होती है सादृश्यमूलक सारोपका उदाहरण गौर्वाहीक है साध्यवसानका उदाहरण गौरयम् है सम्बन्धन्तर- से शुद्धसारोपका उदाहरण आयुर्घृतम् है साध्यवसानका उदाहरण आयुर्वेवेदम् है यहापर कार्यकारणभावरूप सम्बन्ध है गौणसारोपमे भेद होते हुएभी अभेद प्रतीति और साध्यवसानमें सर्वथा अभेदप्रतीति प्रयोजन है शुद्ध सारोपम अन्य वैलक्षण्यसे कार्यकारित्व और साध्यवसानमें अव्यभिचारण कार्यकारत्व फल है ॥ ७४ ॥ स च योगो यमादिभेदवशादष्टांग इति निर्दिष्टः । तत्र यमा अहिंसादय । तदाह पतञ्जलि 'अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्या- परिग्रहा यमा' इति । नियमाः शौचादयः । तदप्याह 'शौच- सन्तोषतप स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः' इति ॥ ७५ ॥ उक्त योग यमनियमादिभेदसे अष्टाङ्ग है अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ( चोरी न करना ) ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह ( दान ) न लेना, यम है। शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, और ईश्वरप्रणिधान नियम है यह विष्णुपुराणमेंभी कहा है ॥ ७५ ॥ एते च यमनियमा विष्णुपुराणे दर्शिताः-"ब्रह्मचर्यमहिंसां च सत्यास्तेयापरिग्रहान् । सेवेत योगी निष्कामो योग्यतां स्वं मनो नयन् ॥ स्वाध्यायशौचसन्तोषतपांसि नियतात्मवान् । कुर्वीत ब्रह्मणि पर परस्मिन् प्रवणं मन ॥ एते यमा पनि- यमा पञ्च पञ्च प्रकीर्त्तिता । विशिष्टफलदा कामे निष्का- माना विमुक्तिदाः ॥" इति ॥ ७६ ॥ निष्कामयोगी चित्तकी योग्यता प्राप्त करते हुए ब्रह्मचर्यादिको सेवन करे वशी- कृतेन्द्रिय होकर स्वाध्यायादि कर परब्रह्ममें मनको सदा आसक्त ( ईश्वरप्रणिधान ) करे उक्त पाँच यम और पाँच नियम सकाम योगीको अभीष्ट फल देनेवाले हैं और निष्कामयोगीके लिये मोक्ष देनेवाले हैं ॥ ७६ ॥ स्थिरसुखमासनं पद्मासनभद्रासनवीरासनस्वस्तिकासनदण्ड- कासनसोपाश्रयपर्यङ्कक्रौञ्चनिषदनोष्ट्रनिषदनसमसंस्थासम्भेद्रा- दशविधम् । "पादाङ्गुष्ठौ निबध्नीयाद्धस्ताभ्यां व्युत्क्रमेण तु । ऊरूरूपरि विप्रेन्द्र ! कृत्वा पादतले उभे । पद्मासन भवेदेतत्
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( २९९ ) सर्वैषामभिपूजितम् ” ॥ इत्यादिना याज्ञवल्क्यः पद्मासना- दिस्वरूपं निरूपितवान् । तत्सर्वं तत एवावगन्तव्यम् ॥ ७७ ॥ जिसमें शरीर स्थिर ( अचल ) हो और सुख हो वह आसन है वह पद्मासनादि भेदसे दश प्रकार है वामचरणकी एडीको दक्षिण जंघापर चढ़ाये और दक्षिणचरण- की एडीको वामजंघापर चढ़ाकर दक्षिण हाथसे वामचरणके अगूठेको और बायें हाथसे दाहिने चरणके अगूठेको पकडे रहे उसको पद्मासन कहते हैं यह आसन अत्यन्त श्रेष्ठ है एवं क्रमसे याज्ञवल्क्यने पद्मासनादिका स्वरूप वर्णन किया है वह सब उसमेंसे जान लेना ॥ ७७ ॥ तस्मिन्नासनस्थैर्ये सति प्राणायामः प्रतिष्ठितो भवति । स च श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदस्वरूपः । तत्र श्वासो नाम बाह्यस्य वायोरन्तरानयनम् । प्रश्वास पुन कोष्ठस्य वहिर्निस्सारणम् । तयोरुभयोरपि सञ्चरणाभावः प्राणायामः ॥ ७८ ॥ आसन स्थिर होनेसे प्राणायामभी स्थिर होता है श्वास प्रश्वासकी गतिके रोक- नेका नाम प्राणायाम है बाहरके वायुको भीतर लेजानेका नाम श्वास है भीतरके वायुको बाहर निकालनेका नाम प्रश्वास है दोनोंका सञ्चार रोकनेका नाम प्राणा- याम है ॥ ७८ ॥ ननु नेदं प्राणायामसामान्यलक्षणं तद्विशेषेषु रेचकपूरककुम्भ- कप्रकारेषु तदनुगतेरयोगादिति चेन्नैष दोष सर्वत्रापि श्वास- प्रश्वासगतिविच्छेदसम्भवात् । तथाहि कोष्ठस्य वायोर्बहिर्नि- स्सरणं रेचकः प्राणायामः प्रश्वासत्वेन प्रागुक्तः । बाह्यवायोरन्त- र्धारणं चरम यः श्वासस्वरूप । अन्तः स्तम्भवृत्ति कुम्भक । यस्मिन् जलमिव कुम्भे निश्चलतया प्राणाख्यो वायुरवस्था- प्यते तत्र सर्वत्र श्वासप्रश्वासद्वयगतिविच्छेदोऽस्त्येवेति नास्ति शंकावकाश । तदुक्तं 'तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गति- विच्छेद प्राणायाम 'इति ॥ ७९ ॥ शंका-श्वासप्रश्वासगतिविच्छेद प्राणायामसामान्यका लक्षण नहीं हो सकता क्योंकि प्राणायामविशेषमें रेचक, पूरक, कुम्भकादिमें श्वास और प्रश्वास उभय गतिका निषेध नहीं है । समाधान-ऐसा नहीं कह सकते प्राणायाममात्रमें तादृश-
( ३०० ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ पातञ्जल- गतिनिरोध होताही है भीतरके वायुका बाहर निकालना रेचक प्राणायाम हे जिसको प्रश्वास कहा बाह्यवायुको भीतर लेजाना पूरक हे जिसको श्वास कहा भीतर रोकना कुम्भक है जिस प्रकार घटमें जलको निश्चलरूपसे रोका जाता है उसी प्रकार प्राण वायुको निश्चल किया जाता है अत' सर्वस्थलमें श्वासप्रश्वासगतिनिरोध होनेसे शंका कलंकका लेशभी नहीं है अतएव कहा है कि तादृश कुम्भक होनेपर श्वास प्रश्वासकी गतिनिरोधरूप प्राणायाम होता है ॥ ७९ ॥ स च वायुः सूर्योदयमारभ्य सार्द्धघटिकाद्वयं घटीयन्त्रस्थित- घटभ्रमणन्यायेन एकैकस्या नाड्यां भवति । एवं सत्यहर्निशं श्वासप्रश्वासयो षट्शताधिकैकविंशतिसहस्राणि जायन्ते अत एवोक्तं मन्त्रसमर्पणरहस्यवेदिभिरजपामन्त्रसमर्पणे । “षट्शतानि गणेशाय षट्सहस्रं स्वयम्भुवे । विष्णवे षट्सह- स्रं च षट्सहस्रं पिनाकिने ॥ सहस्रमेकं गुरवे सहस्रं परमात्मने । सहस्रमात्मने चैवमर्पयामि कृतं जपम् ॥” इति ॥ ८० ॥ वह वायु सूर्योदयसे लेकर ढाई घडीतक घटीयन्त्रके घडेकी समान इडा पिंगला और सुषुम्ना प्रत्येक नाडीमें घूमता है इस प्रकार दिनरात्रिमें श्वास प्रश्वासकी संख्या २१६०० हो जाती है अतएव मन्त्रसमर्पणवेत्ताओने अजपामन्त्र समर्पणमें कहा है किये हुए जपमेसे ६०० गणेशजीको, ६००० ब्रह्माजीको, ६००० विष्णुभगवान्को, ६००० महादेवजीको १००० गुरुको १००० परमात्माको और १००० अपने आत्माको अर्पण करता हू इति ॥ ८० ॥ तथा नाडीसञ्चरणदशायां वायोः सञ्चरणे पृथिव्यादीनि तत्त्वानि वर्णविशेषवशात् पुरुषार्थाभिलाषुकैः पुरुषैरवगन्त- व्यानि । तदुक्तमभियुक्तै - “सार्द्धं घटीद्वयं नाडीरेकैकोद- यात् वहेत् । आरघट्टघटीभ्रान्तिन्यायो नाड्यो पुन पुन ॥ ८१ ॥ नाडियोंके घूमते समय वायुका सञ्चरण होनेसे नीलपीतादि वर्णविशेषोपलक्षित पृथिव्यादितत्त्वभी पुरुषार्थ चाहनेवालोंको अवश्य ज्ञातव्य हे । अभियुक्तोने कहा है घटीयन्त्रस्य घटके समान सूर्योदयसे ढाई घटातक एक एक नाडी चलती है ॥ ८१ ॥ शतानि तस्य जायन्ते नि श्वासोच्छ्वासयोर्नृषु । रसषट्कादिके सङ्ख्याहोरात्रे सकले पुन ॥ षट्त्रिंशद्गणर्णाना या वेला भगने
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( ३०१ ) भवेत् । सा वेला मरुतो नाड्यन्तरे सञ्चरतो भवेत् ॥ प्रत्येकं पंचतत्त्वानि नाड्योश्च वहमानयोः । वहन्त्यहर्निशं तानि ज्ञातव्यानि यतात्मभि ॥ ऊर्ध्वं वह्निरधस्तोयं तिरश्चीन- समीरणः । भूमिरर्द्धपुटे व्योम सर्वगं प्रवहेत् पुन ॥ वायो- र्वह्नेरपां पृथ्व्या व्योमस्तत्त्वं वहेत् क्रमात् । वहन्तयोरुभयोर्ना- ड्योर्ज्ञातव्योऽयं यथाक्रमम् ॥ ८२ ॥ ३६ गुणों और वर्णोंके उच्चारणमें जितना समय लगता है । उतने समय नाडीके भीतर चलनेवाले वायुको लगता है चलती हुई नाडीमें प्रत्येक पांच तत्त्व सयमीको अवश्य ज्ञातव्य हैं । अग्नितत्त्व उपरको जलतत्त्व नीचेको वायुतत्त्व टेढा पृथिवीतत्त्व अर्धपुटमें और आकाशतत्त्व सर्वत्र वहन करता हे ॥ ८२ ॥ पृथ्व्या पलानि पञ्चाशच्चत्वारिंशत् तथाम्भस । अग्नेस्त्रिंशत् पुनर्वायोर्विंशतिर्नभसो दश ॥ प्रवाहकालसंख्येयं हेतुर्विह्वल- योरथ । पृथ्वी पञ्चगुणा तोयं चतुर्गुणमथानल ॥ त्रिगुणो द्विगुणो वायुर्विद्यदेकगुणं भवेत् । गुणं प्रति दशपलान्यूर्व्यां पञ्चाशदित्यतः ॥ एकैकहानिस्तोयादेस्तथा पञ्च गुणा क्षिते । गन्धो रसश्च रूपञ्च स्पर्शं शब्दं क्रमादमी ॥ ८३ ॥ बहते हुए दोनो नाडीमें वायु, अग्नि, जल, पृथिवी और आकाश क्रमसे चलते हैं उसको यथाक्रम जानना चाहिये । पृथिवीतत्त्व ५० पल, जलतत्त्व ४० पल, अग्नितत्त्व ३० पल वायुतत्त्व २० पल और आकाशतत्त्व १० पलतक वहन करता है पृथिवी पाच गुणवाली, जल चार गुणवाला, अग्नि तीन गुणवाला वायु दो गुणवाला, आर आकाश एक गुणवाला है । एक एक गुणके लिये दश पल समय लगनेसे पृथिवीतत्त्वके लिये ५० पल हुए, पृथिवीमें गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द यह पञ्च गुण हैं इससे जलादिमें क्रमसे एक एक घटानेपर पूर्वोक्त क्रम हो जाता है॥