सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेतं । ( २८७ ) "स्थानाद्बीजादुपष्टम्भान्नि ष्यन्दान्निधनादपि । कायमावेय- शौचत्वात् पण्डिता ह्यशुचिं विदुः ॥" इति । परिणामता- पसंस्कारैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिन इति न्या- येन दुःखे स्रक्चन्दनवनितादौ सुखत्वारोपः अनात्मनि देहा- दावात्मबुद्धि । तदुक्तम्- "अनात्मनि च देहादावात्मबुद्धिस्तु देहिनाम् । अविद्या तत्कृतो बन्धस्तन्नाशे मोक्ष उच्यते " ॥ इति । एवमियमविद्या चतुष्पादा भवति ॥ ४४ ॥ पण्डितलोग शरीरको निम्न लिखित हेतुओंसे सदा अशुचि कहते हैं स्थान मलमू- त्रादिसे पूरित माताके उदरमें स्थिति होनेसे शुक्रशोणितादिसे उत्पन्न होनेसे निष्पन्दसे अर्थात् मलमूत्रादिका निर्गमनद्वार होनेसे नाश होनेसे मलमूत्राद्याधार होनेसे सांसारिक सुख सब विवेकियोके लिये दुःख है यथा परिणाम यावत्काल विषय भोग करता है तावत्काल सुख प्रतीत होता है अनन्तर भोगतृष्णादि बढनेसे उसका परिणाम दुःख होता है एव ताप वही वस्तु जिनको नही मिलनेसे तापकारक होता है उसकी प्राप्तिकी चिन्ता बनी रहनेसे सस्कारमेंभी दुःखी होता है अतएव कहा है "तदेव प्रीतये भूत्वा पुनर्दुःखाय कल्पते" इति। चन्दन, कुसुम, रमणी आदि दुःखहेतुमे सुखत्वारोप है। प्राणियोंकी अनात्मभूत देहादिमें आत्मबु- द्विको अविद्या कहते है तादृश अविद्यामूलक बन्ध (ससार) होता है अविद्या नाश होनेसे मोक्ष होता है इस प्रकार अविद्याको अनित्य अशुचि दुःख अनात्मरूप चार पाद है ॥ ४४ ॥ नन्वेतेष्वविद्याविशेषेषु किञ्चिदनुगतं सामान्यलक्षणं वर्णनीयम् अन्यथा विशेषस्यासिद्धे । तथाचोक्तं भट्टाचार्यैः -"सामान्य- लक्षणं त्यक्त्वा विशेषस्यैव लक्षणम् । न शक्यं केवलं वक्तुमं- गोऽप्यस्य न वाच्यता ॥" इति । तदपि न वाच्यमतस्मिं- स्तद्बुद्धिरिति सामान्यलक्षणाभिधानदत्तोत्तरत्वात् ॥ ४५ ॥ लक्षणप्रमाणसे वस्तुसिद्ध होती है लक्षणभी सामान्यलक्षणपूर्वक विशेष लक्षण होता है यथा द्रव्यसामान्यज्ञानानन्तर द्रव्यविशेष पृथिव्यादिका लक्षण होता है तद्वत् अविद्याविशेषमें सर्वत्र अनुगत सामान्य लक्षण कहना चाहिये नहीं तो विशेष प्रतीति न होगी "सामान्यलक्षणको छोडकर केवल विशेषकाही लक्षण कहना अ