८३॥ तत्त्वाभ्यां भूजलाभ्यां स्यात् शान्तिकार्ये फलोन्नति । दीप्ता स्थिराधिका कृत्ये तेजो वायम्बरेषु च ॥ पृथ्व्यप्तेजोमरुद्- व्योमतत्त्वानां चिह्नमुच्यते । आद्ये स्थैर्यं स्वचित्तस्य शैत्ये कामोद्भवो भवेत् ॥ तृतीये कोपसन्तापो चतुर्थे चञ्चलात्मता । पञ्चमे शून्यतैव स्यादथवा धर्मवासना ॥ ८४ ॥
( ३०२ ) सर्वदर्शनसङ्ग्रहः । [ पातञ्जल-
पृथिव्यादितत्त्वोंका चिह्न कहते हैं । पृथिवीतत्त्व चलनेपर चित्तका स्थैर्य होता है जलसे कामाद्रेक होता है । अग्नितत्त्वसे क्रोध और सन्ताप होते हैं । वायुतत्त्वसे चित्त चञ्चल होता है और आकाशतत्त्व चलनेपर शून्यता अथवा धर्मभावना होती है ॥ ८४ ॥ श्रुत्योरङ्गुष्ठकौ मध्यांगुल्यौ नासापुटद्वये । सृक्किणोः प्रान्त्यको- पान्त्याङ्गुली शेषे दृगन्तयोः ॥ न्यस्यान्तर्भूत्पृथिव्यादितत्त्वज्ञान भवेत् क्रमात् । पीतश्वेतारुणश्यामैर्बिन्दुभिर्निरुपाधि सम् ॥” इत्यादिना ॥ ८५ ॥ दोनों अङ्गूठोंसे दोनों कर्णको दोनों मध्यमा अंगुलियोंसे दोनों नासापुटको और दोनों हाथोंकी कनिष्ठिका और अनामिकासे ओष्ठको अवशिष्टअंगुली ( तर्ज नी ) से नेत्रको दबाकर एकाग्रचित्त होनेसे अन्तःकरणमें पृथिव्यादि तत्त्वका ज्ञान होता है पीत, श्वेत, अरुण ( लाल ) श्याम और रत्नविन्दुसे पृथिव्यादि लक्षित होते हैं निरुपाधि होनेसे आकाश बिन्दुरूपसे लक्षित होता है ॥ ८५ ॥ यथावद्वायुतत्त्वमवगम्य तन्नियमने विधीयमाने विवेकज्ञानां- वरणकर्मक्षयो भवति । तपो न परं प्राणायामादिति । “दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मलाः । प्राणायामैस्तु दह्यन्ते तद्वदिन्द्रियपन्नगाः ॥ ” इति च ॥ ८६ ॥ वायुतत्त्वको यथार्थ जानकर उसका नियमन करनेसे विवेक ज्ञानका आवरण जो कर्म है उसका क्षय होता है प्राणायामसे बढकर कोई तप नहीं है अग्निमें तपानेसे जिस प्रकार सुवर्णादिका मल जल नष्ट हो जाता है तिसी प्रकार प्राणायामसे इन्द्रि- यरूप सर्प भस्म हो जाते हैं इति ॥ ८६ ॥ तदेवं यमादिभिः संस्कृतमनस्कस्य योगिन संयमप्रत्याहार कर्त्तव्य । चक्षुरादीनामिन्द्रियाणां प्रतिनियतरञ्जनीयकोपनी- यमोहनीयप्रवणत्वप्रहाणेनाविकृतस्वरूपप्रवणचित्तानुकारः प्र- त्याहार इन्द्रियाणि विषयेभ्य प्रतीपमाह्रियन्तेऽस्मिन्निति व्युत्पत्ते ॥ ८७ ॥ इस प्रकार यमनियमादिसे शुद्ध चित्त योगीको संयमप्रत्याहार करना चाहिये चक्षुरादि इन्द्रियोंको नियत राग द्वेष मोहजनक शब्द स्पर्श रूप रस गन्धादि विषयमें असाधारणतया प्रवृत्त चित्तको हटाकर अन्तर्मुखमे स्वरूपम स्थिर करना प्रत्याहार है